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आंसू गैस का गोला आखिर कैसे करता है काम? पहली बार कहां हुआ था इसका इस्तेमाल

आंसू गैस का गोला आखिर कैसे करता है काम? पहली बार कहां हुआ था इसका इस्तेमाल

 


CJP Protest: दिल्ली में विरोध प्रदर्शन के दौरान आंसू गैस के गोलों का इस्तेमाल किया गया। इसके बाद भीड़ को काबू करने वाले इस साधन को एक बार फिर चर्चा में ला दिया गया। जब सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों का आमना-सामना हुआ, तो सवाल उठे कि ये गोले असल में कैसे काम करते हैं, फटने पर क्या होता है और दुनिया भर में पुलिस बल इनका इतना ज्यादा इस्तेमाल क्यों करते हैं? हालांकि इसे आमतौर पर आंसू गैस कहा जाता है, लेकिन तकनीकी रूप से यह कोई गैस नहीं होती। इसके बजाय इसमें ऐसे केमिकल कंपाउंड होते हैं, जो कुछ समय के लिए आंख, त्वचा और सांस लेने के सिस्टम में जलन पैदा करते हैं। इससे लोगों को उस जगह से हटने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

आंसू गैस असल में गैस नहीं है

अपने प्रचलित नाम के बावजूद, वैज्ञानिक नजरिए से आंसू गैस कोई गैस नहीं है। ज्यादातर आधुनिक आंसू गैस के गोलों में o-chlorobenzylidene malononitrile (CS) या chloroacetophenone (CN) जैसे केमिकल बारीक पाउडर या लिक्विड के रूप में होते हैं। गोले के अंदर चारकोल और पोटेशियम नाइट्रेट जैसे जलने वाले पदार्थ भी होते हैं। जब गोला दागा जाता है, तो ये पदार्थ जलने लगते हैं और केमिकल को हवा में धुएं या धुंध के घने बादल के रूप में फैला देते हैं।

इंसानी शरीर पर कैसा पड़ता है असर?

गोले से निकलने वाले केमिकल कण आंख, त्वचा, नाक और सांस की नली में मौजूद दर्द महसूस करने वाले नर्व रिसेप्टर को सक्रिय कर देते हैं। संपर्क में आने के कुछ ही सेकंड के भीतर शरीर प्रतिक्रिया करता है और आंखों से तेजी से आंसू निकलने लगते हैं। इसके साथ ही आंखों में तेज जलन, जोरदार खांसी, सांस लेने में तकलीफ, गले में खराश, त्वचा में जलन और कुछ मामलों में जी मचलना या उल्टी जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं।

हालांकि यह अनुभव काफी दर्दनाक होता है, लेकिन इसका असर आमतौर पर अस्थायी होता है। जब प्रभावित व्यक्ति उस इलाके से निकलकर ताजी हवा में पहुंचता है, तो संपर्क की मात्रा के आधार पर आमतौर पर 15 से 30 मिनट के भीतर लक्षण कम होने लगते हैं।

आंसू गैस का गोला कैसे दागा जाता है?

आंसू गैस के गोले खास लॉन्चर या दंगा-रोधी बंदूकों की मदद से दागे जाते हैं। टारगेट एरिया में गिरने के बाद गोला अंदर ही अंदर जलता है और कुछ समय तक लगातार केमिकल युक्त धुआं छोड़ता रहता है। इससे जलन पैदा करने वाला पदार्थ बड़े इलाके में फैल जाता है। हवा की दिशा और मौसम की स्थिति इस बात में अहम भूमिका निभाती है कि धुआं कितनी तेजी से और कितनी दूर तक फैलेगा।

आंसू गैस का इस्तेमाल सबसे पहले कहां हुआ था?

आंसू गैस का घरेलू इस्तेमाल सबसे पहले 1912 में हुआ था। उस समय फ्रांस की पेरिस पुलिस ने अपराधियों को काबू करने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए एथिल ब्रोमोएसीटेट से भरे ग्रेनेड का इस्तेमाल किया था।

इसका पहला सैन्य इस्तेमाल ठीक दो साल बाद, अगस्त 1914 में प्रथम विश्व युद्ध की शुरुआत के दौरान हुआ। उस समय फ्रांसीसी सैनिकों ने जर्मन ट्रेंच पर आंसू गैस के गोले दागे। यहीं से युद्ध के मैदान में केमिकल इरिटेंट्स (Chemical Irritants) के इस्तेमाल की शुरुआत मानी जाती है।


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