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पहले शवों की राख से होती थी महाकाल की भस्म आरती, जानें अब किस विधि से तैयार होती है पवित्र भस्म?

पहले शवों की राख से होती थी महाकाल की भस्म आरती, जानें अब किस विधि से तैयार होती है पवित्र भस्म?

 

Baba Mahakal Bhasm Aarti: उज्जैन स्थित विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। बाबा महाकाल को कालों का काल कहा जाता है। मान्यता है कि उनके दर्शन और पूजा करने से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है। यही वजह है कि हर दिन देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु महाकाल के दर्शन के लिए उज्जैन पहुंचते हैं। महाकाल मंदिर की सबसे खास और अनोखी परंपरा है भस्म आरती, जिसे देखने के लिए भक्त रात से ही कतारों में लग जाते हैं।

क्या पहले शवों की राख से होती थी भस्म आरती?

बाबा महाकाल की भस्म आरती को लेकर वर्षों से यह मान्यता प्रचलित रही है कि पहले भगवान का श्रृंगार श्मशान में जलने वाले शवों की राख से किया जाता था। हालांकि, अब यह परंपरा बदल चुकी है। वर्तमान समय में बाबा महाकाल को चढ़ाई जाने वाली भस्म शवों की राख नहीं होती, बल्कि इसे विशेष धार्मिक विधि और शुद्धता के साथ तैयार किया जाता है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, आज महाकाल को अर्पित की जाने वाली भस्म पूरी तरह वैदिक परंपरा के अनुसार बनाई जाती है। इसके निर्माण में पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है। इसे तैयार करने की पूरी प्रक्रिया धार्मिक नियमों के अनुसार संपन्न होती है।

ऐसे तैयार होती है महाकाल की पवित्र भस्म

 भस्म तैयार करने के लिए सबसे पहले कपिला गाय के कंडे एकत्र किए जाते हैं। इसके बाद इन कंडों को पीपल, बरगद, शमी, पलाश, बेर सहित कई पवित्र और औषधीय वृक्षों की लकड़ियों एवं अन्य सामग्री के साथ महाकाल मंदिर में जलने वाली अखंड धूनी में प्रज्वलित किया जाता है।

जब अग्नि पूरी तरह शांत हो जाती है, तब उसकी राख को सावधानी से निकाला जाता है। इसके बाद इस राख को तीन से चार बार अच्छी तरह छाना जाता है, ताकि वह पूरी तरह शुद्ध और महीन हो जाए। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान शुद्धता और धार्मिक नियमों का विशेष ध्यान रखा जाता है।

वैदिक मंत्रों के साथ होती है भस्म अर्पित

हर दिन तड़के सुबह सबसे पहले बाबा महाकाल का अभिषेक, पूजन और विशेष श्रृंगार किया जाता है। इसके बाद शिवलिंग को एक पवित्र वस्त्र से ढका जाता है। शुक्ल यजुर्वेद के मंत्रों के उच्चारण के बीच महानिर्वाणी अखाड़े के संत बाबा महाकाल को यह पवित्र भस्म अर्पित करते हैं। इसी प्रक्रिया को विश्व प्रसिद्ध भस्म आरती कहा जाता है। मान्यता है कि इस आरती के दर्शन करने और प्रसाद स्वरूप मिलने वाली भस्म को ग्रहण करने से भगवान महाकाल का आशीर्वाद प्राप्त होता है। जीवन के कष्ट, रोग और दुख दूर होते हैं।

भस्म आरती से जुड़ी पौराणिक कथा

भस्म आरती की परंपरा के पीछे एक प्राचीन पौराणिक कथा भी प्रचलित है। मान्यता के अनुसार, उज्जैन में दूषण नामक एक राक्षस ने भारी उत्पात मचा रखा था। उसके अत्याचारों से परेशान होकर ब्राह्मणों ने भगवान शिव से रक्षा की प्रार्थना की। भगवान शिव ने पहले दूषण को समझाने का प्रयास किया। लेकिन जब वह नहीं माना, तो भगवान शिव ने क्रोधित होकर उसका वध कर दिया और उसे भस्म कर दिया। इसके बाद भगवान शिव ने उसी भस्म को अपने शरीर पर लगाकर श्रृंगार किया। तभी से भगवान शिव को भस्म अर्पित करने और भस्म से उनका श्रृंगार करने की परंपरा शुरू हुई, जो आज भस्म आरती के रूप में प्रसिद्ध है।

भस्म भगवान शिव को क्यों है प्रिय?

महाकालेश्वर मंदिर के पुजारी पंडित महेश शर्मा बताते हैं कि भगवान शिव को भस्म अत्यंत प्रिय है। इसलिए कई श्रद्धालु उन्हें भस्म अर्पित करते हैं। कुछ विशेष अवसरों पर भस्म से उनका स्नान भी कराया जाता है। उनका कहना है कि सच्ची श्रद्धा से बाबा महाकाल को भस्म अर्पित करने वाले भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

उन्होंने एक अन्य धार्मिक कथा का भी उल्लेख किया। मान्यता है कि जब माता सती के देह त्याग के बाद भगवान शिव उनके शरीर को कंधे पर लेकर विचरण कर रहे थे, तब वे अत्यंत क्रोधित थे। कहा जाता है कि जब माता सती की भस्म भगवान शिव के शरीर पर गिरी, तो उनका क्रोध शांत हो गया। इसी कारण भस्म को भगवान शिव की प्रिय वस्तु माना जाता है।

आज भी कायम है सदियों पुरानी परंपरा

महाकाल मंदिर की भस्म आरती केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और सनातन संस्कृति का जीवंत प्रतीक है। समय के साथ इसकी प्रक्रिया में बदलाव जरूर आया है, लेकिन इसकी आध्यात्मिक महत्ता आज भी पहले जैसी ही बनी हुई है। हर सुबह होने वाली यह आरती देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र होती है। बाबा महाकाल के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा का प्रतीक मानी जाती है।


 


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