अध्यात्म

  • जानिए क्या होता है पितृदोष और इससे जुड़ी परेशानियां

    जानिए क्या होता है पितृदोष और इससे जुड़ी परेशानियां

     

    शास्त्र के अनुसार सूर्य तथा राहू जिस भी भाव में बैठते हैं, उस भाव के सभी फल नष्ट हो जाते हैं। व्यक्ति की कुण्डली में एक ऐसा दोष है जो इन सब दुखों को एक साथ देने की क्षमता रखता है। इस दोष को पितृदोष के नाम से जाना जाता है। ज्योतिष के अनुसार,  पितृदोष और पितृ ऋण से पीड़ित कुंडली शापित कुंडली कही जाती है। ऐसी स्थिति में जातक के सांसारिक जीवन और आध्यात्मिक उन्नति में अनेक बाधाएं उत्पन्न होती हैं।

    पूर्व जन्म में अगर माता-पिता की अवहेलना की गई हो। अपने दायित्वों का ठीक तरीके से पालन न किया गया हो। अपने अधिकारों और शक्तियों का दुरुपयोग किया गया हो, तो इसका असर जीवन पर दिखने लगता है। व्यक्ति को जीवन में हर कदम पर असफलता मिलती है।

    कुंडली में राहु का प्रभाव ज्यादा हो तो इस तरह की समस्या हो जाती है। राहु अगर कुंडली के केंद्र स्थानों या त्रिकोण में हो, अगर राहु का सम्बन्ध सूर्य या चन्द्र से हो। अगर राहु का सम्बन्ध शनि या बृहस्पति से हो। राहु अगर द्वितीय या अष्टम भाव में हो।

    अमावस्या के दिन किसी निर्धन को भोजन कराएं, खीर जरूर खिलाएं। पीपल का वृक्ष लगवाएं और उसकी देखभाल करें। ग्रहण के समय दान अवश्य करें। श्रीमदभगवद्गीता का नित्य प्रातः पाठ करें। अगर मामला ज्यादा जटिल हो तो, श्रीमदभगवद्गीता का पाठ कराएं, अपने कर्मों को जहां तक हो सके शुद्ध रखने का प्रयास करें। पितृदोष प्रथम स्तर पर होता है, यदि सूर्य इन ग्रहों में से किसी के साथ किसी भी भाव या घर में होता है। यह सबसे खतरनाक दोष है।

    पितृदोष जब द्वितीय स्तर पर हो। इस पितृदोष का संयोग तब होता है। जब उपरोक्त ग्रहों में से किसी भी या सभी के साथ सूर्य की छाया होती है, तो यह दूसरे स्तर का दोष होता है। यह पितृ दोष प्रथम स्तर से भयंकर नहीं होता है, लेकिन इसकी मध्यवर्ती प्रभाव होता है। पितृदोष का तीसरा हल्का स्तर तब होता है जब सूर्य को शत्रु की राशि में या ऊपर के नकारात्मक ग्रहों की राशि में होता है।

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  • देशभर में गणेश चतुर्थी की धूम,पीएम मोदी और राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने दी देशवासियों को बधाई

    देशभर में गणेश चतुर्थी की धूम,पीएम मोदी और राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने दी देशवासियों को बधाई

     

    गणेश चतुर्थी का त्योहार पूरे भारत में धूमधाम के साथ मनाया जा रहा है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, उप-राष्ट्रपति वेंकैया नायडू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत कई बड़े नेताओं ने इस पर्व को लेकर देशवासियों को बधाई दी है। अपने बधाई संदेश में राष्ट्रपति ने कामना की है कि सभी लोगों को सुख, शांति और समृद्धि प्राप्त हो. वहीं प्रधानममंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि सभी देशवासियों को पावन पर्व गणेश चतुर्थी की ढेर सारी शुभकामनाएं।

    बधाई संदेश में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा, गणपति बप्पा मौर्या! गणेश चतुर्थी के शुभ अवसर पर सभी देशवासियों को बधाई और शुभकामनाएं, मेरी कामना है कि भगवान गणेश के आशीर्वाद से सभी को सुख, शांति और समृद्धि प्राप्त हो।

    उप-राष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने अपने बधाई संदेश में कहा, विनायक चतुर्थी के पावन अवसर पर देशवासियों के जीवन में शुभता, समृद्धि,स्वास्थ्य और संतोष की कामना करता हूं। लोकमान्य तिलक ने इस पर्व को राष्ट्रीयता और सामाजिक एकता के सांस्कृतिक पर्व के रूप में स्थापित किया था। मेरी हार्दिक शुभकामनाएं।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गणेश चतुर्थी के अवसर पर देश के लोगों को बधाई दी। उन्होंने कहा, सभी देशवासियों को पावन पर्व गणेश चतुर्थी की ढेर सारी शुभकामनाएं। गणपति बाप्पा मोरया! इस मौके पर बप्पा के दर्शन के लिए मंदिरों में भीड़ उमड़ रही है। लोग अपने हाथों में फूल-मालाएं और आरती की थाल लेकर मंदिर की ओर दर्शन के लिए जा रहे हैं।

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  • 2 सितंबर को गणेश चतुर्थी का त्योहार,पूजा के लिए रहेगा यह समय सबसे ज्यादा शुभ

    2 सितंबर को गणेश चतुर्थी का त्योहार,पूजा के लिए रहेगा यह समय सबसे ज्यादा शुभ

     

    इस साल गणेश चतुर्थी का त्योहार 2 सितंबर यानी सोमवार को मनाया जाएगा। इस दिन लोग अपने घरों में भगवान गणेश की मूर्ति की स्थापना करते हैं और 9 दिनों तक इसकी पूजा अर्चना करते हैं। और 10वें दिन धूमधाम के साथ भगवान गणेश की मूर्ति का विसर्जन करते हैं। आपको बता दें कि इस बार गणेश विसर्जन की शुभ तारीख 12 सितंबर है।

    बता दें कि भगवान गणेश का जन्म भाद्रपद माह के शुक्लपक्ष की चतुर्थी और स्वाति नक्षत्र और सिंह लग्न में हुआ था। इसलिए गणेश चतुर्थी की पूजा हमेशा दोपहर के वक्त की जाती है। गणेश चतुर्थी का शुभ मुहूर्त या यूं कहें कि पूजा का शुभ समय सुबह 11:04 बजे से दोपहर 1:37 तक रहेगा। पूजा की अवधि 2 घंटे 32 मिनट तक रहेगी। इसके बाद ही चतुर्थी तिथि का मुहूर्त सुबह 4 बजकर 56 मिनट से शुरु होगा। वहीं चतुर्थी तिथि समाप्ति का मुहूर्त 3 सितंबर 2019 रात 1:53 मिनट तक रहेगा।

    गणेश चतुर्थी के इस खास अवसर पर हम आपको भगवान गणेश से जुड़ी कुछ रोचक बातें बताने जा रहे हैं। गण का अर्थ होता है विशेष समुदाय और ईश का अर्थ होता है स्वामी। सभी शिवगणों और देवगणों के स्वामी होने के कारण सबको गणेश कहा जाता है।

    गणेश चतुर्थी को लेकर हर तरफ तैयारी शुरु हो गई है, गजानन की आकर्षक मूर्तियां गढ़ने के लिए हजारों कारीगर दिनरात लगे हुए हैं। 2 सितंबर शुरू होने जा रहा इस महापर्व की तैयारियों में सैंकड़ों शिल्पकार गणपति बप्पा की रंग-बिरंगी मूर्तियां तैयार करने में जुटे हैं।

     

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  • Krishna Janmashtami: भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करते समय रखें इन बातों का ध्यान, होगी मनोकामना पूरी

    Krishna Janmashtami: भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करते समय रखें इन बातों का ध्यान, होगी मनोकामना पूरी

     

    श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व देशभर में धूम-धाम से मनाया जा रहा हैं। ऐसे में आप भी सोच रहे होंगे कि कैसे भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करें जिससे की वो प्रसन्न हो जाए और मनोकामनाएं पूरी करें। जन्माष्टमी की पूजा में भगवान का श्रृंगार काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। मोर पंख के साथ-साथ बांसुरी और ऐसी ही अन्य आठ वस्तुएं हैं जिन्हें कृष्ण की पूजा में शामिल किया जाए तो वह प्रसन्न होते हैं।

    मोरपंख कृष्ण को बेहद प्यारा है, कहा जाता है कि राधा के महल में जब कृष्ण बांसुरी बजाते थे तो उसकी धुन पर मोर भी नृत्य करते थे। उनके मष्तक पर भी एक मोर पंख सजी रहती है, इसलिए मोर पंख को पूजा में शामिल करना शुभ माना जाता है। मोर पंख की तरह ही मोर मुकुट भी कृष्ण को प्रिय हैं इसलिए इसे बी पूजा में शामिल करना चाहिए।

    श्रीकृष्ण को बांसुरी से बहुत प्यार था, यह उनकी पहचान है। उनकी बांसुरी की धुन पर सुनकर गोपियां उनकी ओर खिंची चली आती थीं। नंद लाल-गोपाल कृष्ण को माखन काफी प्यारा है। बचपन में वह गोपियों की मटकियों से माखन चुरा कर खाया करते थे। माना जाता है कि माखन और मिसरी का भोग लगाने से अरोग्य की प्राप्ति होती है। जन्माष्टमी पर कृष्ण को झूला झूलाने की परंपरा है, ऐसा माना जाता है कि कृष्ण को इस दिन झूला झुलाने से प्रेम और आनंद की प्राप्ती होती है।

    जन्मोत्सव के वक्त भगवान के स्वरूप को पंचामृत से स्नान कराने के बाद पीले रंग के वस्त्र पहनाने की परंपरा भी है। भगवान कृष्ण का सहचर गाय को माना जाता है। इसलिए कृष्ण जन्माष्टमी के दिन कृष्ण के साथ बछड़े की या गाय की पूजा करना सुख और समृद्धि के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। भगवान कृष्ण ने महाभारत के समय धनुर्धर अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था। इसे भी काफी महत्वपूर्ण माना जाता है और कृष्ण की पूजा में गीता का होना शुभ माना जाता है।

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  • फाल्गुन मास की महाशिवरात्रि आज, देशभर में मनाई जा रही है महाशिवरात्रि

    फाल्गुन मास की महाशिवरात्रि आज, देशभर में मनाई जा रही है महाशिवरात्रि

     

    आज श्रावण कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि और मंगलवार का दिन है। आज सावन महीने की शिवरात्रि भी है। यही कारण है कि आज का दिन शिव आराधना के लिए और भी विशेष है। सावन की शिवरात्रि पर शिव की भक्ति में रमे कांवड़िए कांवड़ के जल से शिवलिंग का अभिषेक करते हैं और भोलेनाथ भी उनका उद्धार करते हैं। हर महीने को मास शिवरात्रि का व्रत होता है लेकिन इनमें सबसे ज्यादा खास होती हैं फाल्गुन और सावन महीने की शिवरात्रि।

    फाल्गुन मास की शिवरात्रि को महाशिवरात्रि के नाम से जाना जाता है। माना जाता है कि इसी दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। तो वही सावन महीना शिव का सबसे प्रिय है। लिहाज़ा इस पूरे माह शिव से जुड़े सभी दिन और सभी चीज़ें भी विशेष बन जाती हैं। इसीलिए सावन महीने की शिवरात्रि भी अत्यंत शुभ फलदायी मानी जाती है।

    मान्यत है कि इस दिन जो भी भक्त सच्चे दिल से भगवान शिव की अराधना करता है उसके सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। शिवरात्रि में शिवलिंग पर जलाभिषेक करना आवश्यक माना गया है। इससे भगवान शिव जल्दी प्रसन्न होते हैं। शिवरात्रि में शिवलिंग पर जलाभिषेक करने से भगवान शिव जल्दी प्रसन्न होते हैं। इस महीने रुद्राभिषेक करने से भक्तों के समस्त पापों का नाश हो जाता है।

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  • केले के पत्ते पर खाना खाने का महत्व और जानिए स्वास्थय को होने वाले लाभ

    केले के पत्ते पर खाना खाने का महत्व और जानिए स्वास्थय को होने वाले लाभ

     

    भारत विभिन्नताओं से भरा देश है और क्षेत्रों के हिसाब से अलग-अलग परंपराएं प्रचलित हैं। जैसे दक्षिण भारत में केले पत्तों पर खाना रखकर भोजन करने की परंपरा है। इस परंपरा से हमारे स्वास्थ्य को कई लाभ मिलते हैं। केले को पवित्र और पूजनीय पौधा माना गया है। केले पत्तों से मंडप भी बनाए जाते हैं। भगवान सत्यनारायण की कथा में इन पत्तों का विशेष महत्व है। वास्तु के अनुसार केले का पौधा को घर में या घर के सामने हो तो इससे घर के कई दोष दूर हो सकते हैं।

    केले के पत्तों पर गर्म खाना जाता है। जिससे पत्तों में मौजूद पौषक तत्व खाने में आ जाते हैं। केले में मौजूद तत्व स्वास्थ्य लाभ पहुंचाते हैं। रोजाना केले के पत्ते पर खाना खाने से बालों स्वस्थ रहते हैं। फोड़े- फुंसियों की बीमारी से बचाव होता है। पेट से संबंधित बीमारियां जैसे कब्ज, अपच, गैस की समस्याएं दूर रहती हैं।

    केले के पत्तों में कई तरह के एंटीऑक्सीडेंट होते हैं, जो कि पत्तेदार सब्जियों में पाए जाते हैं। केले के पत्ते पर खाना खाने पर ये एंटीऑक्सीडेंट सीधे हमारे शरीर में पहुंचते हैं। इनकी वजह से त्वचा को लाभ मिलते हैं। जो लाभ केले खाने से मिलते हैं, वही लाभ केले के पत्तों पर रखा खाना खाने से भी मिलते हैं।

    प्लास्टिक से बने बर्तनों में रखा खाना हमारे स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं रहता है। धातुओं के बर्तनों की सफाई के लिए साबून-सर्फ जैसे केमिकल का उपयोग किया जाता है। ये केमिकल भी हमारे स्वास्थ्य को धीरे-धीरे ही सही, लेकिन नुकसान पहुंचाते हैं। ऐसे में केले के पत्तों पर रखा भोजन करना बहुत स्वास्थ्यवर्धक रहता है।

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  • सावन का पहला सोमवार आज, श्रद्धालुओं की मंदिरों में लगी भारी भीड़

    सावन का पहला सोमवार आज, श्रद्धालुओं की मंदिरों में लगी भारी भीड़

     

    आज सावन का पहला सोमवार है, इस मौके पर देशभर के मंदिरों में शिवभक्तों की भीड़ उमड़ी है। काशी से लेकर देवघर तक हर हर महादेव की गूंज है। वाराणसी में बाबा विश्वनाथ के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की लंबी कतार देर रात से ही लग गई. मंदिर का द्वार खुलते ही भक्तों ने हाथों में गंगा जल और दिल में मनोकामना लिए भोलेनाथ के दर्शन किए और हर हर महादेव के जयकारे से पूरा मंदिर गूंज उठा।

    लाखों शिवभक्तों का सैलाब बैद्यनाथ धाम में भी देखने को मिला। सावन के पहले सोमवार में वैद्यनाथ धाम में कांवड़ियों ने बम भोले के जयकारे के साथ बाबा भोले के दर्शन किए। भगवा रंग से पूरा परिसर सराबोर नजर आया। उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में सावन के पहले सोमवार को विशेष पूजा का आयोजन किया गया। भोलेनाथ की भव्य भस्म आरती हुई। दूध, शहद और जलाभिषेक के साथ भगवान महाकाल की पूजा की गई जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने हिस्सा लिया।

    भगवान शिव की ससुराल कनखल दक्ष मंदिर में पहले सावन के पहले सोमवार महाआरती की गई। पहले सोमवार का विशेष महत्व माना जाता है, मान्यता है कि सावन के महीने में कैलाश पर्वत से शिव अपनी ससुराल कनखल में आ जातें हैं और पूरे सावन के महीने यहीँ पर विराजते हैं।

     

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  • 17 जुलाई से सावन महीने की शुरुआत, 30 दिन का होगा सावन

    17 जुलाई से सावन महीने की शुरुआत, 30 दिन का होगा सावन

     

    इस साल सावन का महीना पूरे 30 दिन का रहेगा। 17 जुलाई से सावन माह की शुरुआत हो रही है और 15 अगस्त के दिन रक्षाबंधन पर इसका समापन होगा। इस साल सावन माह के चारों सोमवार पर विशेष योग बन रहा है। काशी के ज्योतिषाचार्य पं गणेश मिश्रा के अनुसार कृष्ण पक्ष में द्वितीया तिथि की वृद्धि है। द्वितीया तिथि 18-19 जुलाई को मनेगी। वहीं श्रावण शुक्ल पक्ष में प्रतिपदा तिथि का क्षय है। इस प्रकार घट-बढ़ से सावन पूरे 30 दिन का होगा। सावन माह में सोमवार का विशेष महत्व होता है। सोमवार शिव का प्रिय दिन है। सावन में कुल चार सोमवार आ रहे है, जो 22 जुलाई, 29 जुलाई, 5 अगस्त और 12 अगस्त को हैं।

    22 जुलाई को सावन सोमवार के साथ मरुस्थली नाग पंचमी है। 29 जुलाई को सावन सोमवार को सोमप्रदोष और स्वार्थ सिद्धि एवं अमृत सिद्धि योग बन रहा है। 5 अगस्त को देशाचारी नागपंचमी और सावन सोमवार है, जबकि 12 अगस्त को सोमप्रदोष और सावन सोमवार का योग बना है। इनके अलावा जुलाई में 20 तारीख को श्रावणी चतुर्थी और रविपुष्य का सिद्धिदायक योग बन रहा है। इसी महीने 28 जुलाई को कामदा एकादशी है और 30 जुलाई को महाशिवरात्रि का पर्व है।

    इस बार 19 साल बाद ऐसा संयोग बन रहा है कि सूर्य संक्रांति के साथ ही सावन की शुरुआत हो रही है।  सावन मास का आरंभ होगा। कर्क राशि में सूर्य का प्रवेश होने के साथ ही सावन की शुरुआत भी शुभ मानी जा रही है। सावन की शुरुआत में सूर्य राशि बदलकर अपने मित्र ग्रह मंगल के साथ आ जाएगा। वहीं मकर राशि के चंद्रमा का मंगल के साथ दृष्टि संबंध होने से महालक्ष्मी योग भी बनेगा। ग्रहों की इस शुभ स्थिति के कारण सावन का महत्व और भी बढ़ जाएगा।

    भोलेनाथ ने राजा दक्ष को वरदान दिया था कि सावन महीने में वह कैलाश पर्वत से उतर कर दुनिया के हर शिवलिंग में वास करेंगे। इस दौरान कोई भी श्रद्धालु शिवलिंग पर जल चढ़ाएगा तो वह गंगाजल बनकर स्वयं शिव को प्राप्त होगा। इसलिए भगवान शिव को जल धारा प्रिय है। इसके अलावा बेलपत्र चढ़ाने से श्रद्धालुओं को दैविक, दैहिक व भौतिक दुखों से मुक्ति प्राप्त होती है।

    सावन मास में भगवान शिव को जलधारा चढ़ाने का विशेष महत्व है। वहीं शिवलिंग पर बिल्व पत्र, केसर युक्त चंदन, सूखे मेवे का भोग, आकड़े के फूल व धतूरा चढ़ाने से शिव कृपा प्राप्त होती है। कलयुग में शिव ही ऐसे देवता है जो चारों पुरुषार्थ की प्राप्त करवाते है। पूरे सावन माह में भोले की भक्ति संभव न हो तो सोमवार को उपवास के साथ, मंदिर में ओम नम: शिवाय के साथ जल अवश्य चढ़ाए।

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  • 149 साल बाद बन रहा संयोग, गुरु पूर्णिमा पर चंद्रग्रहण का साया

    149 साल बाद बन रहा संयोग, गुरु पूर्णिमा पर चंद्रग्रहण का साया

     

    इस वर्ष 16 और 17 जुलाई को 149 साल बाद गुरु पूर्णिमा पर चन्द्रग्रहण का साया रहेगा। 16 जुलाई को दोपहर डेढ़ बजे ग्रहण का सूतककाल शुरू होगा। श्रद्धालु डेढ़ बजे से पूर्व ही गुरु की पूजा-अर्चना कर पाएंगे। यह ग्रहण भारत में दिखाई देगा। ज्योतिष शास्त्रियों के अनुसार 149 साल पहले यानि 12 और 13 जुलाई, 1870 को ऐसा हुआ था जब गुरु पूर्णिमा और चंद्र ग्रहण एक साथ पड़े थे। उस समय चंद्रमा शनि, राहु और केतु के साथ धनु राशि में था। साथ ही सूर्य और राहु एक साथ मिथुन राशि में प्रवेश कर गए थे।

    इस बार भी 2019 में यह चंद्र ग्रहण आषाढ़ मास की पूर्णिमा यानि गुरु पूर्णिमा के दिन लगने जा रहा है। गुरु पूर्णिमा के दिन लगने वाला यह चंद्र ग्रहण भारत में दिखाई देगा। भारत के अलावा एशिया, यूरोप, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अमेरिका में दिखाई देगा।

    इस चंद्र ग्रहण के समय राहु और शनि चंद्रमा के साथ धनु राशि में स्थित रहेंगे। ग्रहों की ऐसी स्थिति होने के कारण ग्रहण का प्रभाव और भी अधिक नजर आएगा। ऐसा इसलिए क्योंकि राहु और शुक्र सूर्य के साथ रहेंगे। साथ ही चार विपरीत ग्रह शुक्र, शनि, राहु और केतु के घेरे में सूर्य रहेगा। इस स्थिति में मंगल नीच का हो जाएगा। ग्रहण के समय ग्रहों की ये स्थिति तनाव बढ़ाने वाला साबित होगा। ऐसे में प्राकृतिक आपदाएं आने की आशंका रहेगी।

     

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  • श्रद्धालुओं में भारी उत्साह, अब तक 22 हजार से अधिक श्रद्धालुओं ने किए बाबा बर्फानी के दर्शन

    श्रद्धालुओं में भारी उत्साह, अब तक 22 हजार से अधिक श्रद्धालुओं ने किए बाबा बर्फानी के दर्शन

     

    एक जुलाई से शुरू हुई अमरनाथ यात्रा में अब तक बीते तीन दिनों के दौरान 22 हजार से अधिक श्रद्धालुओं ने सफलतापूर्वक बाबा बर्फानी के दर्शन कर लिए हैं। इन श्रद्धालुओं को अब बालटाल और पहलगाम बेस कैंप के लिए रवाना कर दिया गया है। वापसी की यात्रा के दौरान, श्रद्धालुओं की मदद के लिए अर्धसैनिक बलों के जवानों को  जगह-जगह पर तैनात किया गया है।

    अमरनाथ यात्रा की सुरक्षा से जुड़े वरिष्‍ठ अधिकारी के अनुसार, तीन जुलाई तक बालटाल बेस कैंप से आए 7840 श्रद्धालुओं ने बाबा बर्फानी के दर्शन कर लिए हैं। जिसमें 1264 हेलीकॉप्‍टर के जरिए परित्र गुफा तक पहुंचे थे। वहीं 6376 श्रद्धालुओं ने पवित्र गुफा तक पैदल यात्रा की थी। उन्‍होंने बताया कि पहलगाम बेस कैंप से आए 14174 श्रद्धालुओं ने अपनी यात्रा का एक चरण पूरा कर बाबा बर्फानी के दर्शन पूरे किए हैं। इनमें 339 श्रद्धालु हेलीकॉप्‍टर के जरिए बाबा अमरनाथ की गुफा तक पहुंचे थे। जबकि पैदल आए श्रद्धालुओं की संख्‍या करीब 14174 थी।

    उन्‍होंने बताया कि इस तरफ, 3 जुलाई तक कुल 22014 श्रद्धालुओं ने बाबा अमरनाथ की यात्रा पूरी की है। बता दे एक जुलाई से शुरू हुई अमरनाथ यात्रा 45 दिनों तक जारी रहेगी। अमरनाथ के लिए आखिरी जत्‍था 15 अगस्‍त को रवाना होगा। 2018 में करीब 2 लाख 85 हजार श्रद्धालुओं ने बाबा बर्फानी के दर्शन किए थे।

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  • साल का दूसरा सूर्य ग्रहण आज, नासा करेगी पूर्ण सूर्य ग्रहण की लाइव स्ट्रीमिंग

    साल का दूसरा सूर्य ग्रहण आज, नासा करेगी पूर्ण सूर्य ग्रहण की लाइव स्ट्रीमिंग

     

    साल 2019 का दूसरा सूर्य ग्रहण मंगलवार 2 जुलाई यानि आज होने जा रहा है। इस बार के सूर्य ग्रहण की खास बात यह है कि इस बार पूर्ण सूर्य ग्रहण होने जा रहा है, यानि दिन में ही रात जैसा नजारा होगा। दुनियाभर के लोगों ने इस अनोखी खगोलीय घटना का गवाह बनने के लिए तमाम तरह की तैयारियां कर ली हैं। भारतीय समयानुसार सूर्य ग्रहण मंगलवार 2 जुलाई को रात 10.25 बजे शुरू होगा। इस दौरान पूरे 4 मिनट, 33 सेकेंड्स तक पूर्ण सूर्य ग्रहण रहेगा। हालांकि, अगस्त 2017 में हुए पिछले पूर्ण सूर्य ग्रहण के मुकाबले इस सूर्य ग्रहण का पूरा समय लगभग दोगुना होगा। उस वक्त पूर्ण सूर्य ग्रहण सिर्फ 2 मिनट, 40 सेकेंड्स तक चला था।

    इस बार अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा इस पूर्ण सूर्यग्रहण की लाइव स्ट्रीमिंग करेगी। इसके अलावा यह अंतरिक्ष एजेंसी तस्वीरें भी जारी करेगी। कुल 161 मिनट यानि 2 घंटे 41 मिनट तक यह सूर्य ग्रहण चलेगा। हालांकि, भारत में जो लोग पूर्ण सूर्य ग्रहण का नाजारा देखना चाहते हैं उन्हें निराश होना पड़ेगा, क्योंकि इसे देश के किसी भी कोने से नहीं देखा जा सकेगा। इसके बावजूद नासा की लाइव स्ट्रीमिंग के जरिए कोई भी इस खगोलीय घटना का साक्षी बन सकता है।

    यह सूर्य ग्रहण चिली, अर्जेंटीना और दक्षिण पैसिफिक क्षेत्र में करीब 6000 मील तक दिखेगा, लेकिन भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और नेपाल जैसे एशियाई देशों में इस सूर्य ग्रहण को नहीं देखा जा सकेगा। ऐसी अनोखी खगोलीय घटनाएं होती रहती हैं और अगली बार पूर्ण सूर्य ग्रहण दिसंबर 2020 में दिखेगा, जबकि पिछला पूर्ण सूर्य ग्रहण अगस्त 2017 में हुआ था।

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  • बाबा बर्फानी के दर्शन के लिए अमरनाथ यात्रियों का पहला जत्था रवाना

    बाबा बर्फानी के दर्शन के लिए अमरनाथ यात्रियों का पहला जत्था रवाना

     

    भारी सुरक्षा बंदोबस्त के बीच सोमवार सुबह 1250 अमरनाथ यात्रियों का पहला जत्था पहलगाम बेस कैंप से बाबा बर्फानी के दर्शन के लिए रवाना हो गया है। अनंतनाग के जिला विकास आयुक्त खालिद जहांगीर ने अन्य पुलिस अधिकारियों के साथ यात्रा को हरी झंडी दिखाई। अमरनाथ यात्रा 1 जुलाई से शुरू होकर 15 अगस्त तक चलेगी।

    45 दिन की अमरनाथ यात्रा सोमवार को औपचारिक रूप से शुरू हो गई और 15 अगस्त को श्रावण पूर्णिमा पर्व के दिन इसका समापन होगा। इससे पहले रविवार को तीर्थ यात्रियों के पहले जत्थे में 1,051 लोग उत्तरी कश्मीर के बालटाल आधार शिविर के लिए रवाना हुए, जबकि 1,183 लोग पहलगाम आधार शिविर के लिए रवाना हुए। श्रद्धालुओं में 1,839 पुरुष, 333 महिलाएं, 45 साधु और 17 बच्चे शामिल हैं।

    एक पुलिस अधिकारी ने कहा, तीर्थयात्री सुरक्षा दस्ते के साथ काफिलों में रवाना हुए। रविवार को जम्मू-श्रीनगर राजमार्ग पर दोपहर तीन बजे तक विपरीत दिशा से यातायात बंद रहा ताकि तीर्थयात्री बिना किसी देरी के जवाहर सुरंग पार कर लें। इस साल शांतिपूर्ण अमरनाथ यात्रा के लिए काफी दुरुस्त सुरक्षा व्यवस्था की गई है।

    पिछले सप्ताह अपनी कश्मीर यात्रा के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा की थी। श्रद्धालुओं के अनुसार, समुद्र तल से 3,888 मीटर की ऊंचाई पर स्थित अमरनाथ गुफा में बर्फ का विशाल शिवलिंग बनता है जो भगवान शिव की पौराणिक शक्तियों का प्रतीक है।

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  • जानिए ज्येष्ठ के दशहरे पर गंगा स्नान और दान करने का विशेष महत्व

    जानिए ज्येष्ठ के दशहरे पर गंगा स्नान और दान करने का विशेष महत्व

     

    ज्येष्ठ शुक्ल दशमी तिथि बुधवार 12 जून को पूरे देश में गंगा अवतरण दिवस यानी गंगा दशहरा श्रद्धाभाव से मनाया जाएगा। ज्येष्ठ के दशहरे पर गंगा स्नान व दान करने का विशेष महत्व है। इस तिथि पर भगवान राम ने रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना की थी। पंडितों के अनुसार ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी को ही गंगा का धरती पर अवतरण हुआ था। इसी कारण इसे गंगा दशहरा के रूप में भी जाना जाता है। मां गंगा इसी तिथि पर धरती पर संपन्नता और शुद्धता लेकर आई थीं।

    पंडितों के अनुसार इस बार गंगा दशहरा पर बुधवार को खास संयोग बन रहा है। यह युग्म संयोग कर्क, धनु, मीन आदि राशि के लोगों के लिए शुभ संयोग लेकर आया है। इस दिन गंगा स्नान के साथ दान का बहुत महत्व है। कहा जाता है कि इस तिथि में गंगा स्नान के बाद दान करने से सात जन्मों के पाप व कष्टों से मुक्ति मिलती है। साथ ही एक हजार वाजस्नेयी यज्ञ के समान फल की प्राप्ति होती है।

    पंडितों के अनुसार गंगा दशहरा पर गंगा का नाम लेने, सूनने, देखने, स्नान, ध्यान, पूजन आदि करने से दस तरह के पापों का नाश होता है। धर्मशास्त्रों में लिखा है कि इसमें तीन तरह के पाप शारीरिक, चार तरह के वाचिक और तीन तरह के मानसिक पाप हैं। शारीरिक पाप में हिंसा, जबरन किसी का सामान ले लेना, पराई स्त्री के साथ संबंध शामिल हैं। वाचिक पापों में कठोर वाणी, झूठ बोलना, चुगलखोरी, अनावश्यक प्रलाप शामिल हैं। मानसिक पापों में दूसरे के प्रति अनिष्ट सोचना, लोभ और अपने शरीर को ही सबकुछ मानना शामिल हैं।

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  • कैसे बना केदारनाथ मंदिर,जाने इसका महत्व

    कैसे बना केदारनाथ मंदिर,जाने इसका महत्व

     

    केदारनाथ मंदिर भारत के उत्तराखंड राज्य के रूद्रप्रयाग जिले में स्थित है। उत्तराखंड में हिमालय पर्वत की गोद में केदारनाथ मंदिर 12 ज्योतिर्लिंग में सम्मिलित होने के साथ 4 धाम और पंच केदार में से भी एक है। केदारनाथ मंदिर 3593 फीट की ऊंचाई पर बना हुआ एक भव्य एवं विशाल मंदिर है। इतनी ऊंचाई पर इस मंदिर को कैसे बनाया गया, इसकी कल्पना आज भी नहीं की जा सकती है! मंदिर की पूजा श्री केदारनाथ द्वादश ज्योतिर्लिगों में से एक माना जाता है।

    यह मंदिर एक छह फीट ऊंचे चौकोर प्लेटफार्म पर बना हुआ है। मंदिर में मुख्य भाग मंडप और गर्भगृह के चारों ओर प्रदक्षिणा पथ है। बाहर प्रांगण में नंदी बैल वाहन के रूप में विराजमान हैं। मंदिर का निर्माण किसने कराया, इसका कोई प्रामाणिक उल्लेख नहीं मिलता है, लेकिन हां ऐसा भी कहा जाता है कि इसकी स्थापना आदिगुरु शंकराचार्य ने की। यहाँ की प्रतिकूल जलवायु के कारण यह मंदिर अप्रैल से नवंबर माह के मध्‍य ही दर्शन के लिए खुलता है। पत्‍थरों से बने कत्यूरी शैली से बने इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण पाण्डव वंश के जनमेजय ने कराया था। यहाँ स्थित स्वयम्भू शिवलिंग अति प्राचीन है।

    मंदिर के गर्भगृह में अर्धा के पास चारों कोनों पर चार सुदृढ़ पाषाण स्तंभ हैं, जहां से होकर प्रदक्षिणा होती है। अर्धा, जो चौकोर है, अंदर से पोली है और अपेक्षाकृत नवीन बनी है। सभामंडप विशाल एवं भव्य है। उसकी छत चार विशाल पाषाण स्तंभों पर टिकी है। विशालकाय छत एक ही पत्थर की बनी है। गवाक्षों में आठ पुरुष प्रमाण मूर्तियां हैं, जो अत्यंत कलात्मक हैं। 85 फुट ऊंचा, 187 फुट लंबा और 80 फुट चौड़ा है केदारनाथ मंदिर। इसकी दीवारें 12 फुट मोटी हैं और बेहद मजबूत पत्थरों से बनाई गई है। मंदिर को 6 फुट ऊंचे चबूतरे पर खड़ा किया गया है।

    मंदिर की पूजा श्री केदारनाथ द्वादश ज्योतिर्लिगों में से एक माना जाता है। प्रात:काल में शिव-पिंड को प्राकृतिक रूप से स्नान कराकर उस पर घी-लेपन किया जाता है। तत्पश्चात धूप-दीप जलाकर आरती उतारी जाती है। इस समय यात्री-गण मंदिर में प्रवेश कर पूजन कर सकते हैं, लेकिन संध्या के समय भगवान का श्रृंगार किया जाता है। उन्हें विविध प्रकार के चित्ताकर्षक ढंग से सजाया जाता है। भक्तगण दूर से केवल इसका दर्शन ही कर सकते हैं। केदारनाथ के पुजारी मैसूर के जंगम ब्राह्मण ही होते हैं। शंकर बैल की पीठ की आकृति-पिंड के रूप में श्री केदारनाथ में पूजे जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि जब भगवान शंकर बैल के रूप में अंतध्र्यान हुए, तो उनके धड से ऊपर का हिस्सा काठमाण्डू में प्रकट हुआ। अब वहां पशुपतिनाथ का मंदिर है। शिव की भुजाएं तुंगनाथ में, मुख रुद्रनाथमें, नाभि मदमदेश्वरमें और जटा कल्पेश्वरमें प्रकट हुए। इसलिए इन चार स्थानों सहित श्री केदारनाथ को पंचकेदार कहा जाता है। यहां शिवजी के भव्य मंदिर बने हुए हैं।

    इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना का इतिहास संक्षेप में यह है कि हिमालय के केदार श्रृंग पर भगवान विष्णु के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शंकर प्रकट हुए और उनके प्रार्थनानुसार ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा वास करने का वर प्रदान किया। यह स्थल केदारनाथ पर्वतराज हिमालय के केदार नामक श्रृंग पर अवस्थित हैं।

    जून 2013 के दौरान भारत के उत्तराखण्ड और हिमाचल प्रदेश राज्यों में अचानक आई बाढ़ और भूस्खलन के कारण केदारनाथ सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र रहा। मंदिर की दीवारें गिर गई और बाढ़ में बह गयी। इस ऐतिहासिक मन्दिर का मुख्य हिस्सा और सदियों पुराना गुंबद सुरक्षित रहे लेकिन मन्दिर का प्रवेश द्वार और उसके आस-पास का इलाका पूरी तरह तबाह हो गया था।

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  • जानिए हिंदू धर्म में रंगों का महत्व

    जानिए हिंदू धर्म में रंगों का महत्व

     

    हिंदू धर्म में केसरिया, पीला, गेरुआ, भगवा और लाल रंग को सबसे ज्यादा महत्व दिया जाता है। गेरू और भगवा रंग एक ही है, लेकिन केसरिया में मामूली-सा अंतर है। रंगों से जुड़े मनोविज्ञान और उसके मानव जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव को जानकर ही हिन्दू धर्म में कुछ विशेष रंगों को विशेष कार्यों में शामिल किया गया है। आपको बताते हैं कि हिन्दू धर्म में क्यों महत्वपूर्ण हैं ये सभी रंग और पीला रंग क्यों सबसे ज्यादा महत्व रखता है।

    वैज्ञानिकों के अनुसार मूलत: पांच रंग ही होते हैं, काला, सफेद, लाल, नीला और पीला। काले और सफेद को रंग मानना हमारी मजबूरी है जबकि यह कोई रंग नहीं है। इस तरह तीन ही प्रमुख रंग बच जाते हैं, लाल, पीला और नीला।

    जब कोई रंग बहुत फेड हो जाता है तो वह सफेद हो जाता है और जब कोई रंग बहुत डार्क हो जाता है तो वह काला पड़ जाता है। लाल रंग में अगर पीला मिला दिया जाए, तो वह केसरिया रंग बनता है। नीले में पीला मिल जाए, तब हरा रंग बन जाता है। इसी तरह से नीला और लाल मिलकर जामुनी बन जाते हैं। आगे चलकर इन्हीं प्रमुख रंगों से हजारों रंगो की उत्पत्ति हुई।

    अग्नि में आपको लाल, पीला और केसरिया रंग ही अधिक दिखाई देगा। हिन्दू धर्म में अग्नि का बहुत महत्व है। यज्ञ, दीपक और दाह-संस्कार अग्नि के ही कार्य हैं। अग्नि का संबंध पवित्र यज्ञों से भी है इसलिए भी केसरिया, पीला या नारंगी रंग हिन्दू परंपरा में बेहद शुभ माना गया है।

    अग्नि संपूर्ण संसार में हवा की तरह व्याप्त है लेकिन वह तभी दिखाई देती है जबकि उसे किसी को जलाना, भस्म करना या जिंदा बनाए रखना होता है। संन्यासी का स्वभाव भी अग्नि की तरह होता है, लेकिन वह किसी को जलाने के लिए नहीं बल्कि ठंड जैसे हालात में ऊर्जा देने के लिए सूर्य की तरह होता है। संन्यासी का पथ भी अग्निपथ ही होता है। ऐसा कहा जाता है कि अग्नि बुराई का विनाश करती है और अज्ञानता की बेड़ियों से भी व्यक्ति को मुक्त करवाती है।

    शरीर में रक्त महत्वपूर्ण होता है। हिन्दू धर्म में विवाहित महिला लाल रंग की साड़ी और हरी चूड़ियां पहनती है। इसके अलावा विवाह के समय दूल्हा भी लाल या केसरी रंग की पगड़ी ही धारण करता है, जो उसके आने वाले जीवन की खुशहाली से जुड़ी है। लाल रंग उत्साह, सौभाग्य, उमंग, साहस और नवजीवन का प्रतीक है। प्रकृति में लाल रंग या उसके ही रंग समूह के फूल अधिक पाए जाते हैं। मां लक्ष्मी को लाल रंग प्रिय है। मां लक्ष्मी लाल वस्त्र पहनती हैं और लाल रंग के कमल पर शोभायमान रहती हैं। रामभक्त हनुमान को भी लाल व सिन्दूरी रंग प्रिय हैं इसलिए भक्तगण उन्हें सिन्दूर अर्पित करते हैं।

    पीले रंग के वस्त्रों को पितांबर कहते हैं। इससे गुरु का बल बढ़ता है। गुरु हमारे भाग्य को जगाने वाला गृह है। जीवन में निराशा है तो पतझड़ आ जाएगा अर्थात निराशा के भाव आपको संन्यास या आत्महत्या की ओर ले जाएंगे। निराशा दो तरह की होती है। एक संन्यासी की जिसमें वैराग्य भाव जाग्रत होता है मृत्य एक सत्य है यह जानकर। पीला रंग वैराग्य का भी प्रतीक है। जब पतझड़ आता है तो पत्ते पीले पड़ जाते हैं। दूसरी निराशा सांसारी की होती है जो जीवन में किसी मोर्चे पर असफल हो जाता है। संसारी के लिए हर दम प्रसन्नता और उत्साह जरूरी है तभी वह उन्नती कर सकता है।

    किसी भी प्रकार के मांगलिक कार्य में पीले रंग का इस्तेमाल किया जाता है। पूजा-पाठ में पीला रंग शुभ माना जाता है। केसरिया या पीला रंग सूर्यदेव, मंगल और बृहस्पति जैसे ग्रहों का भी प्रतिनिधित्व करता है। यह रोशनी को भी दर्शाता है। इस तरह पीला रंग बहुत कुछ कहता है।

    केसरिया या भगवा रंग का चित्त क्षोम और रात्रि अंधता में इस रंग का प्रयोग करना चाहिए। भगवा या केसरिया सूर्योदय और सूर्यास्त का रंग भी है, मतलब हिन्दू की चिरंतन, सनातनी, पुनर्जन्म की धारणाओं को बताने वाला रंग है यह। केसरिया रंग त्याग, बलिदान, ज्ञान, शुद्धता एवं सेवा का प्रतीक है। शिवाजी की सेना का ध्वज, राम, कृष्ण और अर्जुन के रथों के ध्वज का रंग केसरिया ही था। केसरिया या भगवा रंग शौर्य, बलिदान और वीरता का प्रतीक भी है।

    सनातन धर्म में केसरिया रंग उन साधु-संन्यासियों द्वारा धारण किया जाता है, जो मुमुक्षु होकर मोक्ष के मार्ग पर चलने लिए कृतसंकल्प होते हैं। ऐसे संन्यासी खुद और अपने परिवारों के सदस्यों का पिंडदान करके सभी तरह की मोह-माया त्यागकर आश्रम में रहते हैं। भगवा वस्त्र को संयम, संकल्प और आत्मनियंत्रण का भी प्रतीक माना गया है।

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