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साधु के वेश में संसद पहुंचे पप्पू यादव, क्या सांसद भेष बदलकर जा सकते हैं? जानिए नियम

साधु के वेश में संसद पहुंचे पप्पू यादव, क्या सांसद भेष बदलकर जा सकते हैं? जानिए नियम

 

Pappu Yadav Parliament Protest: बिहार की पूर्णिया से निर्दलीय सांसद पप्पू यादव ने अयोध्या राम मंदिर के लिए इकट्ठा किए गए चंदे में कथित गड़बड़ी के विरोध में साधु के वेश में संसद परिसर पहुंचकर सबका ध्यान खींचा। उन्होंने संसद के बाहर धरना दिया और राहुल गांधी के साथ-साथ विपक्ष के कई सांसदों ने उनके विरोध का समर्थन किया। इस घटना ने इस बात पर एक बड़ी बहस छेड़ दी है कि क्या सांसदों को संसद में शामिल होने के दौरान वेशभूषा या फिर भेष बदलने की अनुमति है। आइए जानते हैं क्या है इस सवाल का जवाब।

सांसदों के लिए कोई भी आधिकारिक ड्रेस कोड नहीं

भारतीय संविधान और लोकसभा व राज्यसभा दोनों की नियम पुस्तकों में सांसदों के लिए कोई भी अनिवार्य ड्रेस कोड तय नहीं किया गया है। सदस्य भारत की सांस्कृतिक विविधता को दर्शाने वाले पारंपरिक या औपचारिक कपड़े पहनने के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र हैं। सांसदों को कुर्ता-पायजामा, धोती, साड़ी, सूट, मुंडू, मेखला-चादर और दूसरी क्षेत्रीय पोशाक पहने हुए देखना आम बात है। हालांकि, संसद सदन की गरिमा को बनाए रखने के सिद्धांत पर काम करती है और सदस्यों से कार्यवाही के दौरान सभ्य और उपयुक्त कपड़े पहनने की उम्मीद की जाती है।

क्या सांसद वेशभूषा या फिर भेष बदल सकते हैं?

वेशभूषा पर रोक लगाने वाला कोई भी तय नियम नहीं है, लेकिन संसदीय नियम सदस्यों को कार्यवाही में बाधा डालने या सदन को प्रदर्शन का मंच बनाने के साधन के रूप में पहनावे का इस्तेमाल करने से रोकते हैं। लोकसभा में प्रक्रिया और कार्य संचालन के नियम 349 के तहत सांसदों से शिष्टाचार बनाए रखने और ऐसे किसी भी व्यवहार से बचने की उम्मीद की जाती है, जो संसद की गरिमा को कम करता हो। इसका मतलब है कि सदन के अंदर विस्तृत भेष, प्रतीकात्मक वेशभूषा या दूसरी नाटकीय पोशाक पहनने पर अध्यक्ष की ओर से आपत्ति जताई जा सकती है।

कपड़ों पर नारे और विरोध की वस्तु की सदन के अंदर अनुमति नहीं

संसदीय नियम सदन की कार्यवाही के दौरान राजनीतिक नारों या संदेशों वाले कपड़ों के इस्तेमाल को भी प्रतिबंधित करते हैं। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला यह साफ कर चुके हैं कि सदन के अंदर नारे लिखी टी-शर्ट या कपड़े पहनना संसदीय शिष्टाचार का उल्लंघन है। इसी तरह सांसदों को कार्यवाही के दौरान सदन में तख्ती, झंडा, दान पेटी, बैनर या विरोध प्रदर्शन की दूसरी प्रतीकात्मक सामग्री लाने की अनुमति नहीं है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बहस दृश्य प्रदर्शन के बजाय संसदीय प्रक्रियाओं के जरिए आयोजित की जाए।

सदन के अंदर और संसद परिसर में नियम अलग-अलग

संसद परिसर के दूसरे हिस्सों की तुलना में लोकसभा और राज्यसभा कक्षों के अंदर प्रतिबंध काफी ज्यादा सख्त हैं। सदन के अंदर सांसदों से हर समय संसदीय शिष्टाचार का पालन करने की उम्मीद की जाती है। अगर कोई सदस्य भेष बदलकर या ऐसी प्रतीकात्मक पोशाक पहनकर आता है, जो मर्यादा के खिलाफ हो, तो स्पीकर उन्हें तुरंत बाहर जाने या अपने कपड़े बदलने के लिए कह सकते हैं।

सदन के बाहर मकर द्वार, हंस द्वार या गांधी प्रतिमा के पास सांसद अक्सर राजनीतिक मुद्दों पर विरोध प्रदर्शन करते हैं। इन जगहों पर प्रदर्शनों में प्रतीकात्मक पोशाक शामिल हो सकती है। लेकिन ये संसद के सुरक्षा नियमों और अनुमति की शर्तों के दायरे में आते हैं।

स्पीकर किसी सांसद के खिलाफ क्या कार्रवाई कर सकते हैं?

अगर कोई सांसद नियमों का उल्लंघन करता है या सदन की गरिमा का अनादर करता है, तो स्पीकर के पास कई अनुशासनात्मक शक्तियां होती हैं। अध्यक्ष पहले चेतावनी दे सकते हैं और सदस्य से वह व्यवहार बंद करने या सदन से बाहर जाने के लिए कह सकते हैं। नियम 373 के तहत स्पीकर सदस्य का नाम ले सकते हैं, जिसके बाद उन्हें उस दिन के बाकी समय के लिए सदन से बाहर जाना पड़ता है।

बार-बार या गंभीर उल्लंघन के मामले में नियम 374 स्पीकर को यह अधिकार देता है कि वह व्यवहार की गंभीरता के आधार पर किसी सांसद को एक तय समय के लिए या पूरे सत्र के लिए निलंबित कर सकते हैं।


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