Onion Price Hike: पूरे देश में प्याज की कीमतों में तेजी से बढ़ोतरी देखने को मिली है। सिर्फ एक हफ्ते के अंदर कीमतों में लगभग 17% की ग्रोथ हुई है। कई राज्यों में औसत खुदरा कीमत ₹50 प्रति किलोग्राम से ज्यादा हो गई है। लेकिन कीमतों में इस अचानक हुई बढ़ोतरी के पीछे किसान, मंडी, व्यापारी और सरकारी नीति से जुड़ी एक काफी जटिल प्रक्रिया है। सवाल यह उठता है कि आखिर प्याज की कीमतें कैसे तय होती हैं? आइए जानते हैं खेत से लेकर ग्राहक की रसोई तक का पूरा सफर।
कीमत तय करने की प्रक्रिया की पहली कड़ी
प्याज की कीमत तय करने में किसान पहली कड़ी होते हैं। लेकिन बाजार में अंतिम कीमत पर उनका कंट्रोल अक्सर सबसे कम होता है। उनकी उत्पादन लागत में बीज, खाद, सिंचाई, मजदूरी और परिवहन का खर्च शामिल होता है।
महाराष्ट्र जैसे बड़े उत्पादक राज्यों के किसान अपनी लागत निकालने और ठीक-ठाक मुनाफा कमाने के लिए लगभग ₹30 प्रति किलोग्राम की कीमत की उम्मीद कर सकते हैं। हालांकि, उन्हें असल में जो भी कीमत मिलती है, वह बिक्री के समय बाजार की स्थिति पर निर्भर करती है।
एक बड़ी चुनौती सही भंडारण सुविधा की कमी है। सही स्थिति में प्याज को लंबे समय तक रखा जा सकता है, लेकिन कई छोटे किसानों के पास पर्याप्त गोदाम नहीं होते। यही वजह है कि उन्हें फसल कटने के तुरंत बाद प्याज बेचने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। उसके बाद भी जब मंडी में कीमत काफी कम हो।
थोक कीमत कहां तय होती है?
मंडी, खासकर एपीएमसी बाजार, वह जगह है जहां प्याज संगठित थोक व्यापार प्रणाली में आता है। व्यापारी, कमीशन एजेंट या फिर आढ़ती और थोक विक्रेता नीलामी और मोलभाव में हिस्सा लेते हैं। भारत के सबसे जरूरी प्याज बाजारों में से एक महाराष्ट्र के नासिक में लासलगांव है।
रोजाना की कीमत कई वजहों पर निर्भर करती हैं। जैसे प्याज से लदे ट्रकों की संख्या, उपज की गुणवत्ता और देश के अलग-अलग हिस्सों में मांग। जब आवक ज्यादा होती है, तो कीमत आमतौर पर गिर जाती है। जब सप्लाई कम हो जाती है और मांग बनी रहती है, तो व्यापारी सीमित स्टॉक के लिए होड़ कर सकते हैं और थोक कीमतों में तेजी से बढ़ोतरी हो सकती है।
जमाखोरी से कीमतों में बढ़ोतरी और तेज हो सकती है
एक और जरूरी कारक बड़े व्यापारियों और भंडारण संचालकों की भूमिका है। जब व्यापारियों को भविष्य में कमी की आशंका होती है, तो वह कम कीमत पर प्याज खरीदकर बाद में बेचने के लिए इसका भंडारण कर सकते हैं। अगर जानबूझकर बाजार से बड़ी मात्रा में प्याज रोककर आर्टिफिशियल कमी पैदा की जाती है और मुनाफा बढ़ाया जाता है, तो हालात के आधार पर इसे जमाखोरी या बाजार में हेर-फेर जैसी गैर-कानूनी गतिविधि माना जा सकता है।
बाजार में उपलब्धता कम होने से थोक और खुदरा कीमतों में बदलाव आ सकते हैं।
बाजार को रेगुलेट करने वाली संस्था
सरकार आमतौर पर प्याज की रोजाना की कमर्शियल कीमत तय नहीं करती। इसके बजाय वह तब दखल देती है, जब कीमत काफी ज्यादा बढ़ जाती है। या फिर तब, जब किसानों को कीमतों में भारी गिरावट का सामना करना पड़ता है।
सबसे अहम तरीकों में से एक है प्याज का बफर स्टॉक। सरकारी एजेंसी प्राइस स्टेबलाइजेशन फंड के तहत किसान और फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गेनाइजेशन से बड़ी मात्रा में प्याज खरीदती हैं। जब रिटेल कीमत तेजी से बढ़ती है, तो इन स्टॉक को कंट्रोल रेट पर बाजार में उतारा जा सकता है। सप्लाई बढ़ाने से ग्राहकों पर दबाव कम करने में मदद मिलती है।
जब कीमत तेजी से बढ़ती है तो क्या होता है?
सरकार प्याज को उन इलाकों से, जहां ज्यादा पैदावार होती है, उन इलाकों तक पहुंचाने के लिए ट्रांसपोर्ट और सप्लाई से जुड़े उपाय भी कर सकती है, जहां कमी है। नासिक जैसे बड़े उत्पादक इलाकों से प्याज की आवाजाही को तेज करने के लिए ट्रांसपोर्ट के खास इंतजाम किए जाते हैं। इनमें कांदा एक्सप्रेस जैसी पहल भी शामिल है।
एक्सपोर्ट और इंपोर्ट नीति भी मायने रखती है
इंटरनेशनल ट्रेड घरेलू प्याज की कीमतों पर सीधा असर डाल सकता है। जब घरेलू कीमत तेजी से बढ़ती है, तो सरकार एक्सपोर्ट पर रोक लगा सकती है या फिर मिनिमम एक्सपोर्ट प्राइस जैसे उपाय लागू कर सकती है। इससे यह पक्का किया जा सकता है कि भारत में पर्याप्त सप्लाई बनी रहे।
अगर घरेलू सप्लाई कम पड़ जाती है, तो सरकार तुर्की या फिर मिस्र जैसे देशों से इंपोर्ट की सुविधा भी दे सकती है।
दूसरी तरफ, जब प्याज की कीमत काफी ज्यादा गिर जाती है और किसानों को अपनी लागत निकालना मुश्किल हो जाता है, तब एक्सपोर्ट के मौके अतिरिक्त मांग पैदा करने और खेत पर मिलने वाली कीमतों को सहारा देने में मदद कर सकते हैं।