IAS Durga Shakti Nagpal: गोंडा के करीब तीन दशक पुराने भूमि विवाद में न्यायिक प्रक्रिया को कथित तौर पर प्रभावित करने के आरोप ने उत्तर प्रदेश की वरिष्ठ आईएएस अधिकारी और देवीपाटन मंडल की आयुक्त दुर्गा शक्ति नागपाल को मुश्किल में डाल दिया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक सिविल जज को फोन किए जाने के मामले को गंभीरता से लेते हुए इसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सीधा प्रहार माना है। कोर्ट ने मामले को आपराधिक अवमानना के तहत विचार के लिए उचित पीठ के समक्ष भेजने के निर्देश दिए हैं।
जानकारी के मुताबिक, मामला गोंडा में साल 1997 से लंबित ज्योति विद्या मंदिर स्कूल बनाम नगर पालिका परिषद गोंडा से जुड़े भूमि विवाद का है। इस मामले की सुनवाई सिविल जज (सीनियर डिवीजन) शबीना खान कर रही थीं। आरोप है कि 15 जुलाई 2026 को मंडलायुक्त दुर्गा शक्ति नागपाल ने उन्हें फोन किया था।
गोंडा के जिला जज को दी जानकारी
सिविल जज शबीना खान ने बाद में 4 अगस्त को गोंडा के जिला जज को पत्र लिखकर बातचीत की जानकारी दी। जज के मुताबिक, बातचीत में उनके अवकाश और अदालत में लंबित मुकदमे का जिक्र हुआ। उन्होंने आरोप लगाया कि फोन कॉल के दौरान उन पर अनुचित दबाव बनाने और मामले को प्रभावित करने का प्रयास किया गया।
दबाव और शिकायत की धमकी का आरोप
जज शबीना खान की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, बातचीत के दौरान उन्हें उनके व्यवहार को लेकर सवाल किए गए और हाईकोर्ट में शिकायत करने की बात भी कही गई। जज ने इसे अपने पद का इस्तेमाल कर दबाव बनाने की कोशिश बताया और मामले को दूसरी अदालत में स्थानांतरित करने का अनुरोध किया। इसके बाद जिला जज ने मुकदमा गोंडा की दूसरी सक्षम अदालत में स्थानांतरित कर दिया।
कमिश्नर का पक्ष भी आया सामने
दूसरी तरफ, दुर्गा शक्ति नागपाल ने फोन किए जाने से इनकार नहीं किया। उनके पक्ष के अनुसार, उन्होंने अप्रैल 2026 में देवीपाटन मंडल का कार्यभार संभालने के बाद सरकारी नजूल जमीन से जुड़े इस पुराने विवाद की जानकारी ली थी। उनका कहना था कि उन्होंने संबंधित अधिकारियों और सरकारी अधिवक्ता को मामले को प्रभावी तरीके से आगे बढ़ाने के निर्देश दिए थे।
उनके मुताबिक, 15 जुलाई को उन्होंने जज को फोन केवल उनके अवकाश की अवधि और वापसी के बारे में जानकारी लेने के लिए किया था। उनका कहना है कि फोन पर लंबित मुकदमे पर कोई चर्चा नहीं हुई। बाद में उन्होंने जिला जज से मामले के शीघ्र निस्तारण का अनुरोध किया।
हाईकोर्ट ने क्यों माना गंभीर मामला?
न्यायमूर्ति सैयद कमर हसन रिजवी की पीठ ने कहा कि न्यायिक अधिकारी द्वारा बताई गई बातचीत के लहजे और भाषा से प्रथमदृष्टया ऐसा आभास होता है कि पीठासीन अधिकारी को प्रभावित करने का प्रयास किया गया। अदालत ने कहा कि किसी लंबित मुकदमे के संबंध में इस तरह फोन के जरिए न्यायिक अधिकारी से संपर्क करना बेहद गंभीर और चौंकाने वाली बात है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अधीनस्थ अदालतों के न्यायिक अधिकारियों को किसी भी तरह के दबाव, धमकी या प्रभाव से मुक्त होकर काम करने की पूरी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। अदालत पर दबाव डालने की कोई भी कोशिश न्याय प्रशासन में बाधा मानी जा सकती है।
करीब 30 साल पुराना है जमीन विवाद
दरअसल, यह पूरा विवाद सरकारी नजूल भूमि से जुड़ा है। यह मुकदमा 1997 से लंबित बताया गया है और वर्तमान में साक्ष्य के चरण में था। मामले में यथास्थिति बनाए रखने का आदेश भी मौजूद था। स्कूल पक्ष ने आरोप लगाया था कि सरकारी अधिकारियों द्वारा अपने पद का इस्तेमाल कर न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास किया जा रहा है।
हाईकोर्ट ने मामले को आपराधिक अवमानना से संबंधित पीठ के समक्ष विचार के लिए भेजने का निर्देश दिया है। यानी अब यह मामला सिर्फ प्रशासनिक स्तर की शिकायत तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता में कथित हस्तक्षेप के पहलू से भी इसकी न्यायिक जांच हो सकती है।