अध्यात्म

  • कोविड-19 के बीच हरिद्वार में आज से कुंभ मेले का आगाज, श्रद्धालुओं को इन बातों का रखना होगा खास ध्यान

    कोविड-19 के बीच हरिद्वार में आज से कुंभ मेले का आगाज, श्रद्धालुओं को इन बातों का रखना होगा खास ध्यान

     

    कोरोना वायरस महामारी के बीच हरिद्वार में औपचारिक रूप से महाकुंभ मेले की शुरुआत आज से हो गई है। एक माह तक चलने वाले इस धार्मिक आयोजन के शुरू होने के मौके पर मेलाधिकारी दीपक रावत, पुलिस महानिरीक्षक संजय गुंज्याल और हरिद्वार के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक जन्मेजय खंडूरी ने हरकी पैड़ी पर मां गंगा, नौ ग्रहों एवं अन्य देवी देवताओं की पूजा अर्चना कर महाकुंभ मेले के निर्विघ्न सम्पन्न होने की कामना की।

    बता दें कि 30 अप्रैल तक चलने वाले महाकुंभ मेले में तीन शाही स्नान होंगे जिसमें सभी 13 अखाड़े, नागा साधु और महामंडलेश्वर मुख्य घाट हर की पैड़ी पर ब्रह्मकुंड में मोक्ष और कल्याण की डुबकी लगाएंगे। सुरक्षा और व्यवस्था की दृष्टि से संपूर्ण मेला क्षेत्र को 23 सेक्टर में विभाजित किया गया है। वहीं, मेला अधिकारी रावत ने बताया कि प्रत्येक सेक्टर में सेक्टर मजिस्ट्रेट, स्वास्थ अधिकारी व पुलिस बल की तैनाती की गई हैं।

    उन्होंने बताया कि 12 अप्रैल को सोमवती अमावस्या, 14 अप्रैल को बैसाखी स्नान और 27 अप्रैल को चैत्र पूर्णिमा पर होने वाले शाही स्नान दिवसों पर सभी 13 अखाड़े लाखों श्रद्धालुओं के साथ स्नान करेंगे। इसके अलावा पुलिस महानिरीक्षक गुंज्याल ने बताया, "सुरक्षा के व्यापक बंदोबस्त किए गए हैं और पूरे कुंभ क्षेत्र में दस हजार पुलिसकर्मी मेला क्षेत्र में तैनात हैं। हरिद्वार से देवप्रयाग तक करीब 670 हेक्टेअर क्षेत्र को महाकुंभ मेले के तहत अधिसूचित किया गया है।" 

    कुंभ मेले में आने वाले श्रद्धालुओं को इन नियमों का करना होगा फॉलो 

    उत्तराखंड सरकार ने कोरोना काल में हो रहे महाकुंभ मेले में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए दिशानिर्देश जारी किए हैं जिनमें पंजीकरण के साथ ही उन्हें 72 घंटे पूर्व की कोविड-19 संबंधी जांच रिपोर्ट अनिवार्य रूप से लानी होगी, जिसमें संक्रमण की पुष्टि नहीं की गई हो। कोविड-19 महामारी के कारण महाकुंभ मेला अवधि को पहले ही सीमित कर दिया गया है।

    वहीं, महाकुंभ हरिद्वार में आने वाले प्रत्येक यात्री को महाकुंभ मेला-2021 के वेब पोर्टल पर अपना पंजीकरण करवाना अनिवार्य होगा। केवल पंजीकृत लोगों को ही मेला क्षेत्र में प्रवेश की अनुमति मिलेगी। महाकुंभ मेले के दौरान संपूर्ण मेला क्षेत्र में किसी भी स्थान पर संगठित रूप से धार्मिक अनुष्ठान, भजन गायन, कथा और भंडारे के आयोजन पर पूरी तरह से प्रतिबंध रहेगा।

    इसके अलावा उत्तर प्रदेश के साथ रूडकी के नारसन और उधमसिंह नगर जिले के काशीपुर में लगने वाली सीमाओं पर जांच बढ़ा दी गई है। इससे पहले इस संबंध में उत्तराखंड हाई कोर्ट अपने आदेश में कहा था कि महाकुंभ मेले में आने के लिए कोराना टीके की पहली खुराक ले चुके श्रद्धालुओं के लिए भी जांच रिपोर्ट लाना अनिवार्य होगा। आदेश में कहा गया कि कोविड-19 टीकाकरण पूरा करवा चुके श्रद्धालुओं को भी अपने प्रमाणपत्र दिखाने होंगे तथा कुंभ क्षेत्र में मास्क पहनने, सामाजिक दूरी रखने तथा हाथों को बार-बार धोने जैसे सभी दिशानिर्देशों का अनुपालन करना होगा।

    इतिहास में पहली बार घटेगी महाकुंभ मेले की अवधि

    आपको बता दें कि हरिद्वार में गंगा नदी के तट पर हर 12 साल में होने वाले इस वृहद धार्मिक आयोजन के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ जब महामारी के कारण इसकी अवधि घटाकर इसे केवल एक माह का किया गया। सामान्य परिस्थितियों में महाकुंभ मेला करीब चार माह का होता है जो 14 जनवरी को मकर संक्रांति के पर्व से शुरू होकर अप्रैल के आखिर तक चलता रहता है।

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  • Holika Dahan: होलिका दहन का क्या है महत्व? धन-कारोबार के लिए इस बार अग्नि में चढ़ाना न भूलें ये चीजे

    Holika Dahan: होलिका दहन का क्या है महत्व? धन-कारोबार के लिए इस बार अग्नि में चढ़ाना न भूलें ये चीजे

     

    होलिका दहन को छोटी होली भी कहा जाता है। होलिका दहन को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक समझा जाता है। इस दिन निश्चित मुहूर्त के अनुसार होलिका दहन किया जाता है। होलिका दहन से पहले पूजा के दौरान कई तरह की चीजें अर्पित करने की परंपरा है। ज्योतिषविदों की मानें तो होलिका में राशिनुसार चीजें अर्पित करने से न सिर्फ इंसान के संकट टलते हैं, बल्कि घर में सुख-समृद्धि का भी वास होता है. आइए आपको बताते हैं कि होलिका दहन पर इस साल आप कौन सी चीजें अर्पित कर सकते हैं।

    इस दिन किसी वृक्ष कि शाखा को जमीन में गाड़ कर उसे चारों तरफ से लकड़ी कंडे उपले से घेर कर निश्चित मुहूर्त में जलाया जाता है। इसमें छेद वाले गोबर के उपले, गेंहू की नई बालियां और उबटन जलाया जाता है। ताकि वर्षभर व्यक्ति को आरोग्य की प्राप्ति हो और उसकी सारी बुरी बलाएं अग्नि में भस्म हो जाएं। लकड़ी की राख को घर में लाकर उससे तिलक करने की परंपरा भी है। फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा के दिन श्री चैतन्य महाप्रभु का जन्म हुआ था। उनको श्री कृष्ण का अवतार माना जाता है. इस दिन श्री चैतन्य महाप्रभु की पूजा उपासना भी अत्यंत शुभ फलदायी होती है.

    होलिका दहन के दिन क्या करें और अग्नि में क्या डालें ?

    -होलिका दहन के स्थल पर जाएं अग्नि को प्रणाम करें। भूमि पर जल डालें।

    -इसके बाद अग्नि में गेंहू की बालियां, गोबर के उपले, और काले तिल के दाने डालें।

    -अग्नि की तीन बार परिक्रमा करें। इसके बाद अग्नि को प्रणाम करके अपनी मनोकामनाएं कहें।

    -होलिका की अग्नि की राख से स्वयं का और घर के लोगों का तिलक करें।

    -अच्छे स्वास्थ्य के लिए काले तिल के दाने बीमारी से मुक्ति के लिए हरी इलाइची और कपूर डालें।

    -धन लाभ के लिए अग्नि में चन्दन की लकड़ी डालें।

    -वैवाहिक समस्याओं के लिए- हवन सामग्री नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति के लिए काली सरसों डालें।  

    इस दिन मन की तमाम समस्याओं का निवारण हो सकता है। रोग, बीमारी और विरोधियों की समस्या से निजात मिल सकती है। आर्थिक बाधाओं से राहत मिल सकती है। अगर आप ईश्वर की कृपा पान चाहते हैं तो इस दिन आसानी से प्राप्त कर सकते हैं। अलग-अलग चीजों को अग्नि में डालकर अपनी अपनी बाधाओं से मुक्ति पा सकते हैं।

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  • Holika Dahan 2021: होलिका दहन पर भूलकर भी ना करें ये काम, वरना होगा नुकसान

    Holika Dahan 2021: होलिका दहन पर भूलकर भी ना करें ये काम, वरना होगा नुकसान

     

    देश में होली का त्योहार 29 मार्च को मनाया जाएगा। होली से एक दिन पहले यानी 28 मार्च को होलिका दहन किया जाता है। धर्म शास्त्रों के जानकारों की मानें तो होलिका दहन के दिन होलिका की पूजा की जाती है। ऐसे में होलिका की पूजा करने से महालक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और घर में सुख-समृद्धि और खुशहाली आती है। हालांकि होलिका दहन के दौरान कुछ ऐसे काम हैं जो आपको बिल्कुल भी नहीं करने चाहिए. जिसे करना अशुभ माना जाता है। जी हां, आज हम आपको बताने जा रहे है कि होलिका दहन के दिन कौन से काम नहीं करने चाहिए। तो चलिए जनते है... 

    - होलिका दहन में आम की लकड़ी को नहीं जलाना चाहिए। ऐसा करना काफी अशुभ माना जाता है। 

    - होलिका दहन के दिन भूलकर भी सफेद रंग की चीजें खाने पीने से बचना चाहिए। ऐसी मान्यता है कि इस दिन नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव अधिक रहता है इसलिए सफेद खाद्य पदार्थों का सेवन न इस दिन न करें।

    - होलिका दहन की रात जहां तक संभव हो किसी सुनसान या सन्नाटे वाली जगह पर अकेले न जाएं। 

    - वहीं, होलिका दहन की पूजा करते समय अपना सिर ढक कर ही पूजा करें। पुरुष चाहें तो टोपी लगा सकते हैं और महिलाएं साड़ी के पल्लू या दुपट्टे से अपना सिर ढंक सकती हैं। 

    - होलिका दहन वाले दिन न तो किसी को उधार पैसे दें और ना ही किसी से उधार पैसे लें। ऐसा करने से भी मां लक्ष्मी रूठ जाती हैं और धन की कमी का सामना करना पड़ सकता है। 

    - होलिका दहन के दिन दूसरों से लड़ाई-झगड़ा, वाद-विवाद या दूसरों का अपमान करने से बचें। ऐसा करने से घर में अशांति बनी रहती है।

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  • इस साल रामजन्मभूमि मंदिर में पहली बार होगा होली का उत्सव, उड़ेगा गुलाल, रामलला देंगे आशीर्वाद

    इस साल रामजन्मभूमि मंदिर में पहली बार होगा होली का उत्सव, उड़ेगा गुलाल, रामलला देंगे आशीर्वाद

     

    अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर में इस साल पहली बार होली पूरी भव्यता से मनाई जाएगी। ऐसे में यह पहली होली है जब राम लला की मूर्ति एक तंबू में नहीं बल्कि एक मंदिर में स्थापित की गई है। राम जन्मभूमि मंदिर के मुख्य पुजारी और आचार्य सत्येंद्र दास ने कहा, “राम लला तीन दशकों तक एक अस्थायी तम्बू के अंदर रहे और उन्हें उत्सव से दूर रखा गया। वह अपने जन्मस्थान की मुक्ति के बाद इस वर्ष भक्तों को आशीर्वाद देंगे।"

    वहीं, मंदिर ट्रस्ट के सदस्य डॉ. अनिल मिश्रा ने कहा, “मुगल बादशाह बाबर के सेनापति मीर बाकी के 1528 में परिसर पर हमला करने के बाद, यहां होली का उत्सव धूमधाम और पारंपरिक तरीके से नहीं मनाया जाता था। पांच सौ साल बाद हम राम लला के दरबार में रंगों का त्योहार मनाएंगे। एक नए युग की शुरूआत हो गई है।"

    ऐसे में राम लला के दरबार में उत्सव में प्राकृतिक रंगों और सुगंधित ‘गुलाल’ का इस्तेमाल किया जाएगा। मंदिर परिसर के विभिन्न हिस्सों को फूलों से सजाया जाएगा, जो देश के विभिन्न हिस्सों से लाए गए हैं।  राम मंदिर ट्रस्ट ने होली के लिए किए जाने वाले अनुष्ठानों पर पुजारियों के साथ चर्चा शुरू कर दी है। जश्न दोगुना हो जाएगा क्योंकि राम मंदिर का निर्माण भी शुरू हो गया है। 

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  • शुक्रवार के दिन संतोषी माता का व्रत करने से प्राप्त होते हैं ये शुभ फल, इन चीजों का रखें खास ख्याल

    शुक्रवार के दिन संतोषी माता का व्रत करने से प्राप्त होते हैं ये शुभ फल, इन चीजों का रखें खास ख्याल

     

    शुक्रवार का दिन मां संतोषी को समर्पित होता है। इस दिन संतोषी माता का व्रत भी किया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि शुक्रवार के दिन संतोषी माता की विधि-विधान के साथ पूजा करने से व्यक्ति की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इसके अलावा इस दिन मां संतोषी का व्रत रखने से व्यक्ति को मनचाहा फल प्राप्त होता है। साथ ही मां संतोषी अपने भक्तों पर कृपा बनाए रखती हैं।

    बता दें कि शुक्रवार के दिन मां संतोषी का व्रत करने के साथ ही उनकी कथा का पाठ करना भी काफी जरूरी होता है। माना जाता है कि कथा पढ़े बिना संतोषी माता का व्रत अधूरा होता है। इसके अलावा भी कई ऐसी बातें है जिसे शुक्रवार के दिन मां संतोषी के व्रत के दौरान ध्यान में रखनी चाहिए। तो आइए जानते है संतोषी माता के व्रत से होने वाले लाभ और व्रत के दौरान किन नियमों का पालन करना चाहिए उसके बारे में... 

    शुक्रवार के दिन संतोषी माता का व्रत करने से मिलते हैं ये लाभ 

    - अगर सच्चे मन से शुक्रवार की पूजा की जाए तो अविवाहित लड़कियों को सुयोग्य वर मिलता है। - संतोषी माता की अनुकंपा कर अगर व्रत पूरा किया जाए तो भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

    - यह व्रत करने से छात्र व छात्राएं परीक्षा में सफल होते हैं।

    - वहीं, अगर आपके कोई कार्ट के मामले चल रहे होते हैं तो उनपर आपको विजय प्राप्त होती है।

    - व्यक्ति को उसके कारोबार में लगातार लाभ की प्राप्ति होती है।

    - इसके अलावा इस दिन व्रत करने से घर में सुख-समृद्धि का पुण्यफल की प्राप्ति होती है। 

    शुक्रवार का व्रत करते समय इन नियमों का जरूर करें पालन 

    - इस दिन जो भी व्यक्ति व्रत करे वो चाहें स्त्री हो या पुरुष उसे खट्टी चीज को नहीं खाना चाहिए। साथ ही खट्टी चीज को छूना भी नहीं चाहिए। सिर्फ व्रती ही नहीं बल्कि घर के बाकी के लोगों को भी इस दिन खट्टी चीज नहीं खानी चाहिए।

    - इस दिन घर के किसी भी सदस्य को मदिरा पान नहीं करना चाहिए। साथ ही तामसिक भोजन भी ग्रहण नहीं करना चाहिए। इस दिन ऐसा करना अशुभ माना जाता है। माना जाता है कि व्रत करने वाले पर माता संतोषी मां की कृपा आती है। व्रत रखने वाले की मनोकामना पूरी होती है तो वहीं कुंवारो को योग्य जीवनसाथी मिल सकता है।

    - वहीं, संतोषी माता को भोग लगाने के लिए आप गुड़ और चने का इस्तेमाल करें। इस प्रसाद को खुद भी अवश्य खाएं।

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  • 17 मई को खुलेंगे केदारनाथ के कपाट, इस तारीख से शुरू होगी चारधाम यात्रा

    17 मई को खुलेंगे केदारनाथ के कपाट, इस तारीख से शुरू होगी चारधाम यात्रा

     

    विश्वप्रसिद्ध बाबा केदारनाथ के कपाट इस साल श्रद्धालुओं के लिए 17 मई को प्रात: पांच बजे खोले जाएंगे। चारधाम देवस्थानम प्रबंधन बोर्ड के एक प्रवक्ता ने बताया कि गुरुवार को महाशिवरात्रि के पर्व पर विधि विधान से रूद्रप्रयाग के उखीमठ के ओंकारेश्वर मंदिर में केदारनाथ मंदिर के कपाट खोलने का मुहूर्त निकाला गया। उन्होंने बताया कि बाबा केदार की डोली उनके शीतकालीन प्रवास स्थल उखीमठ से 14 मई को रवाना होगी। 

    बता दें कि केदारनाथ मंदिर के कपाट पिछले साल 16 नवंबर को बंद हुए थे। इससे पहले, बसंत पंचमी को एक अन्य धाम बदरीनाथ के कपाट 18 मई को सुबह सवा चार बजे खोले जाने का मुहूर्त निकाला गया था। बदरीनाथ धाम के कपाट 19 नवंबर को बंद कर दिए गए थे। वही, 14 मई को अक्षय तृतीया के पावन पर्व पर गंगोत्री और यमुनोत्री धामों के कपाट खुलने के साथ ही इस वर्ष की चारधाम यात्रा शुरू हो जाएगी।

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  • Mahashivratri 2021: महाशिवरात्रि आज, ऐसे करें जलाभिषेक, बरसेगी शिवकृपा, पूरी होगी मनोकामनाएं

    Mahashivratri 2021: महाशिवरात्रि आज, ऐसे करें जलाभिषेक, बरसेगी शिवकृपा, पूरी होगी मनोकामनाएं

     

    महाशिवरात्रि का त्योहार पूरे देश में धूमधाम से मनाया जाता है। आज यानी 11 मार्च 2021 को देश भर में महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जा रहा है। हिन्दू पंचांग के अनुसार, हर साल फाल्गुन मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तिथि को महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। इस वर्ष महाशिवरात्रि पर विशेष योग बन रहा है। इस दिन शिव योग के साथ सिद्ध योग भी बन रहा है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन जलाभिषेक करने से शिव भक्तों पर शिव भगवान की कृपा बरसेगी।

    जलाभिषेक में गाय के दूध का महत्व

    महाशिवरात्रि के त्योहार पर भगवान शिव की पूजा में गाय के दूध का विशेष महत्त्व है। क्योंकि गाय का दूध सबसे अधिक पवित्र और उत्तम माना गया है। ऐसा माना जाता है कि जल में थोड़ा सा दूध मिलाकर स्नान करने से मानसिक तनाव दूर होता है और चिताएं कम होती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जल में दूध मिलाकर जलाभिषेक करने से या शिवलिंग पर दूध चढ़ाने से सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।

    इस तरह करें जलाभिषेक

    हिंदू शास्त्रों के अनुसार, महाशिवरात्रि के दिन महादेव की पूजा करते समय बेल पत्र, शहद, दूध, दही, शक्कर और गंगाजल से जलाभिषेक करना चाहिए। माना जाता है कि ऐसा करने से भगवान शिव की कृपा हमेशा बनी रहती है। इससे शिवभक्त को कभी किसी समस्या का सामना नहीं करना पड़ता।

    विशेष है इस बार की महाशिवरात्रि

    इस बार महाशिवरात्रि पर त्रयोदशी और चतुर्दशी तिथियां पड़ रही हैं। इस लिए जलाभिषेक का महत्त्व और भी बढ़ गया है। हिंदू धर्मशास्त्रों के अनुसार, महाशिवरात्रि पर्व पर त्रयोदशी व चतुर्दशी में जलाभिषेक का विधान बताया गया है। त्रयोदशी तिथि 10 मार्च को दोपहर बाद 2.40 मिनट से शुरू हो रही है और यह 11 मार्च को 2.40 बजे त्रयोदशी समाप्त होगी उसके बाद तुरंत बाद चतुर्दशी प्रारंभ हो जाएगी।

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  • अब केवल प्री-बुकिंग कराने वाले ही कर सकेंगे महाशिवरात्रि पर महाकाल के दर्शन

    अब केवल प्री-बुकिंग कराने वाले ही कर सकेंगे महाशिवरात्रि पर महाकाल के दर्शन

     

    प्रमुख ज्योतिर्लिगों में से एक मध्य प्रदेश के उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में महाशिवरात्रि के मौके पर दर्शन करने के इच्छुक श्रद्धालुओं को प्री-बुकिंग करानी होगी। जी हां, महाशिवरात्रि के दिन केवल वही लोग दर्शन कर पाएंगे जिन्होंने प्री-बुकिंग करा रखी होगी। बता दें कि देशभर में महाशिवरात्रि का पर्व 11 मार्च को मनाया जाएगा। 

    वहीं, इस अवसर पर महाकालेश्वर मंदिर में कोविड से उत्पन्न परिस्थितियों को दृष्टिगत रखते हुए दर्शनार्थियों की संख्या को 25 हजार तक सीमित करने का निर्णय लिया गया है। ऐसे में जिन दर्शनार्थियों ने ऑनलाइन बुकिंग करवाई है, वे ही दर्शन कर सकेंगे।

    कलेक्टर एवं महाकालेश्वर मंदिर प्रबंध समिति के अध्यक्ष आशीष सिंह ने बताया कि ऑनलाइन बुकिंग के द्वारा निर्धारित समय पर पंजीयन के उपरांत ही दर्शनार्थियों को महाकाल मंदिर परिसर में आना होगा। मोबाइल नंबर व पंजीयन का सत्यापन कर दर्शनार्थियों को मंदिर में दर्शन हेतु प्रवेश दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि किसी भी स्थिति में पूर्व पंजीयन अथवा प्री-बुकिंग के बिना प्रवेश संभव नहीं हो सकेगा।

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  • उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में अब श्रद्धालुओं और पर्यटकों को मिलेगी ये खास सुविधा

    उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में अब श्रद्धालुओं और पर्यटकों को मिलेगी ये खास सुविधा

     

    मध्य प्रदेश की धार्मिक नगरी उज्जैन में स्थित देश के प्रमुख ज्योर्तिलिंगों में से एक महाकालेश्वर मंदिर के दर्शन करने आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों को आने वाले दिनों में गाइड की सुविधा मिलने लगेगी। इसके लिए प्रशासन के स्तर पर प्रयास शुरु हो गए हैं।

    सूत्रों के अनुसार, महाकालेश्वर मंदिर में पर्यटकों एवं श्रद्धालुओं के लिए गाइड की सुविधा हेतु नायब तहसीलदार एवं सहायक प्रशासक मूलचन्द जूनवाल को नोडल अधिकारी नियुक्त किया है। गौरतलब है कि महाकाल मंदिर में श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए गाइड की सुविधा प्रारम्भ की जानी है। उसी क्रम में जूनवाल द्वारा यह काम मंदिर प्रशासक एवं उज्जैन विकास प्राधिकरण के सीईओ के साथ मिलकर पूरा किया जाएगा।

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  • 18 मई को खुलेंगे बद्रीनाथ धाम के कपाट, बसंत पंचमी के अवसर पर की गई घोषणा

    18 मई को खुलेंगे बद्रीनाथ धाम के कपाट, बसंत पंचमी के अवसर पर की गई घोषणा

     

    उत्तराखंड के गढवाल हिमालय में स्थित विश्व प्रसिद्ध बद्रीनाथ धाम के कपाट इस साल श्रद्धालुओं के लिए 18 मई को खुलेंगे। बद्रीनाथ मंदिर को खोले जाने का मुहूर्त आज बसंत पंचमी के मौके पर नरेंद्रनगर स्थित टिहरी राजवंश के दरबार में आयोजित समारोह में निकाला गया।

    सूत्रों ने मंगलवार को बताया कि भगवान विष्णु को समर्पित बद्रीनाथ धाम के कपाट 18 मई को ब्रह्म मुहूर्त में सवा चार बजे खुलेंगे। बता दें कि बद्रीनाथ धाम के कपाट पिछले साल शीतकाल के लिए 19 नवंबर को बंद हुए थे। बद्रीनाथ सहित चारधामों के कपाट हर साल अक्टूबर-नवंबर में सर्दियों में बंद हो जाते हैं जो अगले साल फिर अप्रैल-मई में खुलते हैं।

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  • Basant Panchami 2021: बसंत पंचमी के दिन भूलकर भी न करें ये काम, वरना नाराज हो सकती हैं मां सरस्वती

    Basant Panchami 2021: बसंत पंचमी के दिन भूलकर भी न करें ये काम, वरना नाराज हो सकती हैं मां सरस्वती

     

    इस साल 16 फरवरी को बसंत पंचमी का पर्व मनाया जाएगा। बसंत पंचमी का यह पर्व हर साल माघ महीने में शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इसी माघ महीने में शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मां सरस्वती प्रकट हुईं थीं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन मां सरस्वती की पूरे विधि-विधान के साथ पूजा करने से व्यक्ति को ज्ञान की प्राप्ति होती है। वहीं, धर्मशास्त्र के अनुसार कुछ ऐसे भी कार्य हैं जिनको बसंत पंचमी के दिन करना वर्जित किया गया है। जी हां, ऐसे में आज हम आपको बताने जा रहा है कि बसंत पंचमी के दिन कौन से काम नहीं करने चाहिए। तो चलिए जानते है... 

    - मांस और मदिरा से रहें दूर 

    चूंकि बसंत पंचमी को विद्यारम्भ और कई अन्य तरह के शुभ कार्यों के लिए बहुत शुभ मुहूर्त माना जाता है। इसलिए इस दिन मांस और मदिरा से दूर रहना चाहिए। वहीं, इस दिन ब्रह्मचर्य धर्म का भी पालन करना चाहिए।

    - न पहने रंग-बिरंगे वस्त्र 

    ऐसी मान्यता है कि बसंत पंचमी के दिन काले या रंग-बिरंगे कपड़े नहीं पहनना चाहिए। चूंकि मां सरस्वती को पीला रंग अधिक पसंद है। इसलिए मां सरस्वती को पीला वस्त्र चढ़ाना चाहिए और स्वयं भी पीले रंग का वस्त्र पहनना चाहिए। 

    - बिना स्नान किए नहीं करना चाहिए भोजन 

    धर्मशास्त्र के अनुसार, बसंत पंचमी के दिन बिना स्नान किए भोजन भी नहीं करना चाहिए। अगर संभव हो तो इस दिन ज्ञान, कला और संगीति की देवी मां सरस्वती का व्रत रखना चाहिए और पूजा करने के बाद ही कुछ खाना चाहिए। 

    - इस दिन किसी के प्रति न लाएं मन में बुरे विचार  

    बसंत पंचमी के इस पावन पर्व पर किसी के प्रति अपने मन में न तो बुरे विचार लाना चाहिए और न ही किसी को अपशब्द कहना चाहिए। 

    - पेड़-पौधों को न काटे 

    बसंत पंचमी के दिन भूलकर भी पेड़-पौधों को नहीं काटना चाहिए। क्योंकि बसंत पंचमी के दिन ही बसंत ऋतु का आगमन होता है और इस दिन प्रकृति में बसंत ऋतु का सुन्दर तथा नवीन वातावरण पूरी तरह प्रकृति में छा जाता है।

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  • मंदिर में प्रवेश करने से पहले क्यों बजाई जाती है घंटी? जानें इसके पीछे का महत्व

    मंदिर में प्रवेश करने से पहले क्यों बजाई जाती है घंटी? जानें इसके पीछे का महत्व

     

    मंदिर के अंदर प्रवेश करने से पहले घंटी बजाने का प्रचलन पुराने समय से चलता आ रहा है। आमतौर पर मंदिर जाने वाले सभी लोग घंटी बजाकर ही अंदर जाते है। लेकिन क्‍या आपको पता है कि मंदिर में घुसने से पहले घंटी क्‍यों बजाई जाती है? शायद आपको ये नहीं पता होगा। ऐसे में आज हम आपको बताने जा रहे मंदिर में प्रवेश से पहले घंटी बजने के पीछे की वजह के बारे में। तो चलिए जानते है… 

    मंदिर में क्यों लगाते हैं घंटियां 

    ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, मंदिर में घंटी लगाने का केवल धार्मिक महत्‍व नहीं है बल्कि इसके पीछे वैज्ञानिक कारण भी है। घंटी की तेज आवाज जब वातावरण में गूंजती है तो उससे कंपन पैदा होता है। इससे हवा में मौजूद जीवाणु और सूक्ष्‍म जीव का नाश होता है और वातावरण शुद्ध होता है। ऐसा माना जाता है कि जिस भी स्‍थान पर घंटी की नियमित ध्‍वनि आती है वह स्‍थान हमेशा शुद्ध और पवित्र होता है। इस स्‍थान पर कभी भी नकारात्‍मक शक्तियां प्रवेश नहीं कर पाती हैं। इसलिए मंदिर में घंटियां लगाई जाती है। 

    क्‍या है मंदिर की घंटी बजने के पीछे धार्मिक महत्‍व 

    ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, घंटी बजाने से देवी-देवता के सामने आप अपनी हाजरी लगाते हैं। ऐसा माना जाता है कि घंटी बजाने से मंदिर में मौजूद देवी-देवताओं की मूर्तियों में चेतना आ जाती है। इससे पूजा अधिक फलदायक और प्रभावशाली होती है। वही, घंटी की आवाज से मन में अध्‍यात्मिक भाव आते हैं। घंटी की लय से खुद को जोड़ कर देखें आपको शांति महसूस होगी। इसके अलावा ग्रंथों में भी इस बात का जिक्र किया गया है कि घंटी बजाने से व्‍यक्ति पापमुक्‍त हो जाता है। हालांकि, यह आपके कर्मों पर भी निर्भर करता है। वही, पुराणों में कहा गया है कि सृष्टि की रचना के वक्‍त जो नाद गूंजी थी घंटी उसी का प्रतीक है। आज भी जब घर में किसी का जन्‍म होता है या किसी नए कार्य की शुरुआत की जाती है तो घंटी बजा कर लोग खुशी जाहिर करते हैं।

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  • मकर संक्रांति के दिन जरूर करें ये काम, जानिए इस त्यौहार का क्या है महत्व

    मकर संक्रांति के दिन जरूर करें ये काम, जानिए इस त्यौहार का क्या है महत्व

     

    देशभर में 14 जनवरी को मकर संक्रांति का त्योहार मनाया जाएगा। मकर संक्रांति का यह पर्व सूर्य देव से जुड़ा है। सूर्य जब राशि में भम्रण करता है तो उसे संक्रांति कहते हैं। इसी तरह से जब सूर्य धनु राशि से मकर में प्रवेश करता है, उसे मकर संक्रांति कहते हैं। मकर संक्रांति के दिन से सूर्य छह माह के लिए उत्तरायण होता है। यही कारण है कि देश के कई हिस्सों में इसे उत्तरायण पर्व भी कहते हैं। यह दिन हिन्दू धर्म में काफी शुभ माना जाता है और सारे शुभ कार्यों की शुरुआत अधिकतर इसी दिन से की जाती है। 

    इस मकर संक्रांति पर क्या करें? 

    मकर संक्रांति के दिन पहली होरा में स्नान करें,सूर्य को अर्घ्य दें। फिर श्रीमदभागवद के एक अध्याय का पाठ करें या गीता का पाठ करें। इसके अलावा नए अन्न,कम्बल और घी का दान करें। वही, भोजन में नए अन्न की खिचड़ी बनाएं। भोजन भगवान को समर्पित करके प्रसाद रूप से ग्रहण करें। 

    अलग-अलग नामों से मनाया जाता है मकर संक्रांति का पर्व 

    भारतवर्ष में मकर संक्रांति का पर्व अलग-अलग नामों से जाना जाता है, जैसे दक्षिणी राज्य तमिलनाडु में मकर संक्रांति के दिन पोंगल का पर्व मनाया जाता है। वहीं उत्तर-पूर्वी राज्य असम में, इसी दिन भोगाली-बिहु मनाए जाने का विधान है। बिहार में मकर संक्राति को खिचड़ी कहा जाता है, जबकि देश के कई अन्य राज्यों में इसे उत्तरायणी के नाम से भी मनाया जाता है। मकर संक्रांति केवल भारत में ही नहीं, बल्कि भारत के दूसरे पड़ोसी देश जैसे नेपाल, श्रीलंका में भी बहुत ही उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस दिन कई राज्यों में लोग पतंगबाजी समारोह के साथ मकर संक्रांति का उत्सव मनाते हैं।

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  • देशभर में आज मनाई जा रही लोहड़ी, जानें अग्नि में रेवड़ी-मूंगफली डालने का क्या है महत्व

    देशभर में आज मनाई जा रही लोहड़ी, जानें अग्नि में रेवड़ी-मूंगफली डालने का क्या है महत्व

     

    देशभर में आज लोहड़ी का त्यौहार मनाया जा रहा है। हर साल यह त्यौहार मकर संक्रांति के एक दिन पहले आता है। लोहड़ी खासतौर पर उत्तर भारत में मनाया जाने वाला त्यौहार है। इस दिन आग में तिल, गुड़, गजक, रेवड़ी और मूंगफली चढ़ाने का रिवाज होता है। लोहड़ी का त्यौहार किसानों का नया साल भी माना जाता है। इसके अलावा लोहड़ी को सर्दियों के जाने और बसंत के आने का संकेत भी माना जाता है। वही, कई जगहों पर लोहड़ी को तिलोड़ी भी कहा जाता है। 

    कैसे मनाई जाती है लोहड़ी

    लोहड़ी पर आग जलाकर या यूं कहें कि बोन फायर करके पूजा की जाती है। वही, पूजा के दौरान लोग आग में मूंगफली रेवड़ी, पॉपकॉर्न और गुड़ चढ़ाते हैं। आग में ये चीजें चढ़ाते समय ‘आधार आए दिलाथेर जाए’ बोला जाता है। इसका मतलब होता है कि घर में सम्मान आए और गरीबी जाए। इसके अलावा किसान सूर्य देवता को भी नमन कर धन्यवाद देते हैं। ये भी माना जाता है कि किसान खेतों में आग जलाकर अग्नि देव से खेतों की उत्पादन क्षमता बढ़ाने की प्रार्थना करते हैं। इसके बाद मूंगफली रेवड़ी, पॉपकॉर्न और गुड़ प्रसाद के रूप में बांटा जाता हैं। लोहड़ी के दिन पकवान के तौर पर मीठे गुड के तिल के चावल, सरसों का साग, मक्के की रोटी बनाई जाती है। लोग इस दिन गुड़-गज्जक खाना शुभ मानते हैं। पूजा के बाद लोग भांगड़ा और गिद्दा करते हैं। 

    लोहड़ी का महत्व 

    आमतौर लोहड़ी का त्यौहार सूर्य देव और अग्नि को आभार प्रकट करने, फसल की उन्नति की कामना करने के लिए मनाया जाता है। इसके अलावा लोहड़ी का महत्व एक और वजह से हैं क्योंकि इस दिन सूर्य मकर राशि से गुजर कर उत्तर की ओर रूख करता है। ज्योतिष के मुताबिक, लोहड़ी के बाद से सूर्य उत्तारायण बनाता है जिसे जीवन और सेहत से जोड़कर देखा जाता है। 

    क्यों मनाते हैं लोहड़ी 

    आपने लोहड़ी तो खूब मनाई होगी लेकिन क्या असल में आप जानते हैं क्यों मनाई जाती है लोहड़ी। बहुत से लोग लोहड़ी को साल का सबसे छोटा दिन और रात सबसे लंबी के तौर पर मनाते हैं। पारंपरिक मान्यता के अनुसार, लोहड़ी फसल की कटाई और बुआई के तौर पर मनाई जाती है। लोहड़ी को लेकर एक मान्यता ये भी है कि इस दिन लोहड़ी का जन्म होलिका की बहन के रूप में हुआ था। बेशक होलिका का दहन हो गया था। किसान लोहड़ी के दिन को नए साल की आर्थिक शुरुआत के रूप में भी मनाते हैं।

    इस दिन सुनी जाती है दुल्ला भट्टी की कहानी 

    लोहड़ी के दिन अलाव जलाकर उसके इर्द-गिर्द डांस किया जाता है। इसके साथ ही इस दिन आग के पास घेरा बनाकर दुल्ला भट्टी की कहानी सुनी जाती है। लोहड़ी पर दुल्ला भट्टी की कहानी सुनने का खास महत्व होता है। मान्यता है कि मुगल काल में अकबर के समय में दुल्ला भट्टी नाम का एक शख्स पंजाब में रहता था। उस समय कुछ अमीर व्यापारी सामान की जगह शहर की लड़कियों को बेचा करते थे, तब दुल्ला भट्टी ने उन लड़कियों को बचाकर उनकी शादी करवाई थी। कहते हैं तभी से हर साल लोहड़ी के पर्व पर दुल्ला भट्टी की याद में उनकी कहानी सुनाने की पंरापरा चली आ रही है।

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  • रामलला की आरती में अब 30 भक्त हो सकेंगे शामिल, ट्रस्‍ट हर रोज जारी करेगा पास

    रामलला की आरती में अब 30 भक्त हो सकेंगे शामिल, ट्रस्‍ट हर रोज जारी करेगा पास

     

    अयोध्‍या में बन रहे भव्य राम मंदिर के बीच अब भक्तों के लिए खुशी की खबर सामने आई है। अयोध्या आने वाले श्रद्धालु रामलला का दर्शन करने के साथ-साथ अब रामलला की संध्या आरती के भी साक्षी बनेंगे। इसके लिए श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट पास जारी करेगा। ऐसे में राम मंदिर के ट्रस्ट ने कोरोना वायरस को देखते हुए 30 श्रद्धालुओं को रोज आरती में शामिल होने की इजाजत दे दी है। बता दें कि अयोध्या के इतिहास में यह पहली बार होगा जब राम भक्त आरती में शामिल हो सकेंगे।

    श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के कार्यालय प्रभारी प्रकाश जी ने बताया कि रामलला की आरती में शामिल होने के लिये केवल 30 श्रद्धालुओं को अनुमति दी जाएगी। जिसके लिये उन्हें पास जारी किया जायेगा। श्रद्धालुओं को पास लेने के लिये अपना परिचय पत्र देना होगा। श्रद्धालुओं को पास लेने के बाद सायं 6 बजे श्रीरामजन्मभूमि परिसर के अंदर प्रवेश मिलेगा और 15 मिनट तक श्रद्धालु अंदर रहकर प्रभु राम के बाल रूप का दर्शन कर सकेंगे व आरती में शामिल हो सकेंगे।

    श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के कार्यालय प्रभारी के अनुसार, श्रद्धालुओं को जो पास जारी किया जायेगा, वह बारकोड से सुरक्षित रहेगा ताकि कोई इसका गलत इस्तेमाल न कर सकें।  वही, राम भक्तों को इस पास के लिए किसी भी तरीके का शुल्क नहीं देना होगा। रामलला के परिसर में श्रद्धालुओं को कोई भी इलेक्ट्रॉनिक वस्तु ले जाने की मनाही होगी।

    इसके अलावा राम जन्मभूमि ट्रस्ट ने श्रद्धालुओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए पहले ही राम जन्मभूमि परिसर में जाने वाले मार्ग पर सुरक्षा के तमाम इंतजाम किए हैं। इन इंतजामों में सबसे प्रमुख रुप से श्रद्धालुओं को छाव-पानी और बंदरों से बचने के उपाय हैं। अब संतो के आह्वान पर राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने श्रद्धालुओं को रामलला के आरती में शामिल होने का अवसर दिया है।

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