अध्यात्म

  • गुरु नानक देव जी के यह दस उपदेश अपनाएँ, जीवन सफल बनाएँ

    गुरु नानक देव जी के यह दस उपदेश अपनाएँ, जीवन सफल बनाएँ

     

    सिख धर्म के लोग गुरु नानक देव का जन्मदिन बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। सिख धर्म के संस्थापक गुरुनानक देव की 550वीं जयंती इस वर्ष 12 नवंबर यानी आज मनाई जा रही है। नानक साहिब का जन्म 15 अप्रैल 1469 को पंजाब के तलवंडी में हुआ था, जो कि अब पाकिस्तान में हैं। इस जगह को ननकाना साहिब के नाम से भी जाना जाता है।

    गुरु नानक जी ने अपने अनुयायियों को दस उपदेश दिए जो कि सदैव प्रासंगिक बने रहेंगे। गुरु नानक जी की शिक्षा का मूल निचोड़ यही है कि परमात्मा एक, अनन्त, सर्वशक्तिमान और सत्य है। वह सर्वत्र व्याप्त है। मूर्ति−पूजा आदि निरर्थक है। नाम−स्मरण सर्वोपरि तत्त्व है और नाम गुरु के द्वारा ही प्राप्त होता है। गुरु नानक की वाणी भक्ति, ज्ञान और वैराग्य से ओत−प्रोत है।

    गुरु नानक की शिक्षाएं आज भी सही रास्ते में चलने वाले लोगों का मार्ग दर्शन कर रही हैं। इनके अनुयायी इन्हें नानक और नानक देव, बाबा नानक और नानक शाह जी जैसे नामों से संबोधित करते हैं। कई चमत्कारिक घटनाओं की वजह से ये 7-8 साल की उम्र में ही काफी प्रसिद्ध हो गए थे। आइए गुरु नानक जयंती से पहले जानते हैं उनकी 10 बड़ी शिक्षाओं के बारे में...

    परम-पिता परमेश्वर एक है।

    हमेशा एक ईश्वर की साधना में मन लगाओ।

    दुनिया की हर जगह और हर प्राणी में ईश्वर मौजूद हैं।

    ईश्वर की भक्ति में लीन लोगों को किसी का डर नहीं सताता।

    ईमानदारी और मेहनत से पेट भरना चाहिए।

    बुरा कार्य करने के बारे में न सोचें और न ही किसी को सताएं।

    हमेशा खुश रहना चाहिए, ईश्वर से सदा अपने लिए क्षमा याचना करें।

    मेहनत और ईमानदारी की कमाई में से जरूरत मंद की सहायता करें।

    सभी को समान नज़रिए से देखें, स्त्री-पुरुष समान हैं।

    भोजन शरीर को जीवित रखने के लिए आवश्यक है. परंतु लोभ-लालच के लिए संग्रह करने की आदत बुरी है।

    और भी...

  • आज है कार्तिक पूर्णिमा, अयोध्या में भारी संख्या में श्रद्धालू लगा रहे सरयू नदी में आस्था की डुबकी

    आज है कार्तिक पूर्णिमा, अयोध्या में भारी संख्या में श्रद्धालू लगा रहे सरयू नदी में आस्था की डुबकी

     

    आज कार्तिक पूर्णिमा है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन स्नान का खास महत्व है। इस बार की कार्तिक पूर्णिमा इसलिए भी खास है, क्योंकि शनिवार को सुप्रीम कोर्ट से अयोध्या में राम मंदिर बनने का रास्ता साफ हो गया। आज अयोध्या में भारी संख्या में श्रद्धालू सरयू नदी में डुबकी लगा रहे हैं। आज अयोध्या में देव दीपावली भी मनाई जाएगी।

    कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही देव दीपावली मनाई जाती है। अयोध्या में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं। विवादित जमीन पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अयोध्या के मंदिरों में सामान्य पूजा-अर्चना हो रही है। सरयू के घाटों पर सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ है। नया घाट और राम की पैड़ी सहित अन्य घाटों पर लाखों श्रद्धालु सरयू नदी में स्नान कर रहे हैं।

    दरअसल कार्तिक का महीना हिंदुओं के लिए साल का सबसे पवित्र महीना माना जाता है। इस दौरान लोग पूरे महीने गंगा और अन्य पवित्र नदियों में स्नान करते हैं। कार्तिक पूर्णिमा का महत्व कुछ विशेष है। कहते हैं इस दिन स्नान करने से पुण्य फल की प्राप्ति होती है। कार्तिक मास को दामोदर के नाम से भी जाना जाता है। दामोदर विष्णु भगवान का ही एक नाम है। कार्तिक मास में पवित्र स्नान की शुरुआत शरद पूर्णिमा से होती है और इसका समापन कार्तिक पूर्णिमा को होता है। मांगलिक काम के लिए आज का दिन शुभ माना जाता है।

    और भी...

  • जानिए छठ पूजा का महत्व, 4 दिन तक चलने वाले इस पर्व पर जानिए क्या क्या होता है

    जानिए छठ पूजा का महत्व, 4 दिन तक चलने वाले इस पर्व पर जानिए क्या क्या होता है

     

    छठ पूजा का पर्व वर्ष में दो बार पूर्ण आस्था और श्रद्धा से मनाया जाता है। पहला छठ पर्व चैत्र माह में मनाया जाता है और दूसरा कार्तिक माह में। ये पर्व सूर्यदेव की पूजा के लिए प्रसिद्ध है। हिन्दू धर्म में इस पर्व का एक अलग ही महत्व है, जिसे पुरुष और स्त्री बहुत ही सहजता से पूरा करते है।

    छठ पूजा का आयोजन पूरे भारत वर्ष में बहुत ही बड़े पैमाने पर किया जाता है। ज्यादातर उत्तर भारत के लोग इस पर्व को मनाते है। भगवान सूर्य को समर्पित इस पूजा में सूर्य को अर्ग दिया जाता है। कई लोग इस पर्व को हठयोग भी कहते है। ऐसा माना जाता है कि भगवान सूर्य की पूजा विभिन्न प्रकार की बिमारियों को दूर करने की क्षमता रखता है और परिवार के सदस्यों को लम्बी आयु प्रदान करती है। चार दिनों तक मनाये जाने वाले इस पर्व के दौरान शरीर और मन को पूरी तरह से साधना पड़ता है।

    नहाय खाय के नाम से प्रशिद्ध इस दिन को छठ पूजा का पहला दिन माना जाता है, इस दिन नहाने और खाने की विधि की जाती है और आसपास के माहौल को साफ सुथरा किया जाता है। इस दिन लोग अपने घरों और बर्तनों को साफ़ करते है और शुद्ध-शाकाहारी भोजन कर इस पर्व का आरम्भ करते है।

    छठ पूजा के दूसरे दिन को खरना के नाम से जाना जाता है, इस दिन खरना की विधि की जाती है। खरना का असली मतलब पूरे दिन का उपवास होता है| इस दिन व्रती व्यक्ति निराजल उपवास रखते है। शाम होने पर साफ सुथरे बर्तनों और मिट्टी के चुल्हे पर गुड़ के चावल, गुड़ की खीर और पुड़ीयाँ बनायी जाती है और इन्हें प्रसाद स्वरुप बांटा जाता है।

    तीसरे दिन शाम को भगवान सूर्य को अर्ध्य दिया जाता है। सूर्य षष्ठी के नाम से प्रशिद्ध इस दिन को छठ पूजा के तीसरे दिन के रूप में मनाया जाता है। इस पावन दिन को पुरे दिन निराजल उपवास रखा जाता है और शाम में डूबते सूर्य को अर्ग दिया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शाम के अर्ग के बाद छठी माता के गीत गाये जाते है और व्रत कथाये सुनी जाती है।

    छठ पूजा के चौथे दिन सुबह सूर्योदय के वक़्त भगवान सूर्य को अर्ग दिया जाता है। आज के दिन सूर्य निकलने से पहले ही व्रती व्यक्ति को घाट पर पहुचना होता है और उगते हुए सूर्य को अर्ग देना होता है। अर्ग देने के तुरंत बाद छठी माता से घर-परिवार की सुख-शांति और संतान की रक्षा का वरदान माँगा जाता है। इस पावन पूजन के बाद सभी में प्रसाद बांट कर व्रती खुद भी प्रसाद खाकर व्रत खोलते है।

    और भी...

  • आज है गोवर्धन पूजा, जाने इसका महत्व और पूजा करने का शुभ मुहूर्त

    आज है गोवर्धन पूजा, जाने इसका महत्व और पूजा करने का शुभ मुहूर्त

     

    कार्तिक कृष्ण पक्ष की उदया तिथि अमावस्या और सोमवार का दिन है। अमावस्या की रात यानि दीवाली की रात बीत चुकी है। अमावस्या तिथि 28 अक्टूबर की सुबह 09 बजकर 09 मिनट तक है, इसके बाद कार्तिक शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि शुरु हो जाएगी। जिसके साथ ही गोवर्धन पूजा और बलि प्रतिपदा है का पर्व मनाया जाएगा। इस बार गोवर्धन पूजा 28 अक्टूबर,यानी आज है।

    गोवर्द्धन पूजा तिथि, शुभ मुहूर्त

    प्रतिपदा तिथि प्रारंभ: सुबह 09 बजकर 08 मिनट से (28 अक्टूबर)

    प्रतिपदा तिथि समाप्‍त: सुबह 9 बजकर 13 मिनट तक (29 अक्टूबर)

    गोवर्द्धन पूजा मुहूर्त: दोपहर 03 बजकर 23 मिनट से शाम 05 बजकर 36 मिनट तक

    अन्नकूट के अलावा आज के दिन गौ पूजा का विशेष महत्व है। देवल ऋषि की देवल स्मृति के अनुसार आज के दिन गायों की पूजा की जानी चाहिए । आज के दिन गायों को दुहा नहीं जाता, बल्कि उनकी सेवा की जाती है। आज के दिन गायों के सिंगों पर तेल और गेरू लगाना चाहिए और उनके खुरों को अच्छे से साफ करना चाहिए। ऐसा करने से गौ माता के आशीर्वाद से आपके ऊपर कभी भी कोई संकट नहीं आयेगा और आपकी तरक्की होगी।

    और भी...

  • दीपावली के दिन जाने पूजा का शुभ मुहूर्त और कैसे करे पूजा

    दीपावली के दिन जाने पूजा का शुभ मुहूर्त और कैसे करे पूजा

     

    हिंदू कैलेंडर के कार्तिक महीने की अमावस्या को लक्ष्मी के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए घर को साफ और पवित्र किया जाता है और दीपक जलाए जाते हैं। दीपकों की पंक्ति बनने के कारण ही इस महापर्व को दीपावली कहा गया है।

    खरीदारी और पूजा के मुहूर्त

    सुबह 08:10 से 11:55 तक

    दोपहर 01:35 से 02:50 तक

    शाम 05:40 से रात 10:20 तक

    पूजा के स्थान पर लक्ष्मीजी और गणेशजी की मूर्तियां स्थापित करें। ये मूर्तियां इस तरह रखें कि उनका मुख पूर्व या पश्चिम में रहे। कलश को लक्ष्मीजी के पास चावल पर रखें। नारियल को लाल वस्त्र में इस प्रकार लपेटें कि नारियल का आगे का भाग दिखाई दे और इसे कलश पर रखें। यह कलश वरुणदेव का प्रतीक है।

    घर को साफ कर पूजा-स्थान को भी पवित्र कर लें और स्वयं भी स्नान आदि कर श्रद्धा-भक्तिपूर्वक शाम के समय शुभ मुहूर्त में महालक्ष्मी और भगवान श्रीगणेश की पूजा करें। दिवाली पूजन के लिए किसी चौकी या कपड़े के पवित्र आसन पर गणेशजी के दाहिने भाग में महालक्ष्मी की मूर्ति स्थापित करें।

    और भी...

  • दिवाली से एक दिन पहले क्यों मनाई जाती है छोटी दिवाली

    दिवाली से एक दिन पहले क्यों मनाई जाती है छोटी दिवाली

     

    हम सब जानते ही हैं कि बड़ी दिवाली से एक दिन पहले नरक चतुर्दशी यानि छोटी दिवाली मनाई जाती है। खास बात यह है कि छोटी दिवाली की रात में घरों में बुजुर्ग व्यक्ति द्वारा एक दीपक जलाकर पूरे घर में घुमाया जाता है और उस दीपक को घर से बाहर कहीं दूर रख दिया जाता है। इस दिन घरों में मृत्यु के देवता यम की पूजा का भी प्रावधान है लेकिन क्या आप जानते हैं कि बड़ी दिवाली से ठीक एक दिन पहले छोटी दिवाली क्यों मनाई जाती है।

    एक बार रति देव नाम के एक राजा थे। उन्होंने अपने जीवन में कभी कोई पाप नहीं किया था, लेकिन एक दिन उनके समक्ष यमदूत आ खड़े हो गए। यमदूत को सामने देख राजा अचंभित हुए और बोले मैंने तो कभी कोई पाप नहीं किया फिर भी क्या मुझे नरक जाना होगा? यह सुनकर यमदूत ने कहा कि हे राजन एक बार आपके द्वार से एक ब्राह्मण भूखा लौट गया था, यह उसी पाप का फल है। यह सुनकर राजा ने प्रायश्चित करने के लिए यमदूत से एक वर्ष का समय मांगा। यमदूतों ने राजा को एक वर्ष का समय दे दिया।

    राजा ऋषियों के पास पहुंचे और उन्हें सारी कहानी सुनाकर अपनी इस दुविधा से मुक्ति का उपाय पूछा। तब ऋषि ने उन्हें बताया कि कार्तिक मास में कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी का व्रत करें और ब्राह्मणों को भोजन करवाएं। राजा ने ऋषि की आज्ञानुसार वैसा ही किया और पाप मुक्त हो गए। इसके पश्चात उन्हें विष्णु लोक में स्थान प्राप्त हुआ। उस दिन से पाप और नर्क से मुक्ति हेतु कार्तिक चतुर्दशी के दिन व्रत और दीप जलाने का प्रचलन हो गया।

    कहते है कि छोटी दिवाली के दिन सूरज उगने से पहले स्नान करने से स्वर्ग की प्राप्ति हो जाती है। स्नान करने के बाद विष्णु मंदिर या कृष्ण मंदिर में भगवान का दर्शन अवश्य करना चाहिए। साथ ही साथ उनके सौंदर्य में भी वृद्धि होती है और अकाल मृत्यु का खतरा भी टल जाता है। शास्त्रों के अनुसार नरक चतुर्दशी कलयुग में जन्में लोगों के लिए बहुत उपयोगी है इसलिए कलयुगी मनुष्य को इस दिन के नियमों और महत्व को समझना चाहिए।

     

    और भी...

  • मनाया जा रहा है देशभर में धनतेरस का पर्व, जाने पूजा का शुभ मुहूर्त

    मनाया जा रहा है देशभर में धनतेरस का पर्व, जाने पूजा का शुभ मुहूर्त

     

    देशभर में आज धनतेरस का पर्व मनाया जाएगा। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाए जाने वाले इस पर्व का हिन्दू परंपरा में खास महत्व है। इस दिन विशेष तौर पर धन की देवी माता लक्ष्मी, कुबेर और यमराज के पूजन का विधान है। इस दिन अमीर-गरीब सभी कुछ न कुछ खरीदारी करते हैं। मान्यता है कि इस दिन कुछ खरीदने से माता लक्ष्मी की पूरे साल कृपा बनी रहती है।

    धनतेरस के दिन से ही दिवाली की भी शुरुआत हो जाती है। आगे हम आपको आज के दिन का शुभ मुहूर्त और पूजा विधि बताएं इससे पहले यह जान लीजिए कि धनतेरस का पर्व क्यों मनाया जाता है और इसके पीछे की क्या मान्यताएं हैं। दरअसल, मान्यता है कि इसी दिन समुद्र मंथन से भगवान धन्वंतरि प्रकट हुए थे। मान्यता है कि इस दिन खरीदारी करने से धनों में 13 गुना वृद्धि होती है। कथाओं के अनुसार भगवान धन्वंतरि जब प्रकट हुए थे तो उनके हाथ में एक अमृत कलश था। यह भी एक कारण है कि लोग इस दिन बर्तन खरीदने को प्राथमिकता देते हैं।

    धनतेरस पर पूजा का शुभ मुहूर्त

    शाम 7 बजकर 10 मिनट से 8 बजकर 15 मिनट तक

    प्रदोष काल-5 बजकर 42 मिनट से 8 बजकर 15 मिनट तक

    वृषभ काल-6 बजकर 51 मिनट से 8 बजकर 47 मिनट तक

    धनतेरस की शाम को तिल के तेल से आटे या पीतल का दीप जलाएं। शाम की पूजा में सबसे पहले गणेशजी की पूजा करें और इसके बाद गणेशजी की पूजा करें। लक्ष्मीजी की पूजा करने के बाद भगवान धन्वंतरि और यमराज जी की पूजा करें। पूजा के बाद दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके यमराज को जल दें। पूजा के बाद अनाज का दान करें। आपको बता दें कि धनतेरस के दिन गणेशजी की स्थापना करने विशेष लाभ होता है।

    और भी...

  • जानिए आखिर क्या होती है करवा चौथ की पूजा-विधि और व्रत के नियम

    जानिए आखिर क्या होती है करवा चौथ की पूजा-विधि और व्रत के नियम

     

    करवा चौथ का त्यौहार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है। इस दिन विवाहित स्त्रियाँ अपने पति की दीर्घायु के लिए व्रत रखती है। साथ ही अच्छे वर की कामना से अविवाहिता स्त्रियों के करवा चौथ व्रत रखने की भी परम्परा है। यह पर्व पूरे उत्तर भारत में ज़ोर-शोर से मनाया जाता है।

    करवा चौथ व्रत के नियम

    यह व्रत सूर्योदय से पहले से शुरू कर चांद निकलने तक रखना चाहिए और चन्द्रमा के दर्शन के पश्चात ही इसको खोला जाता है।

    शाम के समय चंद्रोदय से 1 घंटा पहले सम्पूर्ण शिव-परिवार की पूजा की जाती है।

    पूजन के समय देव-प्रतिमा का मुख पश्चिम की तरफ़ होना चाहिए तथा स्त्री को पूर्व की तरफ़ मुख करके बैठना चाहिए।

    करवा चौथ व्रत की पूजा-विधि

    सुबह सूर्योदय से पहले स्नान आदि करके पूजा घर की सफ़ाई करें। फिर सास द्वारा दिया हुआ भोजन करें और भगवान की पूजा करके निर्जला व्रत का संकल्प लें।

    यह व्रत उनको संध्या में सूरज अस्त होने के बाद चन्द्रमा के दर्शन करके ही खोलना चाहिए और बीच में जल भी नहीं पीना चाहिए।

    संध्या के समय एक मिट्टी की वेदी पर सभी देवताओं की स्थापना करें। इसमें 10 से 13 करवे रखें।

    पूजन-सामग्री में धूप, दीप, चन्दन, रोली, सिन्दूर आदि थाली में रखें। दीपक में पर्याप्त मात्रा में घी रहना चाहिए, जिससे वह पूरे समय तक जलता रहे।

    चन्द्रमा निकलने से लगभग एक घंटे पहले पूजा शुरू की जानी चाहिए। अच्छा हो कि परिवार की सभी महिलाएँ साथ पूजा करें।

    पूजा के दौरान करवा चौथ कथा सुनें या सुनाएँ।

    चन्द्र दर्शन छलनी के द्वारा किया जाना चाहिए और साथ ही दर्शन के समय अर्घ्य के साथ चन्द्रमा की पूजा करनी चाहिए।

    चन्द्र-दर्शन के बाद बहू अपनी सास को थाली में सजाकर मिष्ठान, फल, मेवे, रूपये आदि देकर उनका आशीर्वाद ले और सास उसे अखंड सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद दे।

     

    और भी...

  • कब है इस बार शरद पूर्णिमा और जाने शरद पूर्णिमा की पूजा विधि

    कब है इस बार शरद पूर्णिमा और जाने शरद पूर्णिमा की पूजा विधि

     

    शरद पूर्णिमा का हिन्‍दू धर्म में विशेष महत्‍व है। मान्‍यता है कि शरद पूर्णिमा का व्रत करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इसे कोजागरी पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। इस बार शरद पूर्णिमा 13 अक्‍टूबर को है। यह पूर्णिमा अन्‍य पूर्णिमा की तुलना में काफी लोकप्रिय है। मान्‍यता है कि यही वो दिन है जब चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से युक्‍त होकर धरती पर अमृत की वर्षा करता है।

    दरअसल, हिन्‍दू धर्म में मनुष्‍य के एक-एक गुण को किसी न किसी कला से जोड़कर देखा जाता है। माना जाता है कि 16 कलाओं वाला पुरुष ही सर्वोत्तम पुरुष है। कहा जाता है कि श्री हरि विष्‍णु के अवतार भगवान श्रीकृष्‍ण ने 16 कलाओं के साथ जन्‍म लिया था, जबकि भगवान राम के पास 12 कलाएं थीं। बहरहाल, शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा, माता लक्ष्‍मी और विष्‍णु जी की पूजा का विधान है। साथ ही शरद पूर्णिमा की रात खीर बनाकर उसे आकाश के नीचे रखा जाता है।

    फिर 12 बजे के बाद उसका प्रसाद गहण किया जाता है। मान्‍यता है कि इस खीर में अमृत होता है और यह कई रोगों को दूर करने की शक्ति रखती है। शरद पूर्णिमा के दिन ही वाल्‍मीकि जयंती मनाई जाती है।

    शरद पूर्णिमा की पूजा विधि

    शरद पूर्णिमा के दिन सुबह उठकर स्‍नान करने के बाद व्रत का संकल्‍प लें।

    घर के मंदिर में घी का दीपक जलाएं।

    इसके बाद ईष्‍ट देवता की पूजा करें।

    फिर भगवान इंद्र और माता लक्ष्‍मी की पूजा की जाती है।

    अब धूप-बत्ती से आरती उतारें।

    संध्‍या के समय लक्ष्‍मी जी की पूजा करें और आरती उतारें।

    अब चंद्रमा को अर्घ्‍य देकर प्रसाद चढ़ाएं और आारती करें।

    अब उपवास खोल लें।

    रात 12 बजे के बाद अपने परिजनों में खीर का प्रसाद बांटें।

    और भी...

  • शरद पूर्णिमा का वैज्ञानिक महत्व, इस रात चंद्रमा से बढ़ जाती है औषधियों की ताकत

    शरद पूर्णिमा का वैज्ञानिक महत्व, इस रात चंद्रमा से बढ़ जाती है औषधियों की ताकत

     

    इस वर्ष शरद पूर्णिमा 13 अक्टूबर को है और इसका हमारे जीवन में बहुत महत्व है और एक अध्ययन के अनुसार शरद पूर्णिमा के दिन औषधियों की स्पंदन क्षमता अधिक होती है। रसाकर्षण के कारण जब अंदर का पदार्थ सांद्र होने लगता है, तब रिक्तिकाओं से विशेष प्रकार की ध्वनि उत्पन्न होती है।

    रावण शरद पूर्णिमा की रात किरणों को दर्पण के माध्यम से अपनी नाभि पर ग्रहण करता था। इस प्रक्रिया से उसे पुनर्योवन शक्ति प्राप्त होती थी। चांदनी रात में 10 से मध्यरात्रि 12 बजे के बीच कम वस्त्रों में घूमने वाले व्यक्ति को ऊर्जा प्राप्त होती है। सोमचक्र, नक्षत्रीय चक्र और आश्विन के त्रिकोण के कारण शरद ऋतु से ऊर्जा का संग्रह होता है और बसंत में निग्रह होता है।

    अध्ययन के अनुसार दुग्ध में लैक्टिक अम्ल और अमृत तत्व होता है। यह तत्व किरणों से अधिक मात्रा में शक्ति का शोषण करता है। चावल में स्टार्च होने के कारण यह प्रक्रिया और आसान हो जाती है। इसी कारण ऋषि-मुनियों ने शरद पूर्णिमा की रात्रि में खीर खुले आसमान में रखने का विधान किया है। यह परंपरा विज्ञान पर आधारित है।

    शोध के अनुसार खीर को चांदी के पात्र में बनाना चाहिए। चांदी में प्रतिरोधकता अधिक होती है। इससे विषाणु दूर रहते हैं। हल्दी का उपयोग निषिद्ध है। प्रत्येक व्यक्ति को कम से कम 30 मिनट तक शरद पूर्णिमा का स्नान करना चाहिए। रात्रि 10 से 12 बजे तक का समय उपयुक्त रहता है।

    वर्ष में एक बार शरद पूर्णिमा की रात दमा रोगियों के लिए वरदान बनकर आती है। इस रात्रि में दिव्य औषधि को खीर में मिलाकर उसे चांदनी रात में रखकर सुबह 4 बजे सेवन किया जाता है। रोगी को रात्रि जागरण करना पड़ता है और औ‍षधि सेवन के पश्चात 2-3 किमी पैदल चलना लाभदायक रहता है। 

    और भी...

  • असत्य पर सत्य की जीत का पर्व है दशहरा, श्रीराम की ये सीख है जीवन के लिए महत्व

    असत्य पर सत्य की जीत का पर्व है दशहरा, श्रीराम की ये सीख है जीवन के लिए महत्व

     

    असत्य पर सत्य की जीत का पर्व है दशहरा, इस दिन को बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनया जाता है। इस बार दशहरा 8 अक्टूबरको यानी आज पूरे देश में मनाया जा रहा है। दशहरा हिन्दुओं का प्रमुख त्योहार है। अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को इसका आयोजन होता है। भगवान राम ने इसी दिन रावण का वध किया था तथा देवी दुर्गा ने नौ रात्रि एवं दस दिन के युद्ध के उपरान्त महिषासुर पर विजय प्राप्त किया था। इसे असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है। इसीलिये इस दशमी को 'विजयादशमी' के नाम से जाना जाता है।

    मान्यता है कि विजयादशमी के दिन सभी प्रकार के मांगलिक कार्य किए जा सकते हैं और इस दिन जो कार्य शुरू किया जाता है उसमें सफलता अवश्य मिलती है। यही वजह है कि प्राचीन काल में राजा इसी दिन विजय की कामना से रण यात्रा के लिए प्रस्थान करते थे। इस दिन जगह-जगह मेले लगते हैं, रामलीला का आयोजन होता है और रावण का विशाल पुतला बनाकर उसे जलाया जाता है। इस दिन बच्चों का अक्षर लेखन, दुकान या घर का निर्माण, गृह प्रवेश, मुंडन, अन्न प्राशन, नामकरण, कारण छेदन, यज्ञोपवीत संस्कार आदि शुभ कार्य किए जा सकते हैं। क्षत्रिय अस्त्र-शास्त्र का पूजन भी विजयादशमी के दिन ही करते हैं।

    हम सब के लिए इस पर्व में श्रीराम की सीख मानवीय जीवन में बहुउपयोगी सिद्ध होगी। हमें अपने जीवन में अहंकार, लोभ, लालच और अत्याचारी वृत्तियों को त्यागकर क्षमारूपी बनकर जीवन जीना चाहिए। भगवान श्रीराम की यह सीख बहुत ही सच्ची और हमें मोक्ष प्राप्ति की ओर ले जाने वाली है।

    और भी...

  • NAVRATRI 2019: 9वें दिन होती है माँ दुर्गाजी की उपासना, इनकी कृपा से हो सकता है मोक्ष प्राप्त

    NAVRATRI 2019: 9वें दिन होती है माँ दुर्गाजी की उपासना, इनकी कृपा से हो सकता है मोक्ष प्राप्त

     

    माँ दुर्गाजी की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री हैं। ये सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं। नवरात्र-पूजन के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है। इस दिन शास्त्रीय विधि-विधान और पूर्ण निष्ठा के साथ साधना करने वाले साधक को सभी सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है। सृष्टि में कुछ भी उसके लिए अगम्य नहीं रह जाता है। ब्रह्मांड पर पूर्ण विजय प्राप्त करने की सामर्थ्य उसमें आ जाती है।

    मार्कण्डेय पुराण के अनुसार अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व, ये आठ सिद्धियाँ होती हैं। ब्रह्मवैवर्त पुराण के श्रीकृष्ण जन्म खंड में यह संख्या अठारह बताई गई है। माँ सिद्धिदात्री भक्तों और साधकों को ये सभी सिद्धियाँ प्रदान करने में समर्थ हैं। देवीपुराण के अनुसार भगवान शिव ने इनकी कृपा से ही इन सिद्धियों को प्राप्त किया था। इनकी अनुकम्पा से ही भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ था। इसी कारण वे लोक में 'अर्द्धनारीश्वर' नाम से प्रसिद्ध हुए।

    माँ सिद्धिदात्री चार भुजाओं वाली हैं। इनका वाहन सिंह है। ये कमल पुष्प पर भी आसीन होती हैं। इनकी दाहिनी तरफ के नीचे वाले हाथ में कमलपुष्प है। प्रत्येक मनुष्य का यह कर्तव्य है कि वह माँ सिद्धिदात्री की कृपा प्राप्त करने का निरंतर प्रयत्न करे। उनकी आराधना की ओर अग्रसर हो। इनकी कृपा से अनंत दुख रूप संसार से निर्लिप्त रहकर सारे सुखों का भोग करता हुआ वह मोक्ष को प्राप्त कर सकता है।

    नवदुर्गाओं में माँ सिद्धिदात्री अंतिम हैं। अन्य आठ दुर्गाओं की पूजा उपासना शास्त्रीय विधि-विधान के अनुसार करते हुए भक्त दुर्गा पूजा के नौवें दिन इनकी उपासना में प्रवत्त होते हैं। इन सिद्धिदात्री माँ की उपासना पूर्ण कर लेने के बाद भक्तों और साधकों की लौकिक, पारलौकिक सभी प्रकार की कामनाओं की पूर्ति हो जाती है। सिद्धिदात्री माँ के कृपापात्र भक्त के भीतर कोई ऐसी कामना शेष बचती ही नहीं है, जिसे वह पूर्ण करना चाहे। वह सभी सांसारिक इच्छाओं, आवश्यकताओं और स्पृहाओं से ऊपर उठकर मानसिक रूप से माँ भगवती के दिव्य लोकों में विचरण करता हुआ उनके कृपा-रस-पीयूष का निरंतर पान करता हुआ, विषय-भोग-शून्य हो जाता है।

    ऐसा माना गया है कि माँ भगवती का स्मरण, ध्यान, पूजन, हमें इस संसार की असारता का बोध कराते हुए वास्तविक परम शांतिदायक अमृत पद की ओर ले जाने वाला है। विश्वास किया जाता है कि इनकी आराधना से भक्त को अणिमा, लधिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, महिमा, ईशित्व, सर्वकामावसायिता, दूर श्रवण, परकामा प्रवेश, वाकसिद्ध, अमरत्व भावना सिद्धि आदि समस्त सिद्धियों नव निधियों की प्राप्ति होती है। ऐसा कहा गया है कि यदि कोई इतना कठिन तप न कर सके तो अपनी शक्तिनुसार जप, तप, पूजा-अर्चना कर माँ की कृपा का पात्र बन सकता ही है।

    और भी...

  • NAVRATRI 2019: 7वें दिन होती है माँ कालरात्रि की पूजा,करनी चाहिए एकनिष्ठ भाव से उपासना

    NAVRATRI 2019: 7वें दिन होती है माँ कालरात्रि की पूजा,करनी चाहिए एकनिष्ठ भाव से उपासना

     

    माँ दुर्गा की सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती हैं दुर्गा पूजा के सातवें दिन माँ कालरात्रि की उपासना का विधान है। इस दिन साधक का मन सहस्रार चक्र में स्थित रहता है। इसके लिए ब्रह्मांड की समस्त सिद्धियों का द्वार खुलने लगता है। देवी कालात्रि को व्यापक रूप से माता देवी काली, महाकाली, भद्रकाली, भैरवी, रुद्रानी, चामुंडा, चंडी और दुर्गा के कई विनाशकारी रूपों में से एक माना जाता है। रौद्री और धुमोरना देवी कालात्री के अन्य कम प्रसिद्ध नामों में हैं |

    यह ध्यान रखना जरूरी है कि नाम, काली और कालरात्रि का उपयोग एक दूसरे के परिपूरक है, हालांकि इन दो देवीओं को कुछ लोगों द्वारा अलग-अलग सत्ताओं के रूप में माना गया है। माना जाता है कि देवी के इस रूप में सभी राक्षस,भूत, प्रेत, पिसाच और नकारात्मक ऊर्जाओं का नाश होता है, जो उनके आगमन से पलायन करते हैं |

    माँ कालरात्रि का स्वरूप देखने में अत्यंत भयानक है, लेकिन ये सदैव शुभ फल ही देने वाली हैं। इसी कारण इनका एक नाम शुभंकारी भी है। अतः इनसे भक्तों को किसी प्रकार भी भयभीत अथवा आतंकित होने की आवश्यकता नहीं है। माँ कालरात्रि दुष्टों का विनाश करने वाली हैं। दानव, दैत्य, राक्षस, भूत, प्रेत आदि इनके स्मरण मात्र से ही भयभीत होकर भाग जाते हैं। ये ग्रह-बाधाओं को भी दूर करने वाली हैं। इनके उपासकों को अग्नि-भय, जल-भय, जंतु-भय, शत्रु-भय, रात्रि-भय आदि कभी नहीं होते। इनकी कृपा से वह सर्वथा भय-मुक्त हो जाता है।

    माँ कालरात्रि के स्वरूप-विग्रह को अपने हृदय में अवस्थित करके मनुष्य को एकनिष्ठ भाव से उपासना करनी चाहिए। यम, नियम, संयम का उसे पूर्ण पालन करना चाहिए। मन, वचन, काया की पवित्रता रखनी चाहिए। वे शुभंकारी देवी हैं। उनकी उपासना से होने वाले शुभों की गणना नहीं की जा सकती। हमें निरंतर उनका स्मरण, ध्यान और पूजा करना चाहिए।

     

    और भी...

  • NAVRATRI 2019: छठे दिन होती है माँ कात्यायनी की पूजा, होती है अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष की प्राप्ति

    NAVRATRI 2019: छठे दिन होती है माँ कात्यायनी की पूजा, होती है अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष की प्राप्ति

     

    कात्यायनी नवदुर्गा या हिंदू देवी पार्वती के नौ रूपों में छठवीं रूप हैं। कात्यायनी अमरकोष में पार्वती के लिए दूसरा नाम है, संस्कृत शब्दकोश में उमा, कात्यायनी, गौरी, काली, ईश्वरी इन्हीं के अन्य नाम हैं। शक्तिवाद में उन्हें शक्ति या दुर्गा, जिसमे भद्रकाली और चंडिका भी शामिल है, में भी प्रचलित हैं। यजुर्वेद के तैत्तिरीय आरण्यक में उनका उल्लेख प्रथम किया है।

    स्कन्द पुराण में उल्लेख है कि वे परमेश्वर के नैसर्गिक क्रोध से उत्पन्न हुई थीं, जिन्होंने देवी पार्वती द्वारा दी गई सिंह पर आरूढ़ होकर महिषासुर का वध किया। वे शक्ति की आदि रूपा है, जिसका उल्लेख पाणिनि पर पतञ्जलि के महाभाष्य में किया गया है, जो दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में रचित है।

    परम्परागत रूप से देवी दुर्गा की तरह वे लाल रंग से जुड़ी हुई हैं। नवरात्रि उत्सव के षष्ठी को उनकी पूजा की जाती है। उस दिन साधक का मन आज्ञा चक्र में स्थित होता है। योगसाधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। इस चक्र में स्थित मन वाला साधक माँ कात्यायनी के चरणों में अपना सर्वस्व निवेदित कर देता है। परिपूर्ण आत्मदान करने वाले ऐसे भक्तों को सहज भाव से माँ के दर्शन प्राप्त हो जाते हैं।

    माँ कात्यायनी अमोघ फलदायिनी हैं। भगवान कृष्ण को पतिरूप में पाने के लिए ब्रज की गोपियों ने इन्हीं की पूजा कालिन्दी-यमुना के तट पर की थी। ये ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित हैं।

    माँ कात्यायनी का स्वरूप अत्यंत चमकीला और भास्वर है। इनकी चार भुजाएँ हैं। माताजी का दाहिनी तरफ का ऊपरवाला हाथ अभयमुद्रा में तथा नीचे वाला वरमुद्रा में है। बाईं तरफ के ऊपरवाले हाथ में तलवार और नीचे वाले हाथ में कमल-पुष्प सुशोभित है। इनका वाहन सिंह है। माँ कात्यायनी की भक्ति और उपासना द्वारा मनुष्य को बड़ी सरलता से अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति हो जाती है। वह इस लोक में स्थित रहकर भी अलौकिक तेज और प्रभाव से युक्त हो जाता है।

     

    और भी...

  • NAVRATRI 2019: नवरात्रि पर्व के 5वें दिन होती है स्कंदमाता की उपासना, इनका वाहन सिंह है

    NAVRATRI 2019: नवरात्रि पर्व के 5वें दिन होती है स्कंदमाता की उपासना, इनका वाहन सिंह है

     

    नवरात्रि का पाँचवाँ दिन स्कंदमाता की उपासना का दिन होता है। मोक्ष के द्वार खोलने वाली माता परम सुखदायी हैं। माँ अपने भक्तों की समस्त इच्छाओं की पूर्ति करती हैं। भगवान स्कंद कुमार कार्तिकेय नाम से भी जाने जाते हैं। ये प्रसिद्ध देवासुर संग्राम में देवताओं के सेनापति बने थे। पुराणों में इन्हें कुमार और शक्ति कहकर इनकी महिमा का वर्णन किया गया है।

    इन्हीं भगवान स्कंद की माता होने के कारण माँ दुर्गाजी के इस स्वरूप को स्कंदमाता के नाम से जाना जाता है। स्कंदमाता की चार भुजाएँ हैं। इनके दाहिनी तरफ की नीचे वाली भुजा, जो ऊपर की ओर उठी हुई है, उसमें कमल पुष्प है। बाईं तरफ की ऊपर वाली भुजा में वरमुद्रा में तथा नीचे वाली भुजा जो ऊपर की ओर उठी है उसमें भी कमल पुष्प ली हुई हैं। इनका वर्ण पूर्णतः शुभ्र है। ये कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं। इसी कारण इन्हें पद्मासना देवी भी कहा जाता है। सिंह भी इनका वाहन है।

    नवरात्रि-पूजन के पाँचवें दिन का शास्त्रों में पुष्कल महत्व बताया गया है। इस चक्र में अवस्थित मन वाले साधक की समस्त बाह्य क्रियाओं एवं चित्तवृत्तियों का लोप हो जाता है। वह विशुद्ध चैतन्य स्वरूप की ओर अग्रसर हो रहा होता है। साधक का मन समस्त लौकिक, सांसारिक, मायिक बंधनों से विमुक्त होकर पद्मासना माँ स्कंदमाता के स्वरूप में पूर्णतः तल्लीन होता है। इस समय साधक को पूर्ण सावधानी के साथ उपासना की ओर अग्रसर होना चाहिए। उसे अपनी समस्त ध्यान-वृत्तियों को एकाग्र रखते हुए साधना के पथ पर आगे बढ़ना चाहिए।

    माँ स्कंदमाता की उपासना से भक्त की समस्त इच्छाएँ पूर्ण हो जाती हैं। इस मृत्युलोक में ही उसे परम शांति और सुख का अनुभव होने लगता है। उसके लिए मोक्ष का द्वार स्वमेव सुलभ हो जाता है। स्कंदमाता की उपासना से बालरूप स्कंद भगवान की उपासना भी स्वमेव हो जाती है। यह विशेषता केवल इन्हीं को प्राप्त है, अतः साधक को स्कंदमाता की उपासना की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए। हमें एकाग्रभाव से मन को पवित्र रखकर माँ की शरण में आने का प्रयत्न करना चाहिए। इस घोर भवसागर के दुःखों से मुक्ति पाकर मोक्ष का मार्ग सुलभ बनाने का इससे उत्तम उपाय दूसरा नहीं है।

    और भी...



Loading...