Criminals Escape to Nepal: भारत में किसी बड़ी वारदात को अंजाम देने के बाद अपराधियों का नेपाल की तरफ भागना कोई नया ट्रेंड नहीं है, बल्कि यह देश की सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक पुरानी और गंभीर चुनौती बना हुआ है। हाल ही में टाइगर श्रॉफ फायरिंग केस के आरोपी भी नेपाल भागने की फिराक में थे, जिन्हें राजस्थान के कोटा में दबोच लिया गया। भारत और नेपाल के बीच मौजूद खुली सीमाएं, प्रत्यर्पण कानूनों की जटिलताएं और स्थानीय स्तर पर मिलने वाली शरण का फायदा उठाकर बदमाश आसानी से सीमा पार कर जाते हैं। इस लेख में हम विस्तार से समझेंगे कि अपराधी नेपाल को सुरक्षित ठिकाना क्यों मानते हैं और उन्हें वापस लाने में क्या कानूनी बाधाएं आती हैं।
भारत-नेपाल की खुली सीमा अपराधियों के लिए वरदान
दोनों देशों के बीच भौगोलिक स्थिति कुछ ऐसी है कि भारत और नेपाल के बीच करीब 1,751 किलोमीटर लंबी सीमा साझा होती है, जो उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और सिक्किम जैसे पांच राज्यों से होकर गुजरती है। इसमें उत्तर प्रदेश के साथ सबसे लंबी (651 किमी) और पश्चिम बंगाल के साथ सबसे छोटी सीमा है। इस पूरी सीमा पर दोनों तरफ आवाजाही के लिए कई चेक पोस्ट बने हुए हैं, लेकिन विशाल और कई जगह से खुली होने के कारण इस पर निगरानी रखना आसान नहीं होता। अपराधी इसी खुली सीमा का फायदा उठाकर बिना किसी कागजी कार्रवाई के आसानी से भारतीय सीमा लांघकर नेपाल के अंदर दाखिल हो जाते हैं और अपनी पहचान छिपाने में कामयाब हो जाते हैं।
नेपाल में वैध कारोबारियों जैसा जीवन बिताते हैं अपराधी
भारत के कई राज्यों, खासकर बिहार और उत्तर प्रदेश के थानों में वांटेड चल रहे बदमाश जब नेपाल पहुंचते हैं, तो वहां उन पर कोई पुराना आपराधिक मुकदमा दर्ज नहीं होता है। इस स्थिति का लाभ उठाकर वे नेपाल में खुद को आम नागरिक, प्रतिष्ठित व्यवसायी या निवेशक के रूप में स्थापित कर लेते हैं। वहां जाकर वे फर्जी दस्तावेजों या स्थानीय संपर्कों के दम पर वैध तरीके से रहने लगते हैं। कानून की नजर में नेपाल में उनका रिकॉर्ड साफ होने के कारण वे बिना किसी डर के वहां खुलेआम घूमते हैं और वहीं से भारत विरोधी गतिविधियों या अपने आपराधिक सिंडिकेट को ऑपरेट करते रहते हैं।
प्रत्यर्पण संधियों की पेचीदगियां और कानूनी अड़चनें
यदि कोई भारतीय अपराधी नेपाल भागने में सफल हो जाता है, तो उसे भारत वापस लाना किसी टेढ़ी खीर से कम नहीं होता। दोनों देशों के बीच जो प्रत्यर्पण संधियां और कानूनी समझौते हैं, वे काफी पुराने और जटिल माने जाते हैं। भारतीय एजेंसियों को नेपाल में छिपे किसी भगोड़े को वापस लाने के लिए इंटरपोल के जरिए रेड कॉर्नर नोटिस और लंबी राजनयिक प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। कई बार यह कागजी कार्रवाई और कानूनी दांव-पेंच इतने लंबे खिंच जाते हैं कि अपराधियों को वहां से डिपोर्ट करवाने में महीनों या साल लग जाते हैं, जिससे उन्हें भारतीय कानून के शिकंजे से बचने का पूरा मौका मिल जाता है।
स्थानीय आपराधिक नेटवर्क और पनाहगाह का मिलना
नेपाल की भूमि पर केवल खुली सीमा का फायदा नहीं मिलता, बल्कि वहां सक्रिय कुछ स्थानीय आपराधिक सिंडिकेट भी इन भारतीय भगोड़ों को पूरा समर्थन देते हैं। ये नेटवर्क अपराधियों को छिपने के लिए सुरक्षित ठिकाने, खाने-पीने की व्यवस्था, फर्जी पहचान पत्र और जरूरत पड़ने पर स्थानीय कानूनी मदद भी उपलब्ध कराते हैं। इस तरह का संगठित सहयोग मिलने की वजह से नेपाल इन बदमाशों के लिए एक सुरक्षित पनाहगाह बन जाता है। उन्हें यह विश्वास रहता है कि एक बार नेपाल की सीमा पार करने के बाद स्थानीय नेटवर्क के सहारे वे पुलिस की पहुंच से कोसों दूर सुरक्षित रहेंगे।
राजनीतिक और कूटनीतिक सहयोग का अभाव
अपराधियों के प्रत्यर्पण में दोनों देशों के बीच कूटनीतिक और प्रशासनिक सहयोग की बहुत बड़ी भूमिका होती है। अतीत में जब भारत और नेपाल के संबंध अधिक सहज और प्रगाढ़ थे, तब भगोड़ों को सौंपने की प्रक्रिया कुछ आसान हुआ करती थी। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों के दौरान द्विपक्षीय संबंधों में आए उतार-चढ़ाव और तनातनी का असर पुलिस और प्रशासनिक स्तर के सहयोग पर भी पड़ा है। वर्तमान समय में भारतीय अधिकारियों को नेपाली समकक्षों से अपेक्षित और त्वरित सहयोग प्राप्त करने में कई तरह की व्यावहारिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, जिससे प्रत्यर्पण की यह पूरी प्रक्रिया और अधिक जटिल हो जाती है।