Defamation Case: भाजपा नेता और वकील गौरव भाटिया ने हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट में सीजेपी और उसके नेताओं पर 2 करोड़ रुपये के हर्जाने का मानहानि केस किया है। उनका कहना है कि उनके खिलाफ झूठी बातें फैलाई गईं, जिससे उनकी छवि खराब हुई। इस बड़े मामले के बाद लोग जानना चाहते हैं कि क्या भारत में कोई भी इंसान किसी पर करोड़ों रुपये का मानहानि का केस ठोक सकता है। कानून के मुताबिक हर नागरिक को अपनी इज्जत बचाने का पूरा अधिकार है, लेकिन कोर्ट में अपनी बात साबित करने के कड़े नियम भी बनाए गए हैं। आइए उनके बारे में जानें।
क्या कोई भी कर सकता है करोड़ों का दावा?
कानून की नजर में कोई भी व्यक्ति, कंपनी या संस्था जिसकी इज्जत को गलत बयानों, फर्जी पोस्ट, वीडियो या खबरों से नुकसान पहुंचा हो, वह अदालत का दरवाजा खटखटा सकती है। केस दर्ज कराते वक्त व्यक्ति अपनी मर्जी से 2 करोड़, 10 करोड़ या 100 करोड़ रुपये का हर्जाना मांग सकता है। इस पर कोई रोक नहीं है, लेकिन केवल बड़ी रकम मांग लेने से ही कोर्ट पैसे नहीं दिला देती है।
अदालत कैसे तय करती है हर्जाने की रकम?
कोर्ट में सिर्फ आरोप लगाने से बात नहीं बनती, बल्कि सबूत पेश करने होते हैं। केस करने वाले को यह साबित करना पड़ता है कि सामने वाले के झूठ की वजह से समाज में उसका सम्मान कितना गिरा है या उसे कितना आर्थिक और मानसिक नुकसान हुआ है। अदालत सारे पेश किए गए सबूतों और परिस्थितियों को देखने के बाद ही यह तय करती है कि कितना मुआवजा देना सही रहेगा।
दो तरह से दर्ज कराई जा सकती है शिकायत
भारत में मानहानि से निपटने के दो रास्ते मौजूद हैं। पहला दीवानी (सिविल) और दूसरा आपराधिक (क्रिमिनल)। सिविल मामले में पीड़ित केवल अपने मान-सम्मान के नुकसान के बदले पैसों की मांग करता है। वहीं आपराधिक मामले में आरोपी को सजा दिलाने पर ध्यान दिया जाता है, ताकि समाज में गलत संदेश न जाए और लोग किसी पर भी झूठे आरोप लगाने से डरें।
जेल की सजा और नए कानून के प्रावधान
आपराधिक मानहानि के मामलों में दोषी पाए जाने पर जेल की हवा भी खानी पड़ सकती है। भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 356 के तहत दोषी को 2 साल तक की जेल, जुर्माना या फिर दोनों की सजा हो सकती है। यह प्रावधान पहले आईपीसी की धारा 499 और 500 के तहत आता था, जिसे अब नए रूप में लागू किया गया है।
कानूनी कार्रवाई के लिए जरूरी तीन बड़ी शर्तें
अदालत में केस को मजबूत बनाए रखने के लिए तीन बातें बेहद जरूरी हैं।
1-कहा गया या लिखा गया बयान साफ तौर पर अपमानजनक होना चाहिए।
2- वह बयान सीधे तौर पर उसी व्यक्ति की पहचान से जुड़ा हो जो केस कर रहा है।
3- वह आरोप किसी तीसरे व्यक्ति तक जरूर पहुंचा हो। अगर केवल दो लोगों के बीच बंद कमरे में बहस हुई है, तो उसे मानहानि नहीं माना जाता।
मामला दर्ज कराने की तय समय सीमा
किसी के खिलाफ कानूनी कदम उठाने के लिए समय का ध्यान रखना बेहद जरूरी है। अगर कोई सिविल मानहानि का केस करके हर्जाना पाना चाहता है, तो उसे झूठी खबर या बयान सामने आने के 1 साल के अंदर कोर्ट जाना होता है। वहीं अगर आपराधिक केस दर्ज कराना है, तो इसके लिए कानून में 3 साल तक की मोहलत दी गई है।
बचाव के रास्ते और नियम
कानून हर सच पर रोक नहीं लगाता है। अगर किसी व्यक्ति ने कोई बात बोली या लिखी है और वह पूरी तरह सच है, तो उस पर केस नहीं बनता है। इसके अलावा, अगर कोई जानकारी समाज या जनता के भले के लिए सामने लाई गई है, तो कानून उसे मानहानि के दायरे से बाहर रखता है। यानी जनहित में कही गई सच्ची बात पर सजा नहीं होती।