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Fast Track Court क्या है? जानिए कैसे सामान्य अदालतों से अलग देता है तेजी से इंसाफ

Fast Track Court क्या है? जानिए कैसे सामान्य अदालतों से अलग देता है तेजी से इंसाफ

 

Fast Track Court: तारीख पे तारीख, तारीख पे तारीख, तारीख पे तारीख ही मिलती रही है मिलॉर्ड... लेकिन इंसाफ नहीं मिला। मिली है तो सिर्फ ये तारीख। साल 1993 में बॉलीवुड की फेमस फिल्म 'दामिनी' आई थी, जिसमें अभिनेता सनी देओल ने यह कालजयी डायलॉग बोला था। यह डायलॉग भारत की कानूनी व्यवस्था में देरी की नजीर बन गया। फिल्मों के कई दृश्यों में एक और मशहूर कहावत सुनाई गई—"Justice Delayed is Justice Denied", यानी इंसाफ मिलने में देरी, असल में न्याय नहीं मिलने के बराबर है।

आज इसकी चर्चा इसलिए हो रही है क्योंकि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जंतर-मंतर पर चल रहे प्रदर्शन के बीच बड़ा ऐलान किया है। उन्होंने कहा है कि पेपर लीक के दोषियों को फास्ट ट्रैक कोर्ट में मुकदमा चलाकर कड़ी सजा दिलाई जाएगी। अब सवाल यह है कि फास्ट ट्रैक कोर्ट क्या होता है? यह सामान्य अदालत से कैसे अलग होता है? और अब तक किन-किन मामलों में इसकी मिसाल कायम हो चुकी है?

फिलहाल दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट पेपर लीक के विरोध में प्रदर्शन तेज हो चुका है। इस मुद्दे पर संसद से लेकर सड़क तक सियासी और सामाजिक हलचल है। प्रधानमंत्री मोदी के ऐलान के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि पेपर लीक के आरोपियों के मामलों की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में हो सकती है। देश की अदालतों में लंबित करोड़ों मामलों के बीच जब किसी गंभीर अपराध का शिकार व्यक्ति तुरंत न्याय की मांग करता है, तब फास्ट ट्रैक कोर्ट उम्मीद की किरण बनकर सामने आते हैं।

हाल के वर्षों में कई ऐसे संवेदनशील और जघन्य मामले सामने आए हैं, जिनमें फास्ट ट्रैक अदालतों ने कुछ महीनों, बल्कि कुछ मामलों में दिनों के भीतर सुनवाई पूरी कर ऐतिहासिक फैसले सुनाए हैं। आइए विस्तार से समझते हैं कि फास्ट ट्रैक कोर्ट क्या हैं, यह सामान्य अदालतों से कैसे अलग हैं और भारत की न्यायिक व्यवस्था में इनकी क्या भूमिका रही है।

फास्ट ट्रैक कोर्ट क्या होता है?

फास्ट ट्रैक कोर्ट यानी त्वरित अदालत ऐसी विशेष अदालतें होती हैं, जिनका गठन लंबे समय से लंबित मामलों के शीघ्र निपटारे या किसी अति-संवेदनशील और जघन्य अपराध की रोजाना सुनवाई के लिए किया जाता है। इनका मुख्य उद्देश्य मुकदमों की लंबी प्रक्रिया को छोटा कर जल्द से जल्द फैसला सुनाना होता है, ताकि पीड़ितों को त्वरित न्याय मिल सके और अदालतों पर बढ़ते बोझ को कम किया जा सके। इन अदालतों में किसी मामले की सुनवाई सरकार या अदालत के आदेश के बाद ही होती है।

कब और क्यों हुआ इनका गठन?

भारत में फास्ट ट्रैक कोर्ट की अवधारणा 11वें वित्त आयोग की सिफारिशों के बाद वर्ष 2000 में लागू हुई। उस समय देशभर में 1,734 फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापित करने के लिए फंड आवंटित किया गया था।

साल 2012 में दिल्ली में हुए निर्भया कांड के बाद महिलाओं और बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों में त्वरित न्याय की मांग तेज हुई। इसके बाद सरकार ने क्रिमिनल लॉ (संशोधन) अधिनियम, 2018 और POCSO Act के मामलों की जल्द सुनवाई के लिए Fast Track Special Courts (FTSCs) योजना शुरू की। इन अदालतों में विशेष रूप से दुष्कर्म और पॉक्सो से जुड़े मामलों की सुनवाई की जाती है।

फास्ट ट्रैक और सामान्य अदालत में क्या अंतर है?

दोनों अदालतों के बीच मुख्य अंतर समय-सीमा, प्रक्रिया और कार्यप्रणाली का है।

सामान्य अदालतों में मामलों की अधिक संख्या होने के कारण सुनवाई की तारीखों के बीच लंबा अंतराल होता है। वहीं फास्ट ट्रैक कोर्ट में रोजाना सुनवाई की जाती है और बिना ठोस वजह के तारीख टालने की अनुमति नहीं होती।

सामान्य अदालतों में दीवानी और फौजदारी सहित सभी प्रकार के मामलों की सुनवाई होती है। दूसरी ओर, फास्ट ट्रैक कोर्ट में मुख्य रूप से दुष्कर्म, पॉक्सो, आतंकवाद, महिलाओं, बच्चों और वरिष्ठ नागरिकों से जुड़े गंभीर मामलों की सुनवाई प्राथमिकता से की जाती है।

किन मामलों में नजीर बन चुकी हैं फास्ट ट्रैक अदालतें?

फास्ट ट्रैक अदालतों ने कई ऐतिहासिक मामलों में समय पर फैसला सुनाकर देश में मिसाल कायम की है।

निर्भया कांड (2012): दिल्ली में हुए इस जघन्य अपराध के बाद गठित फास्ट ट्रैक कोर्ट ने मामले की तेजी से सुनवाई की और दोषियों को फांसी की सजा सुनाई। इस मामले ने दिखाया कि रोजाना सुनवाई होने पर गंभीर मामलों में महीनों के भीतर न्याय संभव है।

26/11 मुंबई आतंकी हमला: देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने और आतंकवाद फैलाने के इस संवेदनशील मामले की सुनवाई विशेष फास्ट ट्रैक व्यवस्था के तहत हुई, जिससे आतंकी अजमल कसाब को अपेक्षाकृत कम समय में सजा सुनाई जा सकी।

POCSO मामलों में त्वरित सजा: हाल के वर्षों में राजस्थान, बिहार और उत्तर प्रदेश की फास्ट ट्रैक (POCSO) अदालतों ने कई मामलों में 14 से 30 दिनों के भीतर सुनवाई पूरी कर दोषियों को मृत्युदंड और आजीवन कारावास की सजा सुनाई है।

भारत में अब तक किन प्रमुख मामलों में सजा हो चुकी है?

भारत में फास्ट ट्रैक अदालतों के माध्यम से हजारों आपराधिक मामलों में सजा सुनाई जा चुकी है। इनमें प्रमुख रूप से निम्न श्रेणियां शामिल हैं।

यौन उत्पीड़न और POCSO Act: केंद्रीय कानून मंत्रालय के अनुसार, FTSCs और POCSO अदालतों के जरिए लाखों मामलों का निपटारा किया जा चुका है और हजारों दोषियों को सजा मिली है।

वरिष्ठ नागरिकों और बच्चों से जुड़े अपराध: कई राज्यों में बुजुर्गों की संपत्ति हड़पने, हिंसा और बच्चों के खिलाफ अपराधों के मामलों का प्राथमिकता के आधार पर निपटारा किया गया है।

भ्रष्टाचार और वित्तीय धोखाधड़ी: कुछ राज्यों में नेताओं और अधिकारियों से जुड़े भ्रष्टाचार तथा वित्तीय अनियमितताओं के मामलों की सुनवाई भी फास्ट ट्रैक व्यवस्था के तहत कर सजा सुनिश्चित की गई है।

फास्ट ट्रैक कोर्ट भारतीय न्याय व्यवस्था की धीमी रफ्तार का एक महत्वपूर्ण समाधान माने जाते हैं। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इन अदालतों की सफलता केवल उनकी संख्या बढ़ाने से नहीं होगी। इसके लिए पर्याप्त न्यायाधीशों की नियुक्ति, आधुनिक फॉरेंसिक सुविधाएं, तेज पुलिस जांच और मजबूत अभियोजन प्रणाली भी उतनी ही जरूरी है, ताकि न्याय केवल जल्दी ही नहीं, बल्कि निष्पक्ष भी हो सके।


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