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4 दिन की जंग का असर, बिना मैदान में उतरे ही भारत को लगा अरबों का झटका!

4 दिन की जंग का असर, बिना मैदान में उतरे ही भारत को लगा अरबों का झटका!

 

West Asia Tensions: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव का आर्थिक असर भारत पर व्यापक रूप से देखा जा रहा है। ईरान से जुड़े संघर्ष का भारत पर दो तरह से प्रभाव पड़ रहा है-पहला कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और दूसरा डॉलर के मुकाबले रुपये में गिरावट। अनुमान के मुताबिक, केवल चार दिनों में ही भारत पर लगभग 2,000 करोड़ रुपये से अधिक का अतिरिक्त बोझ पड़ चुका है। आइए समझते हैं कि रोजाना कितना और किस तरह नुकसान हो रहा है, और इस पर विशेषज्ञ क्या राय दे रहे हैं। 

तेल से 4 दिन में कितना नुकसान

भारत रोजाना लगभग 5 मिलियन यानी 50 लाख बैरल कच्चा तेल आयात करता है. यदि औसतन 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी मान लें, तो भारत को प्रतिदिन 50 लाख बैरल पर 10 डॉलर अतिरिक्त चुकाने पड़ रहे हैं। इस तरह कुल 50 मिलियन डॉलर प्रतिदिन का अतिरिक्त भुगतान बनता है। यदि डॉलर का मूल्य 91 रुपये मानें, तो यह लगभग 455 करोड़ रुपये प्रतिदिन का अतिरिक्त खर्च होता है। इस हिसाब से चार दिनों में केवल तेल महंगा होने से करीब 1,820 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ बढ़ गया है। 

रुपये में गिरावट से कितना नुकसान

इसके अलावा, रुपये में गिरावट का भी असर पड़ रहा है। भारत का सालाना तेल आयात बिल लगभग 160 बिलियन डॉलर है। यदि डॉलर के मुकाबले रुपया 1 रुपये कमजोर होता है, तो सालाना लगभग 16,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ बढ़ता है। इसे चार दिनों के अनुपात में देखें तो यह करीब 44 करोड़ रुपये प्रतिदिन और चार दिनों में लगभग 175 से 180 करोड़ रुपये का असर बैठता है। 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

इस प्रकार तेल की कीमतों में वृद्धि और रुपये की कमजोरी को मिलाकर चार दिनों में कुल अतिरिक्त बोझ लगभग 2,000 करोड़ रुपये के आसपास पहुंच जाता है। इस मुद्दे पर आईआईएमसी के रिटायर्ड प्रोफेसर शिवाजी सरकार का कहना है कि ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच जारी संघर्ष का सीधा आर्थिक खामियाजा भारत जैसे आयात-निर्भर देशों को उठाना पड़ रहा है। उनके अनुसार, समुद्री और हवाई मार्गों में अनिश्चितता बढ़ने से कार्गो मूवमेंट प्रभावित हो रहा है, जिससे तेल आयात और निर्यात दोनों पर असर पड़ सकता है। 

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है, इसलिए लंबा खिंचने वाला संघर्ष महंगाई, आपूर्ति और सरकारी वित्तीय प्रबंधन के लिए चुनौती बन सकता है। यदि यह तनाव लंबा चलता है, तो भारत को वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों, रणनीतिक भंडार और मुद्रा स्थिरता जैसे उपायों पर अधिक जोर देना होगा, ताकि आर्थिक नुकसान को सीमित किया जा सके। 


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