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FIR नहीं, NCR दर्ज हुई तो क्या होगा? जानें इसमें कैसे होती है पुलिस कार्रवाई

FIR नहीं, NCR दर्ज हुई तो क्या होगा? जानें इसमें कैसे होती है पुलिस कार्रवाई

 

What is NCR: दिल्ली के तिलक नगर में हुए थप्पड़कांड के बाद आम आदमी पार्टी के तीखे तेवरों को देखते हुए पुलिस ने मंत्री प्रवेश वर्मा के खिलाफ एनसीआर दर्ज की है। इस घटना के बाद से ही हर जगह एफआईआर और एनसीआर के फर्क को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। आम तौर पर जब भी कोई कानूनी विवाद होता है, तो लोग सीधे एफआईआर की बात करते हैं, लेकिन कानूनी प्रक्रिया में मामलों की गंभीरता के आधार पर रिपोर्ट दर्ज करने का तरीका एकदम बदल जाता है। आइए जानते हैं कि एनसीआर क्या होती है, यह एफआईआर से कैसे अलग है और इसमें पुलिस किस तरह कदम उठाती है।

पुलिस रिपोर्ट दर्ज करने के कानूनी नियम

किसी भी शिकायत के मिलने पर पुलिस थाना स्तर पर दो अलग-अलग तरीकों से कानूनी कागजात तैयार करती है। शिकायतकर्ता जब अपनी बात अधिकारी के सामने रखता है, तो पुलिस सबसे पहले पूरी घटना का ब्योरा सुनती है। इसके बाद देखा जाता है कि मामला कानून की किस धारा के तहत आता है। घटना कितनी गंभीर है और उसमें कितना नुकसान हुआ है, इसी के आधार पर तय होता है कि थाने में प्रथम सूचना रिपोर्ट लिखी जाएगी या फिर गैर-संज्ञेय रिपोर्ट दर्ज करके औपचारिकता पूरी की जाएगी।

FIR और NCR का क्या है मतलब?

कानूनी शब्दावली में एफआईआर को फर्स्ट इंफॉर्मेशन रिपोर्ट यानी प्रथम सूचना रिपोर्ट कहा जाता है, जो किसी भी बड़े जुर्म की पहली आधिकारिक जानकारी होती है। वहीं दूसरी तरफ एनसीआर का पूरा नाम नॉन-कॉग्निजेबल रिपोर्ट यानी गैर-संज्ञेय रिपोर्ट होता है। यह एक ऐसा दस्तावेजी रिकॉर्ड है, जो बहुत कम जोखिम वाले या बिना किसी बड़ी शारीरिक हिंसा वाले मामलों के लिए इस्तेमाल होता है। दोनों का सीधा मकसद नागरिक की शिकायत को ऑन-रिकॉर्ड लेना होता है, लेकिन इनके कानूनी असर पूरी तरह अलग होते हैं।

किन मामलों में दर्ज होती है NCR?

जब भी घटना का रूप मामूली होता है, तब पुलिस प्रशासन एनसीआर का सहारा लेता है। उदाहरण के तौर पर अगर आपका मोबाइल फोन, कोई जरूरी दस्तावेज या बटुआ कहीं गिर गया हो या चोरी का पक्का सबूत न हो, तो एनसीआर लिखी जाती है। इसके अलावा पड़ोसियों के बीच की हल्की बहस, बिना किसी हाथापाई की गाली-गलौज या बिना नुकसान वाले छोटे-मोटे विवाद इसी श्रेणी में रखे जाते हैं। ऐसे मामलों में समाज की सुरक्षा को सीधे तौर पर कोई बड़ा खतरा नहीं माना जाता है।

गिरफ्तारी के अधिकारों में अंतर

एफआईआर और एनसीआर के बीच सबसे बड़ा फर्क पुलिस की शक्तियों और अधिकारों में देखने को मिलता है। एफआईआर दर्ज होते ही पुलिस अधिकारी के पास अधिकार होता है कि वह आरोपी व्यक्ति को बिना किसी कोर्ट वारंट के हिरासत में ले सके। इसके उलट एनसीआर दर्ज होने की स्थिति में पुलिस के हाथ बंधे होते हैं। इस रिपोर्ट के आधार पर पुलिस सीधे जाकर किसी को गिरफ्तार नहीं कर सकती है। आरोपी को पकड़ने या उससे पूछताछ के लिए पुलिस को सबसे पहले अदालत से मंजूरी लेनी पड़ती है।

किस रिपोर्ट में कौन से जुर्म दर्ज होते हैं?

रिपोर्ट का तरीका तय करने के लिए अपराध का दायरा देखा जाता है। हत्या, किडनैपिंग, डकैती, यौन उत्पीड़न या पोक्सो एक्ट जैसे बड़े और खौफनाक मामलों में सीधे एफआईआर लिखी जाती है। वहीं दूसरी तरफ घरेलू तू-तू-मैं-मैं, सामान का खो जाना, हल्की कहासुनी या पैसों की साधारण धोखाधड़ी में सिर्फ एनसीआर दर्ज की जाती है। पुलिस कानून के चार्ट के हिसाब से जुर्म की धाराएं तय करती है और उसी आधार पर रिपोर्ट का प्रकार चुना जाता है।

जांच और कार्रवाई की प्रक्रिया

कार्रवाई की रफ्तार भी दोनों रिपोर्ट में काफी अलग होती है। एफआईआर दर्ज होते ही जांच अधिकारी तुरंत मौके पर पहुंचकर सबूत जुटाना और बयान लेना शुरू कर देता है। एनसीआर के मामले में पुलिस खुद से कोई छानबीन शुरू नहीं करती है। पीड़ित को यह सलाह दी जाती है कि अगर वह आगे की कानूनी कार्रवाई चाहता है, तो उसे संबंधित मजिस्ट्रेट की अदालत में अर्जी देनी होगी। जब मजिस्ट्रेट पुलिस को जांच का लिखित आदेश जारी करते हैं, तभी पुलिस आगे की छानबीन शुरू करती है।


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