Nepal Flood: बुधवार को नेपाल में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी ग्लेशियल झील फटने से आई अचानक बाढ़ की घटना ने भारत को अपनी रणनीति और तैयारियों पर फिर से विचार करने को मजबूर कर दिया है।
इस घटना ने एक बार फिर याद दिलाया है कि हिमालयी क्षेत्रों में लगभग 200 ऐसी ग्लेशियल झीलें मौजूद हैं, जिनसे भविष्य में अत्यधिक खतरा हो सकता है और इसके लिए तुरंत कदम उठाने की जरूरत है।
हिमालयी झीलों से जुड़े खतरे के आंकड़े
सरकारी सर्वेक्षणों के अनुसार, हिमालयी रेंज में कुल मिलाकर लगभग 7,500 ग्लेशियल झीलें मौजूद हैं, जो एक बड़ी चिंता का विषय है। इनमें से 10 प्रतिशत झीलें केवल सिक्किम में स्थित हैं और वहां की 25 झीलों को बेहद खतरनाक श्रेणी में रखा गया है।
एक अध्ययन में यह भी पाया गया है कि इन कुल झीलों में से 4,700 ग्लेशियल झीलें गंगा नदी बेसिन में आती हैं, जिनका कैचमेंट एरिया 2.5 लाख वर्ग किलोमीटर से भी अधिक है।
इन आंकड़ों से यह स्पष्ट हो जाता है कि यदि किसी एक भी झील का प्राकृतिक बांध टूटता है, तो मैदानी और निचले इलाकों में कितनी भयानक तबाही मच सकती है।
हाल ही के समय में भारत ने GLOF से जुड़ी सबसे भीषण आपदाओं में से एक का सीधा सामना किया था। 3 अक्टूबर 2023 की आधी रात के करीब सिक्किम की साउथ ल्होनक झील में ग्लेशियल चट्टानों का एक बहुत विशाल हिस्सा लगभग 14.7 मिलियन क्यूबिक मीटर अचानक ढह गया था।
इसके कारण झील से 20 मीटर ऊंची एक विनाशकारी लहर उठी, जिसने अपने रास्ते में आने वाली कई पनबिजली परियोजनाओं और बस्तियों को पूरी तरह से बहा दिया था।
विशेषज्ञों ने क्या दी चेतावनी?
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के सदस्य कृष्णा वत्सा का कहना है कि नेपाल की घटना हिमालयी आपदाओं के एक नए और जटिल पहलू को दर्शाती है।
हालांकि, इस घटना के वैज्ञानिक कारणों की अभी जांच की जा रही है, लेकिन ऐसे खतरे अक्सर एक चेन रिएक्शन की तरह होते हैं। बर्फ या चट्टान गिरने से मलबा बहता है, जिससे एक अस्थायी झील बन जाती है और फिर वह अचानक फटकर बाढ़ का रूप ले लेती है।
यह सब इतनी तेजी से होता है कि निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को चेतावनी देने का बहुत कम समय मिल पाता है। वहीं, NDMA के पूर्व सदस्य सैयद सफी अहसान रिज़वी के अनुसार, भारत के नेशनल GLOF रिस्क मिटिगेशन प्रोग्राम ने खतरे वाली 195 झीलों की पहचान की है।
उनका मानना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से इस कार्यक्रम की पांच मुख्य प्राथमिकताओं आकलन, निगरानी, शुरुआती चेतावनी, खतरा कम करने और सामुदायिक जागरूकता पर तुरंत और बड़े पैमाने पर काम करने की आवश्यकता है।
खतरों से निपटने के लिए समन्वय समिति का गठन
सिक्किम आपदा के बाद केंद्र सरकार ने GLOF के खतरों से निपटने के लिए प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव पी.के. मिश्रा की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समन्वय समिति का गठन किया था। इस पहल का मुख्य उद्देश्य कई एजेंसियों के साथ मिलकर संवेदनशील झीलों का सर्वेक्षण करना और ज्यादा जोखिम वाली झीलों की पहचान करना था।
इसके साथ ही, सरकार ने हिमालय के उन चार राज्यों के लिए नेशनल GLOF रिस्क मिटिगेशन प्रोग्राम के तहत 150 करोड़ रुपये भी मंजूर किए हैं, जहां ग्लेशियल झीलों का खतरा सबसे ज्यादा है। आपदा जोखिम न्यूनीकरण (DRR) समन्वय समिति की नवंबर 2024 में हुई पहली बैठक में आकलन, निगरानी और जोखिम कम करने के उपाय वाले त्रि-आयामी दृष्टिकोण पर सहमति बनी थी।
इससे पहले सरकार ने यह भी जानकारी दी थी कि सभी A-कैटेगरी की झीलों का आकलन करने के लिए कई एजेंसियों ने मिलकर संयुक्त अभियान चलाए हैं। इन अभियानों में NDMA, केंद्रीय जल आयोग, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण, सी-डैक, आईटीबीपी और सेना के वैज्ञानिक एवं अधिकारी शामिल रहे हैं।
इन समितियों ने नियमित बैठकें करके फीडबैक लिया, जिसे राज्यों और केंद्र की संयुक्त रणनीति का हिस्सा बनाया गया। हालांकि, इस दिशा में जमीनी स्तर पर आगे की गई कार्रवाई के बारे में अभी विस्तृत जानकारी सामने आना बाकी है।