Jagannath Rath Yatra 2026: ओडिशा के पुरी में आज से भगवान जगन्नाथ की पावन रथयात्रा महापर्व की शुरुआत हो गई है। रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ नगर भ्रमण पर निकलते हैं। इस दौरान तीनों देवता अपनी मौसी के घर, गुंडिचा मंदिर, जाते हैं। भगवान जगन्नाथ के मंदिर और रथयात्रा से जुड़ी कई कथाएं प्रचलित हैं। इन्हीं में से सबसे प्रसिद्ध कथा मुस्लिम भक्त सालबेग की है।
भक्त सालबेग की कथा केवल भक्ति की शक्ति का संदेश नहीं देती, बल्कि यह भी बताती है कि भगवान के लिए सच्ची श्रद्धा ही सबसे बड़ा परिचय है। रथयात्रा के दौरान आज भी भगवान जगन्नाथ का रथ भक्त सालबेग की मजार के सामने कुछ समय के लिए रोका जाता है।
क्यों मजार के सामने रुकता है भगवान जगन्नाथ का रथ?
लोक मान्यता के अनुसार, एक बार भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर की ओर जा रही थी। कुछ दूरी तय करने के बाद भगवान का रथ अचानक रुक गया। श्रद्धालुओं ने रथ को आगे बढ़ाने की भरपूर कोशिश की, लेकिन सभी प्रयास असफल रहे। कोई भी यह समझ नहीं पाया कि आखिर प्रभु का रथ क्यों रुक गया। लोग तरह-तरह की बातें करने लगे। कुछ इसे भगवान जगन्नाथ की इच्छा बता रहे थे, तो कुछ इसे दिव्य संकेत मान रहे थे।
कहा जाता है कि तभी एक बुजुर्ग व्यक्ति भीड़ के बीच पहुंचे। उन्होंने किसी तरह का विवाद नहीं किया, बल्कि लोगों का ध्यान सामने स्थित सालबेग की मजार की ओर दिलाया। इसके बाद श्रद्धालुओं ने भगवान जगन्नाथ के साथ भक्त सालबेग का भी जयकारा लगाया। मान्यता है कि जैसे ही श्रद्धालुओं ने "जय जगन्नाथ" के साथ "जय भक्त सालबेग" का उद्घोष किया, वैसे ही रुका हुआ रथ दोबारा चल पड़ा। इस घटना के बाद यह मान्यता और मजबूत हो गई कि भगवान अपने प्रिय भक्त के सम्मान में उनकी मजार पर अवश्य रुकते हैं।
कौन थे भक्त सालबेग?
लोक कथाओं के अनुसार, भक्त सालबेग का जीवन मुगलकाल से जुड़ा था। उनके पिता मुस्लिम और माता हिंदू थीं। एक युद्ध में सालबेग गंभीर रूप से घायल हो गए थे। तब उनकी माता ने उन्हें भगवान जगन्नाथ की शरण में जाने की सलाह दी। उन्होंने भगवान की महिमा सुनाई, जिससे सालबेग के मन में प्रभु के प्रति गहरी श्रद्धा जाग उठी।
इसके बाद सालबेग पुरी पहुंचे, लेकिन उस समय उन्हें मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं मिली। तब उन्होंने मंदिर के बाहर रहकर भगवान जगन्नाथ का निरंतर स्मरण और भजन करना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उनकी भक्ति इतनी प्रगाढ़ हो गई कि उन्हें भगवान जगन्नाथ के महान भक्तों में गिना जाने लगा।
कहा जाता है कि जीवन के अंतिम समय में सालबेग की एक ही इच्छा थी कि वे भगवान जगन्नाथ के दर्शन करें। श्रद्धालुओं के बीच प्रचलित कथा के अनुसार, भगवान जगन्नाथ ने उन्हें आश्वासन दिया कि भविष्य में उनकी रथयात्रा सालबेग के स्थान पर रुककर ही आगे बढ़ेगी।
Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, लोक कथाओं और सामान्य जानकारियों पर आधारित है। जनता टीवी इसकी सत्यता या ऐतिहासिक प्रमाणिकता की पुष्टि नहीं करता है।