Maharashtra bmc election 2026: देश की फाइनेंशियल कैपिटल मुंबई, मराठी बोलने वाले लोगों के संघर्ष और संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन के 106 शहीदों की कुर्बानी की वजह से बनी। लेकिन, आज मुंबई में मराठी कम्युनिटी के होने पर ही गंभीर सवाल उठ रहे हैं, जो चिंता की बात है।
लगभग 25-30 साल तक, उद्धव ठाकरे की लीडरशिप में शिवसेना ने मुंबई म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन (BMC) पर राज किया। बड़ा सवाल यह है कि क्या इस दौरान मराठी कम्युनिटी ने तरक्की की, या उनकी हालत और खराब हुई? आज यह सवाल आम मराठी लोग खुलकर पूछ रहे हैं।
1. गिरगांव से ग्लास टावर्स तक: मुंबई का बदलता चेहरा
एक समय था जब मुंबई के लालबाग, परेल, सेवरी, दादर और गिरगांव को शहर का "दिल" माना जाता था। ये इलाके मिल मजदूरों के पसीने और मराठी कल्चर की जड़ों से बने हैं। लेकिन, पिछले ढाई दशकों में, वे तेज़ी से "कॉस्मोपॉलिटन" शहरीकरण से गुज़रे हैं, जहाँ मिल की चिमनियाँ शांत हो गई हैं, और उनकी जगह ऊँची-ऊँची कांच की इमारतों ने ले ली है।
मराठी लोगों का विस्थापन
इस बड़े बदलाव का सबसे ज़्यादा असर मराठी समुदाय पर पड़ा है। उस समय की उद्धव ठाकरे की नगर निगम सरकार ने इन टावरों के निर्माण की इजाज़त देते समय वादा किया था कि "मराठी लोगों को उन्हीं इलाकों में घर मिलेंगे"।
लेकिन, असलियत बिल्कुल अलग निकली। चाहे मिल मज़दूरों के लिए घर का मामला हो या रीडेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स, मराठी लोगों को साउथ और सेंट्रल मुंबई से विस्थापित कर दिया गया और उन्हें शहर के बाहरी इलाकों जैसे विरार, कर्जत, कसारा और बदलापुर में बसने के लिए मजबूर किया गया। यह एक सच है कि जिन "मराठी लोगों" के नाम पर राजनीति की गई, वे धीरे-धीरे मुंबई के नक्शे से गायब हो रहे हैं।
2. आर्थिक मज़बूती का सवाल: मराठी ठेकेदार कहाँ हैं?
किसी भी समाज की तरक्की सीधे तौर पर उसके आर्थिक मज़बूती पर निर्भर करती है। मुंबई म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन का सालाना बजट ₹50,000 करोड़ से ज़्यादा है; यह आंकड़ा पिछले 25 सालों में लाखों करोड़ रुपये तक पहुँच गया है। सवाल यह उठता है कि इस बड़े बजट से असल में कितने मराठी एंटरप्रेन्योर या कॉन्ट्रैक्टर बने हैं? आरोप है कि मुंबई में, सड़क और नाली की सफ़ाई या पुल बनाने जैसे प्रोजेक्ट्स के टेंडर प्रोसेस में मराठी युवाओं या लोकल कॉन्ट्रैक्टरों को प्रायोरिटी देने के बजाय, खास अमीर ग्रुप्स के फ़ायदे पूरे करने पर ध्यान दिया गया। अगर म्युनिसिपल पावर मराठी फ़ायदे पूरे करने के लिए थी, तो आज मुंबई के सबसे अमीर कॉन्ट्रैक्टरों की लिस्ट से मराठी नाम लगभग गायब क्यों हैं?
मराठी कम्युनिटी छोटे बिज़नेस तक ही सीमित
रिसर्चर्स का मानना है कि उद्धव ठाकरे के समय में, मराठी कम्युनिटी 'वड़ा पाव' और 'भाजी' बेचने जैसे छोटे बिज़नेस तक ही सीमित थी, जबकि असरदार लोगों ने बड़े इकॉनमिक सेक्टर्स पर कंट्रोल बनाए रखा। 3. इमोशनल नारे और असलियत की कमी
चुनावों के दौरान, "मराठी मानूस" (मराठी लोग), "मराठी पहचान," और "मुंबई पर हमला" जैसे नारे हमेशा शिवसेना के लिए लाइफलाइन साबित हुए हैं। हालांकि, अब इस बात की आलोचना हो रही है कि जब पार्टी सत्ता में थी, तो यह "मराठी पहचान" ठोस मौकों में नहीं बदल पाई।
मराठी शिक्षा में गिरावट और इंग्लिश स्कूलों का बढ़ना
मराठी स्कूलों की खराब हालत इसका साफ उदाहरण है। जब म्युनिसिपल मराठी स्कूल बंद हो गए और उनमें स्टूडेंट की संख्या कम हो गई, तो प्राइवेट इंग्लिश-मीडियम स्कूल तेजी से फले-फूले। आरोप है कि मराठी को क्लासिकल भाषा का दर्जा दिलाने के बजाय, इसका इस्तेमाल सिर्फ चुनावी फायदे के लिए किया गया।
4. बदलापुर-विरार आना-जाना और मराठियों का रोज़ का संघर्ष
आज, मुंबई में काम करने वाले मराठी समुदाय को रोज़ 4 से 5 घंटे ट्रेन से सफर करना पड़ता है। ठाणे, पालघर और रायगढ़ ज़िलों से आने वाले ये लोग मुंबई की सेवा करते हैं, लेकिन आलोचकों के मुताबिक, उद्धव ठाकरे के कार्यकाल में शहर में रहने का उनका सपना टूट गया है। नगर निगम ने सस्ते घरों के लिए कोई ठोस प्लान लागू नहीं किया। रीडेवलपमेंट से बिल्डरों को फ़ायदा हुआ, जबकि असली मराठी लोगों को 'मेंटेनेंस' के बहाने शहर से बाहर कर दिया गया।
5. चुनावी माहौल और बदले हुए समीकरण
अब, जब मुंबई नगर निगम के चुनाव फिर से नज़दीक आ रहे हैं और सत्ता जाने का डर मंडरा रहा है, तो "मराठी लोगों का रक्षक" होने का नारा फिर से ज़ोर पकड़ रहा है। लेकिन क्या इस बार वोटर पुराने वादों से प्रभावित होंगे? यह एक बड़ा सवाल है। जिन मराठी लोगों ने पीढ़ियों से शिवसेना पर भरोसा किया है और उसे वोट दिया है, वे अब अपने बच्चों के भविष्य, रोज़गार और घर के अपने अधिकार के बारे में जवाबदेही मांग रहे हैं।
6- निर्णायक विश्लेषण, भावनाओं से आगे की मांग
राजनीतिक विश्लेषकों का आकलन है कि उद्धव ठाकरे ने भले ही 25 वर्षों तक सत्ता में रहते हुए मुंबई की सुंदरता व बुनियादी ढाँचे में सुधार के दावे किए हों, लेकिन वे 'मराठी समुदाय' की समग्र प्रगति सुनिश्चित करने में विफल रहे हैं। अब मराठी युवा खुलकर कह रहे हैं कि केवल भावनात्मक भाषणों से पेट नहीं भरता।
घटती मराठी आबादी, एक बड़ी राजनीतिक विफलता
'कमीशन' और 'व्यक्तिगत लाभ' जैसे गंभीर आरोपों के कारण इस बार के चुनावों में मराठी मतदाताओं का विचार बदल सकता है। मुंबई में मराठी आबादी का प्रतिशत घटना केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि एक बड़ी राजनीतिक विफलता का प्रमाण है। मुंबई पर हक जताते हुए भी, मराठी समुदाय की अपेक्षित स्थिति नहीं बन पाई।