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आपदा आई तो धामी सरकार बनी सहारा, राहत से पुनर्वास तक ऐसे बदली उत्तराखंड की तस्वीर

आपदा आई तो धामी सरकार बनी सहारा, राहत से पुनर्वास तक ऐसे बदली उत्तराखंड की तस्वीर

 

Uttarakhand Government:उत्तराखंड में आपदा महज एक खबर नहीं होती। पहाड़ों में जब प्राकृतिक आपदा आती है तो उसका असर सिर्फ कुछ घंटों या दिनों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि लोगों के घर, रोजगार, खेती, कारोबार और रोजमर्रा की जिंदगी तक पहुंचता है। सड़कें टूटती हैं, गांवों का संपर्क बाधित होता है और प्रभावित परिवारों के सामने सबसे बड़ा सवाल होता है कि अब जिंदगी दोबारा कैसे शुरू होगी।

इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली उत्तराखंड सरकार ने आपदा प्रबंधन को केवल राहत और बचाव तक सीमित रखने के बजाय राहत, पुनर्वास, पुनर्निर्माण और भविष्य की तैयारी से जोड़ने पर जोर दिया है। सरकार इसी दृष्टिकोण को ‘धामी मॉडल’ के तौर पर पेश कर रही है।

रेस्क्यू से आगे बढ़कर पुनर्वास पर जोर

उत्तराखंड में किसी बड़ी आपदा के बाद पहला लक्ष्य लोगों की जान बचाना और प्रभावित क्षेत्रों तक तत्काल राहत पहुंचाना होता है। इसके लिए SDRF, NDRF, सेना, स्थानीय प्रशासन और अन्य एजेंसियों को सक्रिय किया जाता है।

लेकिन धामी सरकार का दावा है कि आपदा के बाद असली चुनौती प्रभावित परिवारों को दोबारा खड़ा करने की होती है। इसी वजह से राहत के साथ-साथ सड़क, बिजली, पेयजल, सिंचाई, स्वास्थ्य सेवाओं और आजीविका की बहाली पर भी जोर दिया गया है।

धाराली और आसपास के क्षेत्रों में आपदा के बाद सड़क संपर्क बहाल करने, बिजली-पानी की व्यवस्था दुरुस्त करने और प्रभावित परिवारों को आर्थिक सहायता देने के साथ कृषि, बागवानी और पशुपालन जैसी आजीविका को दोबारा शुरू कराने के प्रयास किए गए हैं।

धाराली में ₹33 करोड़ से अधिक का राहत और पुनर्वास कार्य

उत्तरकाशी के धाराली और भागीरथी घाटी में आई भीषण आपदा के बाद राज्य सरकार के मुताबिक ₹33 करोड़ से अधिक की राशि राहत, पुनर्वास, विकास और प्रभावित परिवारों की सहायता पर खर्च की गई है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार इस राशि में बुनियादी ढांचे की बहाली के साथ-साथ परिवारों को दी गई आर्थिक सहायता भी शामिल है।

सरकार के अनुसार विभिन्न विभागों के माध्यम से सड़क, सिंचाई, बिजली, कृषि, बागवानी, ग्रामीण विकास, पर्यटन और अन्य क्षेत्रों में काम किया गया। प्रभावित परिवारों की आय के स्रोत को दोबारा खड़ा करने के लिए फसलों, पौधों और पशुधन से जुड़ी सहायता भी दी गई।

किसी पहाड़ी परिवार के लिए खेत या बगीचा सिर्फ जमीन नहीं होता। यही उसकी आमदनी का प्रमुख जरिया होता है। ऐसे में बागों को दोबारा तैयार करना, पशुधन की भरपाई करना और खेती को फिर से शुरू कराना पुनर्वास का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाता है।

‘राहत से पुनर्निर्माण’ तक पहुंचा फोकस

उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्य में आपदा के बाद पुनर्निर्माण आसान नहीं है। यहां सड़क बनाने से पहले पहाड़ की स्थिरता, जल निकासी, नदी के बहाव और भूस्खलन की संभावनाओं को ध्यान में रखना पड़ता है।

इसी वजह से सरकार का जोर ऐसे बुनियादी ढांचे पर है जो भविष्य की आपदाओं के जोखिम को कम कर सके। नदी किनारे सुरक्षा कार्य, भूस्खलन प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा उपाय, जल निकासी व्यवस्था और आपदा-रोधी निर्माण को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

साथ ही, मौसम की निगरानी, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, तकनीक के इस्तेमाल और मानसून से पहले तैयारियों की समीक्षा के जरिए आपदा आने से पहले प्रशासन को तैयार रखने पर भी जोर दिया जा रहा है।

मुख्यमंत्री धामी ने कहा- प्रभावित परिवारों का भविष्य सुरक्षित करना जिम्मेदारी

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने धाराली आपदा के संदर्भ में कहा कि चुनौती केवल बुनियादी ढांचे को दोबारा खड़ा करने की नहीं, बल्कि प्रभावित परिवारों के जीवन और भविष्य को बहाल करने की भी है।

मुख्यमंत्री ने भागीरथी घाटी को पहले से अधिक सुरक्षित, मजबूत और समृद्ध बनाने की प्रतिबद्धता जताई है। सरकार का कहना है कि पुनर्वास और पुनर्निर्माण का काम पूरी प्रतिबद्धता के साथ आगे जारी रहेगा।

जोशीमठ संकट में भी दिखा पुनर्वास का मॉडल

धामी सरकार के आपदा प्रबंधन मॉडल की चर्चा केवल धाराली तक सीमित नहीं है। इससे पहले जोशीमठ भूधंसाव संकट के दौरान भी राहत के साथ दीर्घकालिक पुनर्वास पर जोर दिया गया था।

2022 के अंत और 2023 की शुरुआत में जोशीमठ में जमीन धंसने और मकानों में दरारें आने के बाद प्रभावित परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया। संकट के दौरान प्रभावित लोगों के लिए राहत शिविरों और अस्थायी आवास की व्यवस्था की गई।

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए जोशीमठ को अलग-अलग जोखिम वाले क्षेत्रों में बांटकर प्रभावित इलाकों में सुरक्षा उपाय किए गए। अत्यधिक क्षतिग्रस्त इमारतों को नियंत्रित तरीके से हटाने की कार्रवाई भी की गई।

प्रभावित परिवारों के लिए आर्थिक मदद और पुनर्वास विकल्प

जोशीमठ संकट के दौरान प्रभावित परिवारों के लिए किराया सहायता, अंतरिम राहत और बिजली-पानी के बिलों में राहत जैसे कदम उठाए गए थे।

दीर्घकालिक पुनर्वास के लिए प्रभावित परिवारों के सामने अलग-अलग विकल्प रखे गए, जिनमें क्षतिग्रस्त जमीन और भवन के बदले आर्थिक मुआवजा, सुरक्षित जमीन के साथ भवन निर्माण के लिए सहायता और सुरक्षित स्थान पर सरकार द्वारा घर उपलब्ध कराने जैसे विकल्प शामिल थे।

इस पूरी प्रक्रिया में वैज्ञानिक संस्थानों और विशेषज्ञ एजेंसियों की मदद भी ली गई, ताकि जमीन की स्थिरता, पानी के प्रवाह और भविष्य के जोखिम का वैज्ञानिक आकलन किया जा सके।

जोशीमठ के लिए ₹1,658.17 करोड़ का रिकवरी प्लान

जोशीमठ के लिए केंद्र सरकार की हाई-लेवल कमेटी ने नवंबर 2023 में ₹1,658.17 करोड़ के Recovery and Reconstruction Plan को मंजूरी दी थी। इसमें ₹1,079.96 करोड़ की केंद्रीय सहायता NDRF की रिकवरी एवं रिकंस्ट्रक्शन विंडो से, ₹126.41 करोड़ राज्य SDRF से और ₹451.80 करोड़ राज्य बजट से दिए जाने का प्रावधान था।

इस योजना का उद्देश्य पुनर्वास और पुनर्निर्माण के साथ-साथ भूस्खलन प्रभावित ढलानों को स्थिर करना, जल निकासी व्यवस्था को मजबूत करना और प्रभावित क्षेत्रों को भविष्य के जोखिमों से अधिक सुरक्षित बनाना था।

आपदा के बाद सिर्फ घर नहीं, पूरी जिंदगी बसाने की कोशिश

उत्तराखंड में आपदा प्रबंधन की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि प्राकृतिक आपदा अक्सर लोगों के घर के साथ उनकी पूरी आजीविका को प्रभावित करती है। इसलिए सिर्फ सड़क या मकान का पुनर्निर्माण पर्याप्त नहीं होता।

धामी सरकार के मॉडल में प्रभावित परिवारों को मुआवजा देने के साथ-साथ खेती, बागवानी, पशुपालन, पर्यटन और स्थानीय कारोबार को फिर से खड़ा करने पर भी जोर दिया जा रहा है।

यही वजह है कि सरकार राहत के बाद पुनर्वास और पुनर्वास के बाद भविष्य की तैयारी को एक निरंतर प्रक्रिया के रूप में देख रही है।

भविष्य की आपदाओं के लिए तैयार उत्तराखंड

हिमालयी राज्य होने के कारण उत्तराखंड में भूस्खलन, बादल फटना, फ्लैश फ्लड और अन्य प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बना रहता है। ऐसे में सरकार के सामने दोहरी चुनौती है—एक तरफ मौजूदा आपदा से प्रभावित लोगों को राहत देना और दूसरी तरफ भविष्य में होने वाले नुकसान को कम करना।

इसके लिए प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, मौसम निगरानी, स्थानीय स्तर पर फर्स्ट रिस्पॉन्डर टीमों की क्षमता बढ़ाने और संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा कार्यों को मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है।

धाराली से जोशीमठ तक एक ही संदेश

धाराली और जोशीमठ की परिस्थितियां अलग-अलग थीं, लेकिन दोनों मामलों में एक बात समान रही-पहले लोगों की सुरक्षा, फिर तत्काल राहत और उसके बाद दीर्घकालिक पुनर्वास।

यही दृष्टिकोण उत्तराखंड के ‘धामी मॉडल’ की सबसे बड़ी विशेषता के रूप में सामने आता है। सरकार का फोकस अब सिर्फ आपदा के बाद नुकसान की भरपाई करने पर नहीं, बल्कि प्रभावित परिवारों को फिर से आत्मनिर्भर बनाने और पर्वतीय क्षेत्रों को भविष्य की चुनौतियों के लिए अधिक सुरक्षित बनाने पर है।

उत्तराखंड जैसे संवेदनशील हिमालयी राज्य में आपदा को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, लेकिन बेहतर तैयारी, तेज राहत, वैज्ञानिक पुनर्निर्माण और समयबद्ध पुनर्वास के जरिए इसके प्रभाव को कम किया जा सकता है। ‘धामी मॉडल’ इसी सोच को जमीन पर उतारने की कोशिश के तौर पर सामने आया है।


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