अध्यात्म

  • जानिए आखिर क्या होती है करवा चौथ की पूजा-विधि और व्रत के नियम

    जानिए आखिर क्या होती है करवा चौथ की पूजा-विधि और व्रत के नियम

     

    करवा चौथ का त्यौहार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है। इस दिन विवाहित स्त्रियाँ अपने पति की दीर्घायु के लिए व्रत रखती है। साथ ही अच्छे वर की कामना से अविवाहिता स्त्रियों के करवा चौथ व्रत रखने की भी परम्परा है। यह पर्व पूरे उत्तर भारत में ज़ोर-शोर से मनाया जाता है।

    करवा चौथ व्रत के नियम

    यह व्रत सूर्योदय से पहले से शुरू कर चांद निकलने तक रखना चाहिए और चन्द्रमा के दर्शन के पश्चात ही इसको खोला जाता है।

    शाम के समय चंद्रोदय से 1 घंटा पहले सम्पूर्ण शिव-परिवार की पूजा की जाती है।

    पूजन के समय देव-प्रतिमा का मुख पश्चिम की तरफ़ होना चाहिए तथा स्त्री को पूर्व की तरफ़ मुख करके बैठना चाहिए।

    करवा चौथ व्रत की पूजा-विधि

    सुबह सूर्योदय से पहले स्नान आदि करके पूजा घर की सफ़ाई करें। फिर सास द्वारा दिया हुआ भोजन करें और भगवान की पूजा करके निर्जला व्रत का संकल्प लें।

    यह व्रत उनको संध्या में सूरज अस्त होने के बाद चन्द्रमा के दर्शन करके ही खोलना चाहिए और बीच में जल भी नहीं पीना चाहिए।

    संध्या के समय एक मिट्टी की वेदी पर सभी देवताओं की स्थापना करें। इसमें 10 से 13 करवे रखें।

    पूजन-सामग्री में धूप, दीप, चन्दन, रोली, सिन्दूर आदि थाली में रखें। दीपक में पर्याप्त मात्रा में घी रहना चाहिए, जिससे वह पूरे समय तक जलता रहे।

    चन्द्रमा निकलने से लगभग एक घंटे पहले पूजा शुरू की जानी चाहिए। अच्छा हो कि परिवार की सभी महिलाएँ साथ पूजा करें।

    पूजा के दौरान करवा चौथ कथा सुनें या सुनाएँ।

    चन्द्र दर्शन छलनी के द्वारा किया जाना चाहिए और साथ ही दर्शन के समय अर्घ्य के साथ चन्द्रमा की पूजा करनी चाहिए।

    चन्द्र-दर्शन के बाद बहू अपनी सास को थाली में सजाकर मिष्ठान, फल, मेवे, रूपये आदि देकर उनका आशीर्वाद ले और सास उसे अखंड सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद दे।

     

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  • कब है इस बार शरद पूर्णिमा और जाने शरद पूर्णिमा की पूजा विधि

    कब है इस बार शरद पूर्णिमा और जाने शरद पूर्णिमा की पूजा विधि

     

    शरद पूर्णिमा का हिन्‍दू धर्म में विशेष महत्‍व है। मान्‍यता है कि शरद पूर्णिमा का व्रत करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इसे कोजागरी पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। इस बार शरद पूर्णिमा 13 अक्‍टूबर को है। यह पूर्णिमा अन्‍य पूर्णिमा की तुलना में काफी लोकप्रिय है। मान्‍यता है कि यही वो दिन है जब चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से युक्‍त होकर धरती पर अमृत की वर्षा करता है।

    दरअसल, हिन्‍दू धर्म में मनुष्‍य के एक-एक गुण को किसी न किसी कला से जोड़कर देखा जाता है। माना जाता है कि 16 कलाओं वाला पुरुष ही सर्वोत्तम पुरुष है। कहा जाता है कि श्री हरि विष्‍णु के अवतार भगवान श्रीकृष्‍ण ने 16 कलाओं के साथ जन्‍म लिया था, जबकि भगवान राम के पास 12 कलाएं थीं। बहरहाल, शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा, माता लक्ष्‍मी और विष्‍णु जी की पूजा का विधान है। साथ ही शरद पूर्णिमा की रात खीर बनाकर उसे आकाश के नीचे रखा जाता है।

    फिर 12 बजे के बाद उसका प्रसाद गहण किया जाता है। मान्‍यता है कि इस खीर में अमृत होता है और यह कई रोगों को दूर करने की शक्ति रखती है। शरद पूर्णिमा के दिन ही वाल्‍मीकि जयंती मनाई जाती है।

    शरद पूर्णिमा की पूजा विधि

    शरद पूर्णिमा के दिन सुबह उठकर स्‍नान करने के बाद व्रत का संकल्‍प लें।

    घर के मंदिर में घी का दीपक जलाएं।

    इसके बाद ईष्‍ट देवता की पूजा करें।

    फिर भगवान इंद्र और माता लक्ष्‍मी की पूजा की जाती है।

    अब धूप-बत्ती से आरती उतारें।

    संध्‍या के समय लक्ष्‍मी जी की पूजा करें और आरती उतारें।

    अब चंद्रमा को अर्घ्‍य देकर प्रसाद चढ़ाएं और आारती करें।

    अब उपवास खोल लें।

    रात 12 बजे के बाद अपने परिजनों में खीर का प्रसाद बांटें।

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  • शरद पूर्णिमा का वैज्ञानिक महत्व, इस रात चंद्रमा से बढ़ जाती है औषधियों की ताकत

    शरद पूर्णिमा का वैज्ञानिक महत्व, इस रात चंद्रमा से बढ़ जाती है औषधियों की ताकत

     

    इस वर्ष शरद पूर्णिमा 13 अक्टूबर को है और इसका हमारे जीवन में बहुत महत्व है और एक अध्ययन के अनुसार शरद पूर्णिमा के दिन औषधियों की स्पंदन क्षमता अधिक होती है। रसाकर्षण के कारण जब अंदर का पदार्थ सांद्र होने लगता है, तब रिक्तिकाओं से विशेष प्रकार की ध्वनि उत्पन्न होती है।

    रावण शरद पूर्णिमा की रात किरणों को दर्पण के माध्यम से अपनी नाभि पर ग्रहण करता था। इस प्रक्रिया से उसे पुनर्योवन शक्ति प्राप्त होती थी। चांदनी रात में 10 से मध्यरात्रि 12 बजे के बीच कम वस्त्रों में घूमने वाले व्यक्ति को ऊर्जा प्राप्त होती है। सोमचक्र, नक्षत्रीय चक्र और आश्विन के त्रिकोण के कारण शरद ऋतु से ऊर्जा का संग्रह होता है और बसंत में निग्रह होता है।

    अध्ययन के अनुसार दुग्ध में लैक्टिक अम्ल और अमृत तत्व होता है। यह तत्व किरणों से अधिक मात्रा में शक्ति का शोषण करता है। चावल में स्टार्च होने के कारण यह प्रक्रिया और आसान हो जाती है। इसी कारण ऋषि-मुनियों ने शरद पूर्णिमा की रात्रि में खीर खुले आसमान में रखने का विधान किया है। यह परंपरा विज्ञान पर आधारित है।

    शोध के अनुसार खीर को चांदी के पात्र में बनाना चाहिए। चांदी में प्रतिरोधकता अधिक होती है। इससे विषाणु दूर रहते हैं। हल्दी का उपयोग निषिद्ध है। प्रत्येक व्यक्ति को कम से कम 30 मिनट तक शरद पूर्णिमा का स्नान करना चाहिए। रात्रि 10 से 12 बजे तक का समय उपयुक्त रहता है।

    वर्ष में एक बार शरद पूर्णिमा की रात दमा रोगियों के लिए वरदान बनकर आती है। इस रात्रि में दिव्य औषधि को खीर में मिलाकर उसे चांदनी रात में रखकर सुबह 4 बजे सेवन किया जाता है। रोगी को रात्रि जागरण करना पड़ता है और औ‍षधि सेवन के पश्चात 2-3 किमी पैदल चलना लाभदायक रहता है। 

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  • असत्य पर सत्य की जीत का पर्व है दशहरा, श्रीराम की ये सीख है जीवन के लिए महत्व

    असत्य पर सत्य की जीत का पर्व है दशहरा, श्रीराम की ये सीख है जीवन के लिए महत्व

     

    असत्य पर सत्य की जीत का पर्व है दशहरा, इस दिन को बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनया जाता है। इस बार दशहरा 8 अक्टूबरको यानी आज पूरे देश में मनाया जा रहा है। दशहरा हिन्दुओं का प्रमुख त्योहार है। अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को इसका आयोजन होता है। भगवान राम ने इसी दिन रावण का वध किया था तथा देवी दुर्गा ने नौ रात्रि एवं दस दिन के युद्ध के उपरान्त महिषासुर पर विजय प्राप्त किया था। इसे असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है। इसीलिये इस दशमी को 'विजयादशमी' के नाम से जाना जाता है।

    मान्यता है कि विजयादशमी के दिन सभी प्रकार के मांगलिक कार्य किए जा सकते हैं और इस दिन जो कार्य शुरू किया जाता है उसमें सफलता अवश्य मिलती है। यही वजह है कि प्राचीन काल में राजा इसी दिन विजय की कामना से रण यात्रा के लिए प्रस्थान करते थे। इस दिन जगह-जगह मेले लगते हैं, रामलीला का आयोजन होता है और रावण का विशाल पुतला बनाकर उसे जलाया जाता है। इस दिन बच्चों का अक्षर लेखन, दुकान या घर का निर्माण, गृह प्रवेश, मुंडन, अन्न प्राशन, नामकरण, कारण छेदन, यज्ञोपवीत संस्कार आदि शुभ कार्य किए जा सकते हैं। क्षत्रिय अस्त्र-शास्त्र का पूजन भी विजयादशमी के दिन ही करते हैं।

    हम सब के लिए इस पर्व में श्रीराम की सीख मानवीय जीवन में बहुउपयोगी सिद्ध होगी। हमें अपने जीवन में अहंकार, लोभ, लालच और अत्याचारी वृत्तियों को त्यागकर क्षमारूपी बनकर जीवन जीना चाहिए। भगवान श्रीराम की यह सीख बहुत ही सच्ची और हमें मोक्ष प्राप्ति की ओर ले जाने वाली है।

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  • NAVRATRI 2019: 9वें दिन होती है माँ दुर्गाजी की उपासना, इनकी कृपा से हो सकता है मोक्ष प्राप्त

    NAVRATRI 2019: 9वें दिन होती है माँ दुर्गाजी की उपासना, इनकी कृपा से हो सकता है मोक्ष प्राप्त

     

    माँ दुर्गाजी की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री हैं। ये सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं। नवरात्र-पूजन के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है। इस दिन शास्त्रीय विधि-विधान और पूर्ण निष्ठा के साथ साधना करने वाले साधक को सभी सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है। सृष्टि में कुछ भी उसके लिए अगम्य नहीं रह जाता है। ब्रह्मांड पर पूर्ण विजय प्राप्त करने की सामर्थ्य उसमें आ जाती है।

    मार्कण्डेय पुराण के अनुसार अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व, ये आठ सिद्धियाँ होती हैं। ब्रह्मवैवर्त पुराण के श्रीकृष्ण जन्म खंड में यह संख्या अठारह बताई गई है। माँ सिद्धिदात्री भक्तों और साधकों को ये सभी सिद्धियाँ प्रदान करने में समर्थ हैं। देवीपुराण के अनुसार भगवान शिव ने इनकी कृपा से ही इन सिद्धियों को प्राप्त किया था। इनकी अनुकम्पा से ही भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ था। इसी कारण वे लोक में 'अर्द्धनारीश्वर' नाम से प्रसिद्ध हुए।

    माँ सिद्धिदात्री चार भुजाओं वाली हैं। इनका वाहन सिंह है। ये कमल पुष्प पर भी आसीन होती हैं। इनकी दाहिनी तरफ के नीचे वाले हाथ में कमलपुष्प है। प्रत्येक मनुष्य का यह कर्तव्य है कि वह माँ सिद्धिदात्री की कृपा प्राप्त करने का निरंतर प्रयत्न करे। उनकी आराधना की ओर अग्रसर हो। इनकी कृपा से अनंत दुख रूप संसार से निर्लिप्त रहकर सारे सुखों का भोग करता हुआ वह मोक्ष को प्राप्त कर सकता है।

    नवदुर्गाओं में माँ सिद्धिदात्री अंतिम हैं। अन्य आठ दुर्गाओं की पूजा उपासना शास्त्रीय विधि-विधान के अनुसार करते हुए भक्त दुर्गा पूजा के नौवें दिन इनकी उपासना में प्रवत्त होते हैं। इन सिद्धिदात्री माँ की उपासना पूर्ण कर लेने के बाद भक्तों और साधकों की लौकिक, पारलौकिक सभी प्रकार की कामनाओं की पूर्ति हो जाती है। सिद्धिदात्री माँ के कृपापात्र भक्त के भीतर कोई ऐसी कामना शेष बचती ही नहीं है, जिसे वह पूर्ण करना चाहे। वह सभी सांसारिक इच्छाओं, आवश्यकताओं और स्पृहाओं से ऊपर उठकर मानसिक रूप से माँ भगवती के दिव्य लोकों में विचरण करता हुआ उनके कृपा-रस-पीयूष का निरंतर पान करता हुआ, विषय-भोग-शून्य हो जाता है।

    ऐसा माना गया है कि माँ भगवती का स्मरण, ध्यान, पूजन, हमें इस संसार की असारता का बोध कराते हुए वास्तविक परम शांतिदायक अमृत पद की ओर ले जाने वाला है। विश्वास किया जाता है कि इनकी आराधना से भक्त को अणिमा, लधिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, महिमा, ईशित्व, सर्वकामावसायिता, दूर श्रवण, परकामा प्रवेश, वाकसिद्ध, अमरत्व भावना सिद्धि आदि समस्त सिद्धियों नव निधियों की प्राप्ति होती है। ऐसा कहा गया है कि यदि कोई इतना कठिन तप न कर सके तो अपनी शक्तिनुसार जप, तप, पूजा-अर्चना कर माँ की कृपा का पात्र बन सकता ही है।

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  • NAVRATRI 2019: 7वें दिन होती है माँ कालरात्रि की पूजा,करनी चाहिए एकनिष्ठ भाव से उपासना

    NAVRATRI 2019: 7वें दिन होती है माँ कालरात्रि की पूजा,करनी चाहिए एकनिष्ठ भाव से उपासना

     

    माँ दुर्गा की सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती हैं दुर्गा पूजा के सातवें दिन माँ कालरात्रि की उपासना का विधान है। इस दिन साधक का मन सहस्रार चक्र में स्थित रहता है। इसके लिए ब्रह्मांड की समस्त सिद्धियों का द्वार खुलने लगता है। देवी कालात्रि को व्यापक रूप से माता देवी काली, महाकाली, भद्रकाली, भैरवी, रुद्रानी, चामुंडा, चंडी और दुर्गा के कई विनाशकारी रूपों में से एक माना जाता है। रौद्री और धुमोरना देवी कालात्री के अन्य कम प्रसिद्ध नामों में हैं |

    यह ध्यान रखना जरूरी है कि नाम, काली और कालरात्रि का उपयोग एक दूसरे के परिपूरक है, हालांकि इन दो देवीओं को कुछ लोगों द्वारा अलग-अलग सत्ताओं के रूप में माना गया है। माना जाता है कि देवी के इस रूप में सभी राक्षस,भूत, प्रेत, पिसाच और नकारात्मक ऊर्जाओं का नाश होता है, जो उनके आगमन से पलायन करते हैं |

    माँ कालरात्रि का स्वरूप देखने में अत्यंत भयानक है, लेकिन ये सदैव शुभ फल ही देने वाली हैं। इसी कारण इनका एक नाम शुभंकारी भी है। अतः इनसे भक्तों को किसी प्रकार भी भयभीत अथवा आतंकित होने की आवश्यकता नहीं है। माँ कालरात्रि दुष्टों का विनाश करने वाली हैं। दानव, दैत्य, राक्षस, भूत, प्रेत आदि इनके स्मरण मात्र से ही भयभीत होकर भाग जाते हैं। ये ग्रह-बाधाओं को भी दूर करने वाली हैं। इनके उपासकों को अग्नि-भय, जल-भय, जंतु-भय, शत्रु-भय, रात्रि-भय आदि कभी नहीं होते। इनकी कृपा से वह सर्वथा भय-मुक्त हो जाता है।

    माँ कालरात्रि के स्वरूप-विग्रह को अपने हृदय में अवस्थित करके मनुष्य को एकनिष्ठ भाव से उपासना करनी चाहिए। यम, नियम, संयम का उसे पूर्ण पालन करना चाहिए। मन, वचन, काया की पवित्रता रखनी चाहिए। वे शुभंकारी देवी हैं। उनकी उपासना से होने वाले शुभों की गणना नहीं की जा सकती। हमें निरंतर उनका स्मरण, ध्यान और पूजा करना चाहिए।

     

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  • NAVRATRI 2019: छठे दिन होती है माँ कात्यायनी की पूजा, होती है अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष की प्राप्ति

    NAVRATRI 2019: छठे दिन होती है माँ कात्यायनी की पूजा, होती है अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष की प्राप्ति

     

    कात्यायनी नवदुर्गा या हिंदू देवी पार्वती के नौ रूपों में छठवीं रूप हैं। कात्यायनी अमरकोष में पार्वती के लिए दूसरा नाम है, संस्कृत शब्दकोश में उमा, कात्यायनी, गौरी, काली, ईश्वरी इन्हीं के अन्य नाम हैं। शक्तिवाद में उन्हें शक्ति या दुर्गा, जिसमे भद्रकाली और चंडिका भी शामिल है, में भी प्रचलित हैं। यजुर्वेद के तैत्तिरीय आरण्यक में उनका उल्लेख प्रथम किया है।

    स्कन्द पुराण में उल्लेख है कि वे परमेश्वर के नैसर्गिक क्रोध से उत्पन्न हुई थीं, जिन्होंने देवी पार्वती द्वारा दी गई सिंह पर आरूढ़ होकर महिषासुर का वध किया। वे शक्ति की आदि रूपा है, जिसका उल्लेख पाणिनि पर पतञ्जलि के महाभाष्य में किया गया है, जो दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में रचित है।

    परम्परागत रूप से देवी दुर्गा की तरह वे लाल रंग से जुड़ी हुई हैं। नवरात्रि उत्सव के षष्ठी को उनकी पूजा की जाती है। उस दिन साधक का मन आज्ञा चक्र में स्थित होता है। योगसाधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। इस चक्र में स्थित मन वाला साधक माँ कात्यायनी के चरणों में अपना सर्वस्व निवेदित कर देता है। परिपूर्ण आत्मदान करने वाले ऐसे भक्तों को सहज भाव से माँ के दर्शन प्राप्त हो जाते हैं।

    माँ कात्यायनी अमोघ फलदायिनी हैं। भगवान कृष्ण को पतिरूप में पाने के लिए ब्रज की गोपियों ने इन्हीं की पूजा कालिन्दी-यमुना के तट पर की थी। ये ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित हैं।

    माँ कात्यायनी का स्वरूप अत्यंत चमकीला और भास्वर है। इनकी चार भुजाएँ हैं। माताजी का दाहिनी तरफ का ऊपरवाला हाथ अभयमुद्रा में तथा नीचे वाला वरमुद्रा में है। बाईं तरफ के ऊपरवाले हाथ में तलवार और नीचे वाले हाथ में कमल-पुष्प सुशोभित है। इनका वाहन सिंह है। माँ कात्यायनी की भक्ति और उपासना द्वारा मनुष्य को बड़ी सरलता से अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति हो जाती है। वह इस लोक में स्थित रहकर भी अलौकिक तेज और प्रभाव से युक्त हो जाता है।

     

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  • NAVRATRI 2019: नवरात्रि पर्व के 5वें दिन होती है स्कंदमाता की उपासना, इनका वाहन सिंह है

    NAVRATRI 2019: नवरात्रि पर्व के 5वें दिन होती है स्कंदमाता की उपासना, इनका वाहन सिंह है

     

    नवरात्रि का पाँचवाँ दिन स्कंदमाता की उपासना का दिन होता है। मोक्ष के द्वार खोलने वाली माता परम सुखदायी हैं। माँ अपने भक्तों की समस्त इच्छाओं की पूर्ति करती हैं। भगवान स्कंद कुमार कार्तिकेय नाम से भी जाने जाते हैं। ये प्रसिद्ध देवासुर संग्राम में देवताओं के सेनापति बने थे। पुराणों में इन्हें कुमार और शक्ति कहकर इनकी महिमा का वर्णन किया गया है।

    इन्हीं भगवान स्कंद की माता होने के कारण माँ दुर्गाजी के इस स्वरूप को स्कंदमाता के नाम से जाना जाता है। स्कंदमाता की चार भुजाएँ हैं। इनके दाहिनी तरफ की नीचे वाली भुजा, जो ऊपर की ओर उठी हुई है, उसमें कमल पुष्प है। बाईं तरफ की ऊपर वाली भुजा में वरमुद्रा में तथा नीचे वाली भुजा जो ऊपर की ओर उठी है उसमें भी कमल पुष्प ली हुई हैं। इनका वर्ण पूर्णतः शुभ्र है। ये कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं। इसी कारण इन्हें पद्मासना देवी भी कहा जाता है। सिंह भी इनका वाहन है।

    नवरात्रि-पूजन के पाँचवें दिन का शास्त्रों में पुष्कल महत्व बताया गया है। इस चक्र में अवस्थित मन वाले साधक की समस्त बाह्य क्रियाओं एवं चित्तवृत्तियों का लोप हो जाता है। वह विशुद्ध चैतन्य स्वरूप की ओर अग्रसर हो रहा होता है। साधक का मन समस्त लौकिक, सांसारिक, मायिक बंधनों से विमुक्त होकर पद्मासना माँ स्कंदमाता के स्वरूप में पूर्णतः तल्लीन होता है। इस समय साधक को पूर्ण सावधानी के साथ उपासना की ओर अग्रसर होना चाहिए। उसे अपनी समस्त ध्यान-वृत्तियों को एकाग्र रखते हुए साधना के पथ पर आगे बढ़ना चाहिए।

    माँ स्कंदमाता की उपासना से भक्त की समस्त इच्छाएँ पूर्ण हो जाती हैं। इस मृत्युलोक में ही उसे परम शांति और सुख का अनुभव होने लगता है। उसके लिए मोक्ष का द्वार स्वमेव सुलभ हो जाता है। स्कंदमाता की उपासना से बालरूप स्कंद भगवान की उपासना भी स्वमेव हो जाती है। यह विशेषता केवल इन्हीं को प्राप्त है, अतः साधक को स्कंदमाता की उपासना की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए। हमें एकाग्रभाव से मन को पवित्र रखकर माँ की शरण में आने का प्रयत्न करना चाहिए। इस घोर भवसागर के दुःखों से मुक्ति पाकर मोक्ष का मार्ग सुलभ बनाने का इससे उत्तम उपाय दूसरा नहीं है।

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  • NAVRATRI 2019: नवरात्रि पर्व के चौथे दिन होती है कुष्मांडा देवी की पूजा, उपासना से मिटते है रोग

    NAVRATRI 2019: नवरात्रि पर्व के चौथे दिन होती है कुष्मांडा देवी की पूजा, उपासना से मिटते है रोग

     

    नवरात्र-पूजन के चौथे दिन कुष्मांडा देवी के स्वरूप की उपासना की जाती है। इस दिन साधक का मन अनाहत चक्र में अवस्थित होता है। अतः इस दिन उसे अत्यंत पवित्र और अचंचल मन से कुष्मांडा देवी के स्वरूप को ध्यान में रखकर पूजा-उपासना के कार्य में लगना चाहिए।

    जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, तब इन्हीं देवी ने ब्रह्मांड की रचना की थी। ये ही सृष्टि की आदि-स्वरूपा, आदिशक्ति हैं। इनका निवास सूर्यमंडल के भीतर के लोक में है। वहाँ निवास कर सकने की क्षमता और शक्ति केवल इन्हीं में है। इनके शरीर की कांति और प्रभा भी सूर्य के समान ही दैदीप्यमान हैं।

    इनके तेज और प्रकाश से दसों दिशाएँ प्रकाशित हो रही हैं। ब्रह्मांड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में अवस्थित तेज इन्हीं की छाया है। माँ की आठ भुजाएँ हैं। अतः ये अष्टभुजा देवी के नाम से भी विख्यात हैं। इनके सात हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा है। आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमाला है। इनका वाहन सिंह है।

    माँ कुष्मांडा की उपासना से भक्तों के समस्त रोग-शोक मिट जाते हैं। इनकी भक्ति से आयु, यश, बल और आरोग्य की वृद्धि होती है। माँ कुष्मांडा अत्यल्प सेवा और भक्ति से प्रसन्न होने वाली हैं। यदि मनुष्य सच्चे हृदय से इनका शरणागत बन जाए तो फिर उसे अत्यन्त सुगमता से परम पद की प्राप्ति हो सकती है।

    विधि-विधान से माँ के भक्ति-मार्ग पर कुछ ही कदम आगे बढ़ने पर भक्त साधक को उनकी कृपा का सूक्ष्म अनुभव होने लगता है। यह दुःख स्वरूप संसार उसके लिए अत्यंत सुखद और सुगम बन जाता है। माँ की उपासना मनुष्य को सहज भाव से भवसागर से पार उतारने के लिए सर्वाधिक सुगम और श्रेयस्कर मार्ग है।

    माँ कुष्मांडा की उपासना मनुष्य को आधियों-व्याधियों से सर्वथा विमुक्त करके उसे सुख, समृद्धि और उन्नति की ओर ले जाने वाली है। अतः अपनी लौकिक, पारलौकिक उन्नति चाहने वालों को इनकी उपासना में सदैव तत्पर रहना चाहिए।

    इस दिन जहाँ तक संभव हो बड़े माथे वाली तेजस्वी विवाहित महिला का पूजन करना चाहिए। उन्हें भोजन में दही, हलवा खिलाना श्रेयस्कर है। इसके बाद फल, सूखे मेवे और सौभाग्य का सामान भेंट करना चाहिए। जिससे माताजी प्रसन्न होती हैं। और मनवांछित फलों की प्राप्ति होती है।

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  • NAVRATRI 2019: नवरात्रि पर्व के तीसरे दिन होती है मां चंद्रघंटा की पूजा, इनकी आराधना होती है फलदायी

    NAVRATRI 2019: नवरात्रि पर्व के तीसरे दिन होती है मां चंद्रघंटा की पूजा, इनकी आराधना होती है फलदायी

     

    माँ दुर्गाजी की तीसरी शक्ति का नाम चंद्रघंटा है। नवरात्रि उपासना में तीसरे दिन की पूजा का अत्यधिक महत्व है और इस दिन इन्हीं के विग्रह का पूजन-आराधन किया जाता है। इस दिन साधक का मन मणिपूर चक्र में प्रविष्ट होता है। माँ चंद्रघंटा की कृपा से अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते हैं, दिव्य सुगंधियों का अनुभव होता है तथा विविध प्रकार की दिव्य ध्वनियाँ सुनाई देती हैं। ये क्षण साधक के लिए अत्यंत सावधान रहने के होते हैं।

    माँ का यह स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है। इनके मस्तक में घंटे का आकार का अर्धचंद्र है, इसी कारण से इन्हें चंद्रघंटा देवी कहा जाता है। इनके शरीर का रंग स्वर्ण के समान चमकीला है। इनके दस हाथ हैं। इनके दसों हाथों में खड्ग आदि शस्त्र तथा बाण आदि अस्त्र विभूषित हैं। इनका वाहन सिंह है। इनकी मुद्रा युद्ध के लिए उद्यत रहने की होती है।

    मां चंद्रघंटा की कृपा से साधक के समस्त पाप और बाधाएँ विनष्ट हो जाती हैं। इनकी आराधना फलदायी है। माँ भक्तों के कष्ट का निवारण शीघ्र ही कर देती हैं। इनका उपासक सिंह की तरह पराक्रमी और निर्भय हो जाता है। इनके घंटे की ध्वनि सदा अपने भक्तों को प्रेतबाधा से रक्षा करती है। इनका ध्यान करते ही शरणागत की रक्षा के लिए इस घंटे की ध्वनि निनादित हो उठती है।

    माँ का स्वरूप अत्यंत सौम्यता एवं शांति से परिपूर्ण रहता है। इनकी आराधना से वीरता-निर्भयता के साथ ही सौम्यता एवं विनम्रता का विकास होकर मुख, नेत्र तथा संपूर्ण काया में कांति-गुण की वृद्धि होती है। स्वर में दिव्य, अलौकिक माधुर्य का समावेश हो जाता है। माँ चंद्रघंटा के भक्त और उपासक जहाँ भी जाते हैं लोग उन्हें देखकर शांति और सुख का अनुभव करते हैं।

    माँ के आराधक के शरीर से दिव्य प्रकाशयुक्त परमाणुओं का अदृश्य विकिरण होता रहता है। यह दिव्य क्रिया साधारण चक्षुओं से दिखाई नहीं देती, किन्तु साधक और उसके संपर्क में आने वाले लोग इस बात का अनुभव भली-भाँति करते रहते हैं।

    हमें चाहिए कि अपने मन, वचन, कर्म एवं काया को विहित विधि-विधान के अनुसार पूर्णतः परिशुद्ध एवं पवित्र करके माँ चंद्रघंटा के शरणागत होकर उनकी उपासना-आराधना में तत्पर हों। उनकी उपासना से हम समस्त सांसारिक कष्टों से विमुक्त होकर सहज ही परमपद के अधिकारी बन सकते हैं।

    हमें निरंतर उनके पवित्र विग्रह को ध्यान में रखते हुए साधना की ओर अग्रसर होने का प्रयत्न करना चाहिए। उनका ध्यान हमारे इहलोक और परलोक दोनों के लिए परम कल्याणकारी और सद्गति देने वाला है। इस दिन सांवली रंग की ऐसी विवाहित महिला जिसके चेहरे पर तेज हो, को बुलाकर उनका पूजन करना चाहिए। भोजन में दही और हलवा खिलाएँ। भेंट में कलश और मंदिर की घंटी भेंट करना चाहिए।

     

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  • NAVRATRI 2019: नवरात्रि पर्व के दूसरे दिन की जाती है माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा, करे इस मंत्र का जाप

    NAVRATRI 2019: नवरात्रि पर्व के दूसरे दिन की जाती है माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा, करे इस मंत्र का जाप

     

    नवरात्र पर्व के दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना की जाती है। साधक इस दिन अपने मन को माँ के चरणों में लगाते हैं। ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और चारिणी यानी आचरण करने वाली। इस प्रकार ब्रह्मचारिणी का अर्थ हुआ तप का आचरण करने वाली। इनके दाहिने हाथ में जप की माला एवं बाएँ हाथ में कमण्डल रहता है।

    इस दिन साधक कुंडलिनी शक्ति को जागृत करने के लिए भी साधना करते हैं। जिससे उनका जीवन सफल हो सके और अपने सामने आने वाली किसी भी प्रकार की बाधा का सामना आसानी से कर सकें। माँ दुर्गाजी का यह दूसरा स्वरूप भक्तों और सिद्धों को अनन्तफल देने वाला है। इनकी उपासना से मनुष्य में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम की वृद्धि होती है। जीवन के कठिन संघर्षों में भी उसका मन कर्तव्य-पथ से विचलित नहीं होता।

    माँ ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से उसे सर्वत्र सिद्धि और विजय की प्राप्ति होती है। दुर्गा पूजा के दूसरे दिन इन्हीं के स्वरूप की उपासना की जाती है। इस दिन साधक का मन स्वाधिष्ठान चक्र में शिथिल होता है। इस चक्र में अवस्थित मनवाला योगी उनकी कृपा और भक्ति प्राप्त करता है। इस दिन ऐसी कन्याओं का पूजन किया जाता है कि जिनका विवाह तय हो गया है लेकिन अभी शादी नहीं हुई है। इन्हें अपने घर बुलाकर पूजन के पश्चात भोजन कराकर वस्त्र, पात्र आदि भेंट किए जाते हैं।

    प्रत्येक सर्वसाधारण के लिए आराधना योग्य यह श्लोक सरल और स्पष्ट है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में दूसरे दिन इसका जाप करना चाहिए।

    या देवी सर्वभू‍तेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।

    नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

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  • NAVRATRI 2019: जानें आखिर क्यों धूमधाम से मनाई जाती है नवरात्रि‍

    NAVRATRI 2019: जानें आखिर क्यों धूमधाम से मनाई जाती है नवरात्रि‍

     

    भारत में धूमधाम से मनाएं जाने वाले नवरात्रि‍ साल में दो बार आती हैं। शारदीय नवरात्र और चैत्र नवरात्र, चैत्र मास शुक्ल पक्ष की एक से नौ तारीख तक जो नवरात्रि‍ व्रत रखें जाते हैं वे चैत्र नवरात्र कहलाते हैं। आश्विन मास शुक्ल पक्ष की पहली तारीख से जो नवरात्र व्रत किए जाते हैं वे शारदीय नवरात्र कहलाते हैं। शारदीय नवरात्रों के दसवें दिन विजयदशमी मनाई जाती है। आज हम चैत्र नवरात्रों के बारे में बात करेंगे।

    चैत्र नवरात्रि बिल्‍कुल शारदीय नवरात्रों की ही तरह धूमधाम से देशभर में मनाएं जाते हैं। कई बार तिथियों के हेर-फेर से पूजा आठ दिन भी होती है। यानी एक ही दिन में दो नवरात्रों की पूजा होती है। हिन्दू धर्म में नवरात्रों को पूरे धूमधाम से पूजा-अर्चना के साथ उपवास करके मनाया जाता है। चैत्र नवरात्रि इसलिए भी खास है क्‍योंकि हिन्दु कैलेण्डर का ये पहला दिवस होता है। लोग साल के पहले दिन से नौंवे दिन तक पूरी श्रद्धा से चैत्र नवरात्रि का पूजन करते हैं।

    कम ही लोग ये बात जानते होंगे कि चैत्र नवरात्रों को वसंत नवरात्रि के नाम से भी जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि शारदीय नवरात्रों की पूजा जहां भगवान राम ने आरंभ की थी वहीं चैत्र नवरात्रि‍ का अंतिम दिन भगवान राम के जन्‍मदिवस के रूप में भी मनाया जाता है। शारदीय नवरात्रों में जिस तरह पूरे अनुष्‍ठान के साथ मां दुर्गा के नौ स्‍वरूपों की पूजा होती है ठीक वैसे ही चैत्र नवरात्रों में भी होता है। उत्‍तर भारत में चैत्र नवरात्रि‍ धूमधाम से मनाया जाता है। जबकि महाराष्‍ट्र में गुड़ी पड़वा से चैत्र नवरात्रि‍ की शुरूआत होती है। आन्ध्र प्रदेश और कर्नाटक में उगादी से चैत्र नवरात्रि‍ की शुरूआत होती है।

    नौ स्‍वरूपों वाली मां दुर्गा को जगदम्बा, शेरांवाली और अम्बे मां के नाम से भी पुकारा जाता है। ऐसा माना जाता है कि देवी दुर्गा ने महिषासुर का वध किया था। दरअसल, महिषासुर ने कठोर तपस्‍या करके देवताओं से अजय होने का वरदान ले लिया था। जिसके बाद महिषासुर ने अपनी शक्तियों का गलत उपयोग किया और नरक को स्‍वर्ग के द्वार तक ले गया, इससे सभी देवता परेशान हो गए। यहां तक कि महिषासुर ने सभी देवताओं के अधिकार उनसे छीन लिए।

    इससे क्रोधित होकर देवताओं ने दुर्गा मां की रचना की और देवी मां का सभी देवताओं ने अपने अस्‍त्र-शस्‍त्र दिए। शक्तिशाली दुर्गा मां का महिषासुर से नौ दिन तक संग्राम छिड़ा और आखिरकार महिषासुर का वध हुआ। इसलिए नवरात्रों में नौ देवियों की पूजा होती है और नौंवे दिन नौ कन्‍याओं की पूजा कर उनका आदर-सत्‍कार कर उन्‍हें खाना खिलाया जाता है।

     

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  • NAVRATRI 2019: जानिए इस पर्व पर कैसे करें चौकी की स्थापना

    NAVRATRI 2019: जानिए इस पर्व पर कैसे करें चौकी की स्थापना

     

    नवरात्रि एक हिन्दू पर्व है। इस पर्व की श्री शैलपुत्री, श्री ब्रह्मचारिणी, श्री चन्द्रघंटा, श्री कूष्मांडा, श्री स्कंदमाता, श्री कात्यायनी, श्री कालरात्रि, श्री महागौरी, श्री सिद्धिदात्री, ये 9 देवियां हैं। नवरात्रि में दुर्गा की घटस्थापना या कलश स्थापना के बाद देवी मां की चौकी स्थापित की जाती है तथा 9 दिनों तक इन देवियों का पूजन-अर्चन किया जाता है।

    आइए जानें कैसे करें चौकी की स्थापना- 

    लकड़ी की एक चौकी को गंगाजल और शुद्ध जल से धोकर पवित्र करें।

    साफ कपड़े से पोंछकर उस पर लाल कपड़ा बिछा दें।

    इसे कलश के दाईं तरफ रखें।

    चौकी पर मां दुर्गा की मूर्ति अथवा फ्रेमयुक्त फोटो रखें।

    मां को चुनरी ओढ़ाएं।

    धूप, दीपक आदि जलाएं।

    9 दिन तक जलने वाली माता की अखंड ज्योत जलाएं।  

    देवी मां को तिलक लगाएं।

    मां दुर्गा को वस्त्र, चंदन, सुहाग के सामान यानी हल्दी, कुमकुम, सिन्दूर, अष्टगंध आदि अर्पित करें।  

    काजल लगाएं।

    मंगलसूत्र, हरी चूड़ियां, फूल माला, इत्र, फल, मिठाई आदि अर्पित करें।

    श्रद्धानुसार दुर्गा सप्तशती के पाठ, देवी मां के स्तोत्र, सहस्रनाम आदि का पाठ करें।

    देवी मां की आरती करें।

    पूजन के उपरांत वेदी पर बोए अनाज पर जल छिड़कें।

    रोजाना देवी मां का पूजन करें तथा जौ वाले पात्र में जल का हल्का छिड़काव करें। जल बहुत अधिक या कम न छिड़कें। जल इतना हो कि जौ अंकुरित हो सके। ये अंकुरित जौ शुभ माने जाते हैं। यदि इनमें से किसी अंकुर का रंग सफेद हो तो उसे बहुत अच्छा माना जाता है। यह दुर्लभ होता है।

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  • NAVRATRI 2019: नवरात्रि में करना है गृह प्रवेश तो रखे इन बातों का ध्यान

    NAVRATRI 2019: नवरात्रि में करना है गृह प्रवेश तो रखे इन बातों का ध्यान

     

    नवरात्रि का शुभ पर्व आने वाला है। नवरात्रि की नौ तिथियां ऐसी होती हैं जिसमें बिना कोई मुहूर्त देखे कोई भी शुभ कार्य किया जा सकता है। इसे अबूझ मुहूर्त कहते हैं। नवरात्रि के मौके पर सबसे ज्यादा लोग अपने नए घर में प्रवेश करते हैं। शास्त्रों के अनुसार ऐसा माना जाता है नवरात्रि पर गृह प्रवेश करने  पर घर में सुख और समृद्धि आती है। देवी लक्ष्मी का वास और कई गुना फल की प्राप्ति होती है। गृह प्रवेश करते समय कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए इसे भूलकर भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

    नवरात्रि पर नए घर में प्रवेश करते समय कलश को साथ जरूर रखें। कलश में जलभर उसमें आम की पत्ती रखें। कलश पर लाल रंग से स्वास्तिक का निशान बनाना ना भूलें। नवरात्रि पर नए घर में गृह प्रवेश करते समय कलश के साथ नारियल, हल्दी, गुड़, चालव को जरूर लें जाएं।

    घर में प्रवेश करते समय पति-पत्नी को साथ में प्रवेश करना चाहिए। नए घर में प्रवेश करते समय पति को अपना दाहिना पैर आगे और पत्नी को बायां पैर आगे रखना चाहिए। इससे सुख-समृद्धि आती है।

    नए घर में गृह प्रवेश करते समय भगवान गणेश की मूर्ति, दक्षिणावर्ती शंख और श्रीयंत्र की स्थापना पूजा घर में करनी चाहिए। नए घर के ईशान कोण में जल से भरा एक कलश जरूर रखना चाहिए।

    नए घर की रसोई में गृह प्रवेश के समय गुड़ का टुकड़ा जरूर रखें। इससे घर का वास्तुदोष खत्म हो जाता है। नए घर में गृह प्रवेश के दिन आस-पास बने किसी मंदिर में जरूर जाएं और भगवान के दर्शन के बाद गरीबों को कुछ दान अवश्य करें।

    गृह प्रवेश में पूजा कराने आएं पंडितों को भोजन और दान दक्षिणा जरूर दें। नवरात्रि में गृह प्रवेश करने पर दुर्गा सप्तशी का पाठ और रामचरित मानस का पाठ करना शुभ होता है।

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  • NAVRATRI 2019: जानें आखिर क्या होता है नवरात्रि का जीवन में महत्व

    NAVRATRI 2019: जानें आखिर क्या होता है नवरात्रि का जीवन में महत्व

     

    नवरात्रि का अर्थ है नौ रातें। रात्रि विश्राम का समय होता है। यह मन और शरीर में ऊर्जा भरने का समय होता है। नवरात्रि आपकी आत्मा के विश्राम का समय है। यह वह समय है जिसमें आप खुद को सभी क्रियाओं से अलग कर लेते हैं और खुद में ही विश्राम करते हैं। जब आप इन्द्रियों की इन सभी क्रियाओं से अलग हो जाते हैं तब आप अंतर्मुखी होते हैं और यही वास्तविक रूप में आनंद, सुख और उत्साह का स्त्रोत है।

    हममें से बहुत से लोग इसका अनुभव नहीं कर पाते क्योंकि हम निरंतर किसी न किसी काम में उलझे रहते हैं। हमारा मन हर समय व्यस्त रहता है। नवरात्रि वह समय है, जब हम खुद को अपने मन से अलग कर लेते हैं और अपनी आत्मा में विश्राम करते हैं। यही वह समय है जब हम अपनी आत्मा को महसूस कर सकते हैं।

    नवरात्रि वह मौका है जब आप इस स्थूल भौतिक संसार से सूक्ष्म आध्यात्मिक संसार की यात्रा कर सकते हैं। सरल शब्दों में  अपने रोज़ाना के कार्यों में से थोड़ा समय निकालिए और अपने ऊपर ध्यान ले जाईये। अपने मूल के बारे में सोचिये, आप कौन हैं और कहाँ से आये हैं। अपने भीतर जाईये और ईश्वर के प्रेम को याद करके विश्राम करिए।

    हम इस ब्रह्माण्ड से जुड़े हुए हैं, उस परम शक्ति से जुड़े हुए हैं जो इस पूरी सृष्टि को चला रही है। यह शक्ति प्रेम से परिपूर्ण है। यह पूरी सृष्टि प्रेम से परिपूर्ण है। नवरात्रि वह समय है, जिसमें आप याद करते हैं कि उस परम शक्ति को आप बहुत प्रिय हैं! प्रेम की इस भावना में विश्राम करिए। ऐसा करने पर आप पहले से अधिक तरोताज़ा, मज़बूत, ज्ञानी और उत्साहित महसूस करते हैं।

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