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मौनी अमावस्या पर क्यों साधु धारण करते हैं मौन व्रत ? जानिए रहस्य और नियम

मौनी अमावस्या पर क्यों साधु धारण करते हैं मौन व्रत ? जानिए रहस्य और नियम

 

भारतीय अध्यात्म में माघ मास की अमावस्या, जिसे हम मौनी अमावस्या के नाम से जानते हैं, केवल एक तिथि नहीं बल्कि स्वयं के भीतर झांकने का एक वार्षिक निमंत्रण है। जहां एक ओर प्रयागराज के संगम तट पर करोड़ों श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ता है, वहीं दूसरी ओर एक रहस्यमयी सन्नाटा भी पसरा रहता है। इस दिन हज़ारों साधु-संत और ऋषि-मुनि अपनी वाणी पर पूर्ण विराम लगा देते हैं।

 अक्सर मन में यह सवाल उठता है कि आखिर सबसे बड़े स्नान पर्व पर साधु-संत चुप क्यों रहते हैं। क्या यह केवल एक धार्मिक औपचारिकता है या इसके पीछे कोई गहरा प्राचीन विज्ञान और मनोवैज्ञानिक रहस्य छिपा है? वास्तव में, मौनी अमावस्या का यह मौन हमें सिखाता है कि कभी-कभी सबसे गहरे संवाद बिना शब्दों के ही होते हैं। तो आइए जानते हैं मौनी अमावस्या के दिन क्यों मौन धारण करने की पौराणिक और आध्यात्मिक रहस्य के बारे में-

क्यों रखा जाता है मौन ?

शास्त्रों के अनुसार, 'मौन' शब्द की उत्पत्ति 'मुनि' शब्द से हुई है। मौनी अमावस्या को ऋषि मनु का जन्मदिन भी माना जाता है। माना जाता है कि हमारी अधिकांश ऊर्जा बोलने में नष्ट होती है। मौन रहने से व्यक्ति की ऊर्जा अंदर की ओर मुड़ती है, जिससे मन शांत होता है और मानसिक शक्ति बढ़ती है। साधु-संतों का मानना है कि जब बाहर का शोर बंद होता है, तभी ईश्वर की आवाज़ अंदर सुनाई देती है। यह दिन स्वयं से साक्षात्कार करने का अवसर है।

मौनी अमावस्या का महत्व

माघ के महीने में गंगा का जल अमृत के समान माना जाता है। इस दिन मौन रहकर स्नान करने से अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य प्राप्त होता है। यह दिन पितरों को तर्पण देने के लिए भी श्रेष्ठ है। मौन रहकर किया गया तर्पण पूर्वजों को असीम शांति प्रदान करता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, चंद्रमा मन का कारक है। अमावस्या पर चंद्रमा क्षीण होता है, जिससे मन विचलित हो सकता है। मौन व्रत इस मानसिक अस्थिरता को रोकने का अचूक उपाय है।
 


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