अध्यात्म

  • 17 जुलाई से सावन महीने की शुरुआत, 30 दिन का होगा सावन

    17 जुलाई से सावन महीने की शुरुआत, 30 दिन का होगा सावन

     

    इस साल सावन का महीना पूरे 30 दिन का रहेगा। 17 जुलाई से सावन माह की शुरुआत हो रही है और 15 अगस्त के दिन रक्षाबंधन पर इसका समापन होगा। इस साल सावन माह के चारों सोमवार पर विशेष योग बन रहा है। काशी के ज्योतिषाचार्य पं गणेश मिश्रा के अनुसार कृष्ण पक्ष में द्वितीया तिथि की वृद्धि है। द्वितीया तिथि 18-19 जुलाई को मनेगी। वहीं श्रावण शुक्ल पक्ष में प्रतिपदा तिथि का क्षय है। इस प्रकार घट-बढ़ से सावन पूरे 30 दिन का होगा। सावन माह में सोमवार का विशेष महत्व होता है। सोमवार शिव का प्रिय दिन है। सावन में कुल चार सोमवार आ रहे है, जो 22 जुलाई, 29 जुलाई, 5 अगस्त और 12 अगस्त को हैं।

    22 जुलाई को सावन सोमवार के साथ मरुस्थली नाग पंचमी है। 29 जुलाई को सावन सोमवार को सोमप्रदोष और स्वार्थ सिद्धि एवं अमृत सिद्धि योग बन रहा है। 5 अगस्त को देशाचारी नागपंचमी और सावन सोमवार है, जबकि 12 अगस्त को सोमप्रदोष और सावन सोमवार का योग बना है। इनके अलावा जुलाई में 20 तारीख को श्रावणी चतुर्थी और रविपुष्य का सिद्धिदायक योग बन रहा है। इसी महीने 28 जुलाई को कामदा एकादशी है और 30 जुलाई को महाशिवरात्रि का पर्व है।

    इस बार 19 साल बाद ऐसा संयोग बन रहा है कि सूर्य संक्रांति के साथ ही सावन की शुरुआत हो रही है।  सावन मास का आरंभ होगा। कर्क राशि में सूर्य का प्रवेश होने के साथ ही सावन की शुरुआत भी शुभ मानी जा रही है। सावन की शुरुआत में सूर्य राशि बदलकर अपने मित्र ग्रह मंगल के साथ आ जाएगा। वहीं मकर राशि के चंद्रमा का मंगल के साथ दृष्टि संबंध होने से महालक्ष्मी योग भी बनेगा। ग्रहों की इस शुभ स्थिति के कारण सावन का महत्व और भी बढ़ जाएगा।

    भोलेनाथ ने राजा दक्ष को वरदान दिया था कि सावन महीने में वह कैलाश पर्वत से उतर कर दुनिया के हर शिवलिंग में वास करेंगे। इस दौरान कोई भी श्रद्धालु शिवलिंग पर जल चढ़ाएगा तो वह गंगाजल बनकर स्वयं शिव को प्राप्त होगा। इसलिए भगवान शिव को जल धारा प्रिय है। इसके अलावा बेलपत्र चढ़ाने से श्रद्धालुओं को दैविक, दैहिक व भौतिक दुखों से मुक्ति प्राप्त होती है।

    सावन मास में भगवान शिव को जलधारा चढ़ाने का विशेष महत्व है। वहीं शिवलिंग पर बिल्व पत्र, केसर युक्त चंदन, सूखे मेवे का भोग, आकड़े के फूल व धतूरा चढ़ाने से शिव कृपा प्राप्त होती है। कलयुग में शिव ही ऐसे देवता है जो चारों पुरुषार्थ की प्राप्त करवाते है। पूरे सावन माह में भोले की भक्ति संभव न हो तो सोमवार को उपवास के साथ, मंदिर में ओम नम: शिवाय के साथ जल अवश्य चढ़ाए।

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  • 149 साल बाद बन रहा संयोग, गुरु पूर्णिमा पर चंद्रग्रहण का साया

    149 साल बाद बन रहा संयोग, गुरु पूर्णिमा पर चंद्रग्रहण का साया

     

    इस वर्ष 16 और 17 जुलाई को 149 साल बाद गुरु पूर्णिमा पर चन्द्रग्रहण का साया रहेगा। 16 जुलाई को दोपहर डेढ़ बजे ग्रहण का सूतककाल शुरू होगा। श्रद्धालु डेढ़ बजे से पूर्व ही गुरु की पूजा-अर्चना कर पाएंगे। यह ग्रहण भारत में दिखाई देगा। ज्योतिष शास्त्रियों के अनुसार 149 साल पहले यानि 12 और 13 जुलाई, 1870 को ऐसा हुआ था जब गुरु पूर्णिमा और चंद्र ग्रहण एक साथ पड़े थे। उस समय चंद्रमा शनि, राहु और केतु के साथ धनु राशि में था। साथ ही सूर्य और राहु एक साथ मिथुन राशि में प्रवेश कर गए थे।

    इस बार भी 2019 में यह चंद्र ग्रहण आषाढ़ मास की पूर्णिमा यानि गुरु पूर्णिमा के दिन लगने जा रहा है। गुरु पूर्णिमा के दिन लगने वाला यह चंद्र ग्रहण भारत में दिखाई देगा। भारत के अलावा एशिया, यूरोप, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अमेरिका में दिखाई देगा।

    इस चंद्र ग्रहण के समय राहु और शनि चंद्रमा के साथ धनु राशि में स्थित रहेंगे। ग्रहों की ऐसी स्थिति होने के कारण ग्रहण का प्रभाव और भी अधिक नजर आएगा। ऐसा इसलिए क्योंकि राहु और शुक्र सूर्य के साथ रहेंगे। साथ ही चार विपरीत ग्रह शुक्र, शनि, राहु और केतु के घेरे में सूर्य रहेगा। इस स्थिति में मंगल नीच का हो जाएगा। ग्रहण के समय ग्रहों की ये स्थिति तनाव बढ़ाने वाला साबित होगा। ऐसे में प्राकृतिक आपदाएं आने की आशंका रहेगी।

     

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  • श्रद्धालुओं में भारी उत्साह, अब तक 22 हजार से अधिक श्रद्धालुओं ने किए बाबा बर्फानी के दर्शन

    श्रद्धालुओं में भारी उत्साह, अब तक 22 हजार से अधिक श्रद्धालुओं ने किए बाबा बर्फानी के दर्शन

     

    एक जुलाई से शुरू हुई अमरनाथ यात्रा में अब तक बीते तीन दिनों के दौरान 22 हजार से अधिक श्रद्धालुओं ने सफलतापूर्वक बाबा बर्फानी के दर्शन कर लिए हैं। इन श्रद्धालुओं को अब बालटाल और पहलगाम बेस कैंप के लिए रवाना कर दिया गया है। वापसी की यात्रा के दौरान, श्रद्धालुओं की मदद के लिए अर्धसैनिक बलों के जवानों को  जगह-जगह पर तैनात किया गया है।

    अमरनाथ यात्रा की सुरक्षा से जुड़े वरिष्‍ठ अधिकारी के अनुसार, तीन जुलाई तक बालटाल बेस कैंप से आए 7840 श्रद्धालुओं ने बाबा बर्फानी के दर्शन कर लिए हैं। जिसमें 1264 हेलीकॉप्‍टर के जरिए परित्र गुफा तक पहुंचे थे। वहीं 6376 श्रद्धालुओं ने पवित्र गुफा तक पैदल यात्रा की थी। उन्‍होंने बताया कि पहलगाम बेस कैंप से आए 14174 श्रद्धालुओं ने अपनी यात्रा का एक चरण पूरा कर बाबा बर्फानी के दर्शन पूरे किए हैं। इनमें 339 श्रद्धालु हेलीकॉप्‍टर के जरिए बाबा अमरनाथ की गुफा तक पहुंचे थे। जबकि पैदल आए श्रद्धालुओं की संख्‍या करीब 14174 थी।

    उन्‍होंने बताया कि इस तरफ, 3 जुलाई तक कुल 22014 श्रद्धालुओं ने बाबा अमरनाथ की यात्रा पूरी की है। बता दे एक जुलाई से शुरू हुई अमरनाथ यात्रा 45 दिनों तक जारी रहेगी। अमरनाथ के लिए आखिरी जत्‍था 15 अगस्‍त को रवाना होगा। 2018 में करीब 2 लाख 85 हजार श्रद्धालुओं ने बाबा बर्फानी के दर्शन किए थे।

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  • साल का दूसरा सूर्य ग्रहण आज, नासा करेगी पूर्ण सूर्य ग्रहण की लाइव स्ट्रीमिंग

    साल का दूसरा सूर्य ग्रहण आज, नासा करेगी पूर्ण सूर्य ग्रहण की लाइव स्ट्रीमिंग

     

    साल 2019 का दूसरा सूर्य ग्रहण मंगलवार 2 जुलाई यानि आज होने जा रहा है। इस बार के सूर्य ग्रहण की खास बात यह है कि इस बार पूर्ण सूर्य ग्रहण होने जा रहा है, यानि दिन में ही रात जैसा नजारा होगा। दुनियाभर के लोगों ने इस अनोखी खगोलीय घटना का गवाह बनने के लिए तमाम तरह की तैयारियां कर ली हैं। भारतीय समयानुसार सूर्य ग्रहण मंगलवार 2 जुलाई को रात 10.25 बजे शुरू होगा। इस दौरान पूरे 4 मिनट, 33 सेकेंड्स तक पूर्ण सूर्य ग्रहण रहेगा। हालांकि, अगस्त 2017 में हुए पिछले पूर्ण सूर्य ग्रहण के मुकाबले इस सूर्य ग्रहण का पूरा समय लगभग दोगुना होगा। उस वक्त पूर्ण सूर्य ग्रहण सिर्फ 2 मिनट, 40 सेकेंड्स तक चला था।

    इस बार अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा इस पूर्ण सूर्यग्रहण की लाइव स्ट्रीमिंग करेगी। इसके अलावा यह अंतरिक्ष एजेंसी तस्वीरें भी जारी करेगी। कुल 161 मिनट यानि 2 घंटे 41 मिनट तक यह सूर्य ग्रहण चलेगा। हालांकि, भारत में जो लोग पूर्ण सूर्य ग्रहण का नाजारा देखना चाहते हैं उन्हें निराश होना पड़ेगा, क्योंकि इसे देश के किसी भी कोने से नहीं देखा जा सकेगा। इसके बावजूद नासा की लाइव स्ट्रीमिंग के जरिए कोई भी इस खगोलीय घटना का साक्षी बन सकता है।

    यह सूर्य ग्रहण चिली, अर्जेंटीना और दक्षिण पैसिफिक क्षेत्र में करीब 6000 मील तक दिखेगा, लेकिन भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और नेपाल जैसे एशियाई देशों में इस सूर्य ग्रहण को नहीं देखा जा सकेगा। ऐसी अनोखी खगोलीय घटनाएं होती रहती हैं और अगली बार पूर्ण सूर्य ग्रहण दिसंबर 2020 में दिखेगा, जबकि पिछला पूर्ण सूर्य ग्रहण अगस्त 2017 में हुआ था।

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  • बाबा बर्फानी के दर्शन के लिए अमरनाथ यात्रियों का पहला जत्था रवाना

    बाबा बर्फानी के दर्शन के लिए अमरनाथ यात्रियों का पहला जत्था रवाना

     

    भारी सुरक्षा बंदोबस्त के बीच सोमवार सुबह 1250 अमरनाथ यात्रियों का पहला जत्था पहलगाम बेस कैंप से बाबा बर्फानी के दर्शन के लिए रवाना हो गया है। अनंतनाग के जिला विकास आयुक्त खालिद जहांगीर ने अन्य पुलिस अधिकारियों के साथ यात्रा को हरी झंडी दिखाई। अमरनाथ यात्रा 1 जुलाई से शुरू होकर 15 अगस्त तक चलेगी।

    45 दिन की अमरनाथ यात्रा सोमवार को औपचारिक रूप से शुरू हो गई और 15 अगस्त को श्रावण पूर्णिमा पर्व के दिन इसका समापन होगा। इससे पहले रविवार को तीर्थ यात्रियों के पहले जत्थे में 1,051 लोग उत्तरी कश्मीर के बालटाल आधार शिविर के लिए रवाना हुए, जबकि 1,183 लोग पहलगाम आधार शिविर के लिए रवाना हुए। श्रद्धालुओं में 1,839 पुरुष, 333 महिलाएं, 45 साधु और 17 बच्चे शामिल हैं।

    एक पुलिस अधिकारी ने कहा, तीर्थयात्री सुरक्षा दस्ते के साथ काफिलों में रवाना हुए। रविवार को जम्मू-श्रीनगर राजमार्ग पर दोपहर तीन बजे तक विपरीत दिशा से यातायात बंद रहा ताकि तीर्थयात्री बिना किसी देरी के जवाहर सुरंग पार कर लें। इस साल शांतिपूर्ण अमरनाथ यात्रा के लिए काफी दुरुस्त सुरक्षा व्यवस्था की गई है।

    पिछले सप्ताह अपनी कश्मीर यात्रा के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा की थी। श्रद्धालुओं के अनुसार, समुद्र तल से 3,888 मीटर की ऊंचाई पर स्थित अमरनाथ गुफा में बर्फ का विशाल शिवलिंग बनता है जो भगवान शिव की पौराणिक शक्तियों का प्रतीक है।

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  • जानिए ज्येष्ठ के दशहरे पर गंगा स्नान और दान करने का विशेष महत्व

    जानिए ज्येष्ठ के दशहरे पर गंगा स्नान और दान करने का विशेष महत्व

     

    ज्येष्ठ शुक्ल दशमी तिथि बुधवार 12 जून को पूरे देश में गंगा अवतरण दिवस यानी गंगा दशहरा श्रद्धाभाव से मनाया जाएगा। ज्येष्ठ के दशहरे पर गंगा स्नान व दान करने का विशेष महत्व है। इस तिथि पर भगवान राम ने रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना की थी। पंडितों के अनुसार ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी को ही गंगा का धरती पर अवतरण हुआ था। इसी कारण इसे गंगा दशहरा के रूप में भी जाना जाता है। मां गंगा इसी तिथि पर धरती पर संपन्नता और शुद्धता लेकर आई थीं।

    पंडितों के अनुसार इस बार गंगा दशहरा पर बुधवार को खास संयोग बन रहा है। यह युग्म संयोग कर्क, धनु, मीन आदि राशि के लोगों के लिए शुभ संयोग लेकर आया है। इस दिन गंगा स्नान के साथ दान का बहुत महत्व है। कहा जाता है कि इस तिथि में गंगा स्नान के बाद दान करने से सात जन्मों के पाप व कष्टों से मुक्ति मिलती है। साथ ही एक हजार वाजस्नेयी यज्ञ के समान फल की प्राप्ति होती है।

    पंडितों के अनुसार गंगा दशहरा पर गंगा का नाम लेने, सूनने, देखने, स्नान, ध्यान, पूजन आदि करने से दस तरह के पापों का नाश होता है। धर्मशास्त्रों में लिखा है कि इसमें तीन तरह के पाप शारीरिक, चार तरह के वाचिक और तीन तरह के मानसिक पाप हैं। शारीरिक पाप में हिंसा, जबरन किसी का सामान ले लेना, पराई स्त्री के साथ संबंध शामिल हैं। वाचिक पापों में कठोर वाणी, झूठ बोलना, चुगलखोरी, अनावश्यक प्रलाप शामिल हैं। मानसिक पापों में दूसरे के प्रति अनिष्ट सोचना, लोभ और अपने शरीर को ही सबकुछ मानना शामिल हैं।

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  • कैसे बना केदारनाथ मंदिर,जाने इसका महत्व

    कैसे बना केदारनाथ मंदिर,जाने इसका महत्व

     

    केदारनाथ मंदिर भारत के उत्तराखंड राज्य के रूद्रप्रयाग जिले में स्थित है। उत्तराखंड में हिमालय पर्वत की गोद में केदारनाथ मंदिर 12 ज्योतिर्लिंग में सम्मिलित होने के साथ 4 धाम और पंच केदार में से भी एक है। केदारनाथ मंदिर 3593 फीट की ऊंचाई पर बना हुआ एक भव्य एवं विशाल मंदिर है। इतनी ऊंचाई पर इस मंदिर को कैसे बनाया गया, इसकी कल्पना आज भी नहीं की जा सकती है! मंदिर की पूजा श्री केदारनाथ द्वादश ज्योतिर्लिगों में से एक माना जाता है।

    यह मंदिर एक छह फीट ऊंचे चौकोर प्लेटफार्म पर बना हुआ है। मंदिर में मुख्य भाग मंडप और गर्भगृह के चारों ओर प्रदक्षिणा पथ है। बाहर प्रांगण में नंदी बैल वाहन के रूप में विराजमान हैं। मंदिर का निर्माण किसने कराया, इसका कोई प्रामाणिक उल्लेख नहीं मिलता है, लेकिन हां ऐसा भी कहा जाता है कि इसकी स्थापना आदिगुरु शंकराचार्य ने की। यहाँ की प्रतिकूल जलवायु के कारण यह मंदिर अप्रैल से नवंबर माह के मध्‍य ही दर्शन के लिए खुलता है। पत्‍थरों से बने कत्यूरी शैली से बने इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण पाण्डव वंश के जनमेजय ने कराया था। यहाँ स्थित स्वयम्भू शिवलिंग अति प्राचीन है।

    मंदिर के गर्भगृह में अर्धा के पास चारों कोनों पर चार सुदृढ़ पाषाण स्तंभ हैं, जहां से होकर प्रदक्षिणा होती है। अर्धा, जो चौकोर है, अंदर से पोली है और अपेक्षाकृत नवीन बनी है। सभामंडप विशाल एवं भव्य है। उसकी छत चार विशाल पाषाण स्तंभों पर टिकी है। विशालकाय छत एक ही पत्थर की बनी है। गवाक्षों में आठ पुरुष प्रमाण मूर्तियां हैं, जो अत्यंत कलात्मक हैं। 85 फुट ऊंचा, 187 फुट लंबा और 80 फुट चौड़ा है केदारनाथ मंदिर। इसकी दीवारें 12 फुट मोटी हैं और बेहद मजबूत पत्थरों से बनाई गई है। मंदिर को 6 फुट ऊंचे चबूतरे पर खड़ा किया गया है।

    मंदिर की पूजा श्री केदारनाथ द्वादश ज्योतिर्लिगों में से एक माना जाता है। प्रात:काल में शिव-पिंड को प्राकृतिक रूप से स्नान कराकर उस पर घी-लेपन किया जाता है। तत्पश्चात धूप-दीप जलाकर आरती उतारी जाती है। इस समय यात्री-गण मंदिर में प्रवेश कर पूजन कर सकते हैं, लेकिन संध्या के समय भगवान का श्रृंगार किया जाता है। उन्हें विविध प्रकार के चित्ताकर्षक ढंग से सजाया जाता है। भक्तगण दूर से केवल इसका दर्शन ही कर सकते हैं। केदारनाथ के पुजारी मैसूर के जंगम ब्राह्मण ही होते हैं। शंकर बैल की पीठ की आकृति-पिंड के रूप में श्री केदारनाथ में पूजे जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि जब भगवान शंकर बैल के रूप में अंतध्र्यान हुए, तो उनके धड से ऊपर का हिस्सा काठमाण्डू में प्रकट हुआ। अब वहां पशुपतिनाथ का मंदिर है। शिव की भुजाएं तुंगनाथ में, मुख रुद्रनाथमें, नाभि मदमदेश्वरमें और जटा कल्पेश्वरमें प्रकट हुए। इसलिए इन चार स्थानों सहित श्री केदारनाथ को पंचकेदार कहा जाता है। यहां शिवजी के भव्य मंदिर बने हुए हैं।

    इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना का इतिहास संक्षेप में यह है कि हिमालय के केदार श्रृंग पर भगवान विष्णु के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शंकर प्रकट हुए और उनके प्रार्थनानुसार ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा वास करने का वर प्रदान किया। यह स्थल केदारनाथ पर्वतराज हिमालय के केदार नामक श्रृंग पर अवस्थित हैं।

    जून 2013 के दौरान भारत के उत्तराखण्ड और हिमाचल प्रदेश राज्यों में अचानक आई बाढ़ और भूस्खलन के कारण केदारनाथ सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र रहा। मंदिर की दीवारें गिर गई और बाढ़ में बह गयी। इस ऐतिहासिक मन्दिर का मुख्य हिस्सा और सदियों पुराना गुंबद सुरक्षित रहे लेकिन मन्दिर का प्रवेश द्वार और उसके आस-पास का इलाका पूरी तरह तबाह हो गया था।

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  • जानिए हिंदू धर्म में रंगों का महत्व

    जानिए हिंदू धर्म में रंगों का महत्व

     

    हिंदू धर्म में केसरिया, पीला, गेरुआ, भगवा और लाल रंग को सबसे ज्यादा महत्व दिया जाता है। गेरू और भगवा रंग एक ही है, लेकिन केसरिया में मामूली-सा अंतर है। रंगों से जुड़े मनोविज्ञान और उसके मानव जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव को जानकर ही हिन्दू धर्म में कुछ विशेष रंगों को विशेष कार्यों में शामिल किया गया है। आपको बताते हैं कि हिन्दू धर्म में क्यों महत्वपूर्ण हैं ये सभी रंग और पीला रंग क्यों सबसे ज्यादा महत्व रखता है।

    वैज्ञानिकों के अनुसार मूलत: पांच रंग ही होते हैं, काला, सफेद, लाल, नीला और पीला। काले और सफेद को रंग मानना हमारी मजबूरी है जबकि यह कोई रंग नहीं है। इस तरह तीन ही प्रमुख रंग बच जाते हैं, लाल, पीला और नीला।

    जब कोई रंग बहुत फेड हो जाता है तो वह सफेद हो जाता है और जब कोई रंग बहुत डार्क हो जाता है तो वह काला पड़ जाता है। लाल रंग में अगर पीला मिला दिया जाए, तो वह केसरिया रंग बनता है। नीले में पीला मिल जाए, तब हरा रंग बन जाता है। इसी तरह से नीला और लाल मिलकर जामुनी बन जाते हैं। आगे चलकर इन्हीं प्रमुख रंगों से हजारों रंगो की उत्पत्ति हुई।

    अग्नि में आपको लाल, पीला और केसरिया रंग ही अधिक दिखाई देगा। हिन्दू धर्म में अग्नि का बहुत महत्व है। यज्ञ, दीपक और दाह-संस्कार अग्नि के ही कार्य हैं। अग्नि का संबंध पवित्र यज्ञों से भी है इसलिए भी केसरिया, पीला या नारंगी रंग हिन्दू परंपरा में बेहद शुभ माना गया है।

    अग्नि संपूर्ण संसार में हवा की तरह व्याप्त है लेकिन वह तभी दिखाई देती है जबकि उसे किसी को जलाना, भस्म करना या जिंदा बनाए रखना होता है। संन्यासी का स्वभाव भी अग्नि की तरह होता है, लेकिन वह किसी को जलाने के लिए नहीं बल्कि ठंड जैसे हालात में ऊर्जा देने के लिए सूर्य की तरह होता है। संन्यासी का पथ भी अग्निपथ ही होता है। ऐसा कहा जाता है कि अग्नि बुराई का विनाश करती है और अज्ञानता की बेड़ियों से भी व्यक्ति को मुक्त करवाती है।

    शरीर में रक्त महत्वपूर्ण होता है। हिन्दू धर्म में विवाहित महिला लाल रंग की साड़ी और हरी चूड़ियां पहनती है। इसके अलावा विवाह के समय दूल्हा भी लाल या केसरी रंग की पगड़ी ही धारण करता है, जो उसके आने वाले जीवन की खुशहाली से जुड़ी है। लाल रंग उत्साह, सौभाग्य, उमंग, साहस और नवजीवन का प्रतीक है। प्रकृति में लाल रंग या उसके ही रंग समूह के फूल अधिक पाए जाते हैं। मां लक्ष्मी को लाल रंग प्रिय है। मां लक्ष्मी लाल वस्त्र पहनती हैं और लाल रंग के कमल पर शोभायमान रहती हैं। रामभक्त हनुमान को भी लाल व सिन्दूरी रंग प्रिय हैं इसलिए भक्तगण उन्हें सिन्दूर अर्पित करते हैं।

    पीले रंग के वस्त्रों को पितांबर कहते हैं। इससे गुरु का बल बढ़ता है। गुरु हमारे भाग्य को जगाने वाला गृह है। जीवन में निराशा है तो पतझड़ आ जाएगा अर्थात निराशा के भाव आपको संन्यास या आत्महत्या की ओर ले जाएंगे। निराशा दो तरह की होती है। एक संन्यासी की जिसमें वैराग्य भाव जाग्रत होता है मृत्य एक सत्य है यह जानकर। पीला रंग वैराग्य का भी प्रतीक है। जब पतझड़ आता है तो पत्ते पीले पड़ जाते हैं। दूसरी निराशा सांसारी की होती है जो जीवन में किसी मोर्चे पर असफल हो जाता है। संसारी के लिए हर दम प्रसन्नता और उत्साह जरूरी है तभी वह उन्नती कर सकता है।

    किसी भी प्रकार के मांगलिक कार्य में पीले रंग का इस्तेमाल किया जाता है। पूजा-पाठ में पीला रंग शुभ माना जाता है। केसरिया या पीला रंग सूर्यदेव, मंगल और बृहस्पति जैसे ग्रहों का भी प्रतिनिधित्व करता है। यह रोशनी को भी दर्शाता है। इस तरह पीला रंग बहुत कुछ कहता है।

    केसरिया या भगवा रंग का चित्त क्षोम और रात्रि अंधता में इस रंग का प्रयोग करना चाहिए। भगवा या केसरिया सूर्योदय और सूर्यास्त का रंग भी है, मतलब हिन्दू की चिरंतन, सनातनी, पुनर्जन्म की धारणाओं को बताने वाला रंग है यह। केसरिया रंग त्याग, बलिदान, ज्ञान, शुद्धता एवं सेवा का प्रतीक है। शिवाजी की सेना का ध्वज, राम, कृष्ण और अर्जुन के रथों के ध्वज का रंग केसरिया ही था। केसरिया या भगवा रंग शौर्य, बलिदान और वीरता का प्रतीक भी है।

    सनातन धर्म में केसरिया रंग उन साधु-संन्यासियों द्वारा धारण किया जाता है, जो मुमुक्षु होकर मोक्ष के मार्ग पर चलने लिए कृतसंकल्प होते हैं। ऐसे संन्यासी खुद और अपने परिवारों के सदस्यों का पिंडदान करके सभी तरह की मोह-माया त्यागकर आश्रम में रहते हैं। भगवा वस्त्र को संयम, संकल्प और आत्मनियंत्रण का भी प्रतीक माना गया है।

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  • चारधाम यात्रा: ब्रह्मवेला में खुले भगवान केदारनाथ के कपाट, दर्शन को उमड़े श्रद्धालु

    चारधाम यात्रा: ब्रह्मवेला में खुले भगवान केदारनाथ के कपाट, दर्शन को उमड़े श्रद्धालु

     

    भोलेनाथ के भक्‍तों के लिये आज बेहद खास दिन हैं क्‍योंकि आज श्री केदारनाथ धाम के कपाट सुबह 5 बजकर 35 मिनट पर खुल चुके हैं। श्री केदारनाथ के मंदिर को बड़े ही भव्‍य तरीके से सजाया गया है। कपाट खुलते के बााद से ही भोले बाबा के दरबार में दर्शन के लिए हजारों की तादाद में श्रद्धालुओं की कतारें लगना शुरू हो गई हैं। बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के अध्यक्ष मोहन लाल थपलियाल ने कहा कि केदारनाथ मंदिर परिसर में अभी भी भारी बर्फ जमी हुई है, लेकिन मंदिर जाने वाले मार्ग को साफ कर दिया गया है।

    जानकारी के मुताबिक, ब्राह्मवेला से पहले मंदिर समिति ने केदारनाथ मंदिर के कपाट खुलने की तैयारियां पूरी कर ली थी. बाबा केदार की उत्सव डोली को मुख्य पुजारी केदार लिंग द्वारा भोग लगाने के साथ ही नित पूजाएं की गई, जिसके बाद डोली को सजाया गया. 

    केदारनाथ रावल भीमाशंकर लिंग, वेदपाठियों, पुजारियों, हक्क हकूकधारियों की मौजूदगी में कपाट पर वैदिक परंपराओं के अनुसार मंत्रौच्चारण किया गया. इसके बाद ठीक 6 बजे मुख्य कपाट भक्तों के दर्शनाथ खोल दिए गए.

    बाबा केदार के धाम को मंदिर समिति द्वारा गेंदा और अन्य प्रकार के करीब 15 कुंतल फूलों से सजाया गया. अब आने वाले छह महीने तक यहीं पर भक्त केदार बाबा के दर्शन कर सकेंगे.

    भारी बर्फबारी के बावजूद बड़ी संख्या में भक्त केदारनाथ आए. सेना की जम्मू-कश्मीर लाईट इंफेंटरी के बेंड की धुनों ने पूरा केदारनाथ का वातावरण भोले बाबा के जयकारो से गुंजायमान हो गया. 

     

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  • Happy Navratri SMS In Hindi/ हैप्पी नवरात्रि एसएमएस हिंदी: अपनों को भेजें ये टॉप 10 शुभकामनाएं संदेश

    Happy Navratri SMS In Hindi/ हैप्पी नवरात्रि एसएमएस हिंदी: अपनों को भेजें ये टॉप 10 शुभकामनाएं संदेश

     

    Happy Navratri SMS In Hindi/ हैप्पी नवरात्री एसएमएस हिंदी - नवरात्रि 2019 (Navratri 2019) चैत्र मास के शुक्ल पक्ष के दिन शनिवार 6 अप्रैल से शुरू हो रहे हैं। यह नवरात्रि 13 अप्रैल तक चलेंगे। नौ दिन लोग मां दुर्गा (Maa Durga) के नौ स्वरूपों की पूजा अर्चना करते हैं। इस खास मौके पर आप इन दिनों में अपने आस पास के लोगों को ये भक्तिमय एसएमएस (SMS) भेज सकते हैं। आइए अब हम नवरात्रि पर एसएमएस को फेसबुक (Facebook), ट्विटर (Twitter) और व्हाट्सएप्प (Whatsapp) पर भी शेयर कर सकते हैं वहीं दूसरी तरफ गूगल (Google) सर्च इंजन पर भी नवरात्रि के एसएमएस, फोटो, वीडियो, इमेज, कोट्स और स्टेट्स सर्च कर रहे हैं।

     

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    Happy Navratri SMS In Hindi/ हैप्पी नवरात्रि एसएमएस हिंदी

    लाल रंग की चुनरी से सजा माँ का दरबार

    हर्षित हुआ मन

    पुलकित हुआ संसार

    नन्हें नन्हें क़दमों से

    माँ आये आपके द्वार

    मुबारक हो नवरात्रि का त्यौहार

    ये है कामना हमारी माँ दुर्गा से

    आपके जीवन में

    सुख

    समृद्धि

    अच्छा स्वास्थ्य

    धन और यश की बरसात हो

    नवरात्रि की शुभकामनाएं

    माता दुर्गा आप और आपके परिवार को

    सुख, समृद्धि, अच्छा स्वास्थ्य, भक्ति और शक्ति प्रदान करें

    हैप्पी नवरात्री

    हमको था इंतज़ार वो घड़ी आ गई

    होकर सिंह पर सवार माता रानी आ गई

    होगी अब मन की हर मुराद पूरी

    हरने सारे दुख माता अपने द्वार आ गई

    नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं

    या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता

    नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:

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  • जाने गुप्त नवरात्रों का रहस्य, मां की पूजा से होगी मनोकामना पूरी

    जाने गुप्त नवरात्रों का रहस्य, मां की पूजा से होगी मनोकामना पूरी


    गुप्त नवराओं का आज से आगाज से हो चुका है. कैसे करनी है पूजा? जानने के लिए पढ़े..

    साल में चैत्र नवरात्र और शारदीय नवरात्र के बारे में तो सब जानते ही है लेकिन इसके अवाला ऋतु परिवर्तन के दौरान 2 नवरात्रें ओर भी होते है जिनका वर्णन नही किया जाता. जो कि गुप्त नवरात्रों के नाम से जाने जाते है. इन नवरात्रों के बारे में ज्यादा लोगों को नहीं पता क्योकि यह गोपनीय रखे जाते है. इन नवरात्रों में मां दुर्गा की दस महाविद्याओं की पूजा-अर्चना की जाती है.

    गुप्त नवरात्रें का महत्व
    तंत्र विद्या में आस्‍था रखने वाले लोगों के लिए यह नवरात्र बहुत महत्‍व रखते हैं. 2019 में गुप्त नवरात्र 5 फरवरी से आरंभ होगें और 14 फरवरी पर इसका सम्मापन होगा.

    कब मनाए जाते हैं गुप्‍त नवरात्र?
    गुप्‍त नवरात्र साल में दो बार आषाढ़ और माघ मास के शुक्‍ल पक्ष में मनाए जाते हैं. तंत्र साधना में विश्‍वास रखने वाले लोग इस दौरान तंत्र साधना करते हैं. जैसे चैत्र और आश्विन मास के नवरात्रों में मां दुर्गा के नौं रूपों की पूजा नियम से की जाती है वैसे ही इन गुप्त नवरात्रों में विशेष लक्ष्य प्राप्ति के लिए साधना की जाती है. इन नवरात्रों में 10 महाविद्याओं की साधना का महत्व है.
     
    क्या है गुप्‍त नवरात्र की पौराणिक कथा 
    पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन काल में ऋषि श्रंगी एक बार अपने भक्तों को प्रवचन दे रहे थे. तभी भीड़ में से एक स्त्री बोली, 'मेरे पति दुर्व्यसनों से घिरे हैं. इस वजह से मैं धार्मिक कार्य व्रत-उपवास, अनुष्ठान नहीं कर पाती हूं. मैं मां दुर्गा की शरण में जाना चाहती हूं, लेकिन मेरे पति के पापों की वजह से मां की कृपा नहीं हो पा रही है. मेरा मार्गदर्शन करें.' इस तरह का वृतांत सुन ऋषि श्रंगी बोले, 'चैत्र और शारदीय नवरात्र में तो हर कोई पूजा करता है. लेकिन इनके अलावा साल में दो बार गुप्त नवरात्र भी आते हैं. इनमें नौ देवियों की बजाय 10 महाविद्याओं की उपासना की जाती है. अगर तुम विधिवत ऐसा कर सको तो मां दुर्गा की कृपा से तुम्हारा जीवन खुशियों से भर जाएगा.' यह सुन स्त्री ने गुप्त नवरात्र में मां दुर्गा की कठोर साधना की. स्त्री की भक्ति से मां प्रसन्न हुईं और उसके पति को सद्बुद्धि आ गई. स्‍त्री की गृहस्‍थी संपन्‍न और खुशहाल हो गई. 

    गुप्‍त नवरात्र में कैसे करें देवी की आराधना ?
    बाकि नवरात्र की तरह ही गुप्‍त नवरात्र में देवी की पूजा की जाती है:
    - पहले दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्‍नान करने के बाद नौ दिनों तक व्रत का संकल्प लेते हुए कलश की स्थापना करनी चाहिए.
    - घर के मंदिर में अखंड ज्‍योति जलाएं.
    - सुबह-शाम मां दुर्गा की पूजा-अर्चना करनी चाहिए. 
    - अष्‍टमी या नवमी के दिन कन्‍या पूजन कर व्रत का उद्यापन करें. 
    - नौ दिनों तक दुर्गा सप्तशति का पाठ करना चाहिए. समय की कमी हो तो सप्त श्लोकी दुर्गा पाठ करना चाहिए. 
    - तंत्र साधना करने वाले साधक गुप्‍त नवरात्र में माता के नौ रूपों की बजाए दस महाविद्याओं की साधना करते हैं.


    कैसे करें कलश स्थापना ?
    - घर के मंदिर में घी का दीपक जलाने के बाद शुद्ध मिट्टी रखें. मिट्टी में जौं डालें और पवित्र जल का छिड़काव करें.
    - मिट्टी के ऊपर पीतल, तांबे या मिट्टी के कलश में जल भरकर रखें. 
    - कलश में सिक्‍के डालें और उसके चारों ओर मौली बांधें. पुष्‍प माला चढ़ाएं. 
    - कलश को ढक कर आम के पांच पत्ते रखें. 
    - लाल कपड़े में नारियरल लपेटकर कलश के ऊपर रख दें. 
    - इसके बाद कलश पर सुपारी, साबुत चावल छिड़कें और मां दुर्गा का ध्‍यान करें.  

     

     


     

     

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  • मकर संक्रांति: गंगा तटों पर उमड़ी लोगों की भीड़, ऐसे मनाएं त्योहार

    मकर संक्रांति: गंगा तटों पर उमड़ी लोगों की भीड़, ऐसे मनाएं त्योहार

     

    नई दिल्ली: मकर संक्रांति (Makar Sankranti 2019) से पहले देशभर में गंगा (Ganga River) सहित पवित्र नदियों पर सोमवार सुबह श्रद्धालुओं की भीड़ दिखी. इस खास और पावन मौके पर श्रद्धालुओं ने गंगा में डुबकी लगाकर स्नान किया और भगवान सूर्य की अराधना की.

    मान्‍यता है कि भगवान सूर्य जब धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं उसी दिन मकर संक्रांति होती है. ज्‍योतिषाचार्यों के मुताबिक इस बार सूर्य 14 जनवरी की रात 2 बजकर 10 मिनट पर मकर राशि में प्रवेश करेगा. 15 जनवरी को उदय तिथि पड़ने के कारण संक्रांति इसी दिन मनाई जाएगी. इस दिन अगर पानी में कुछ निशान बनाकर स्‍नान किया जाए तो पूरे साल घर में पैसे की बारिश होती है.

    मकर संक्रांति के दिन आप चाहे घर पर नहाएं या फिर किसी नदी ने स्‍नान करें. आपको बस नहाने से पहले पानी में त्रिभुज का निशाना बनाना होगा और उसके अंदर श्री लिख देना है. श्री को मां लक्षमी का मंत्र माना जाता है. आप श्री हिंदी और अंग्रेजी किसी भी भाषा में लिख सकते हैं. इसके बाद पानी में तीन बार डुबकी लगाएं. साथ ही गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्‍वति | नर्मदे सिंधु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु|' मंत्र का जाप करें. इसी तरह अगर आप घर में नहा रहे हैं तो इस मंत्र का उच्‍चारण करने के साथ ही तीन मग पानी अपने ऊपर डाल लें.

    यदि आप श्री नहीं लिख सकते हैं तो आप त्रिभुज के अंदर ॐ लिख दें. इसी के साथ अगर आप नहाते समय तिल के उबटन का इस्‍तेमाल करेंगे तो आपको और भी फायदा हो सकता है. इतना ही नहीं स्‍नान कर सूर्यदेव का अर्ध्‍य जरूर दें. मकर संक्रांति के दिन सूर्य अर्घ्‍य का विशेष महत्‍व है. इस तरह से स्‍नान करने से पूरे साल पैसों की बारिश होगी और कर्ज से मुक्‍ति मिल जाएगी. घर में हमेशा मां लक्ष्‍मी का वास होगा.

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  • नहाय-खाय से हुई छठ महापर्व की शुरुआत, 14 नवंबर को सूर्योदय के अर्घ्य से होगी समाप्ति

    नहाय-खाय से हुई छठ महापर्व की शुरुआत, 14 नवंबर को सूर्योदय के अर्घ्य से होगी समाप्ति

     

    छठ महापर्व आज से नहाय-खाय से शुरू हो गया है। इस अवसर पर दिल्ली में धूम-धाम से तैयारियां की जा रही हैं। बाजारों में रौनक बढ़ गई है। यमुना घाटों को भी तैयार किया जा रहा है। 14 नवंबर को सूर्योदय के अर्घ्य देने के साथ ये पर्व समाप्त हो जाएगा।

     

    महापर्व के प्रसाद के लिए पहले से ही घरों में गेहूं चुनने और मिट्टी का चूल्हा तैयार करने का सिलसिला शुरू हो जाता है। इस पर्व का मुख्य प्रसाद ठेकुआ जो आटे से बनता है जो खजूर आटा और मैदे से तैयार किया जाता है। व्रतधारी पूजा सामग्री के लिए नए बर्तन और कपड़े खरीदने में मशगूल हैं। साड़ियों की दुकानों पर भी रौनक है।
     

    पूजन सामग्री के लिए दिल्ली के पालम इलाके, पूर्वी दिल्ली, द्वारका, बुराड़ी, गोपालपुर, जहांगीर पुरी समेत कई जगहों पर बाजार में रौनक बढ़ गई है। कोशी, पीतल का सूप, बांस का सूप, दउरा, केला, संतरा, अनार, सेब, पानी फल, गागल, पानी वाला नारियल, गन्ना, कच्ची हल्दी, मूली, अदरक, सूथनी आदि की दुकानें सज गई हैं।

     

    कठिन व्रतों में से एक है छठ पूजा
    पंडित राधेश पांडेय के अनुसार भगवान सूर्य को समर्पित इस पूजा को कठिन व्रतों में से माना जाता है। व्रती दो दिनों तक निर्जला रहते है। कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को यह व्रत रविवार से आरंभ हो रहा है।

     

    दूसरा दिन सोमवार को खरना होगा। पूरे दिन व्रत करने के बाद शाम को व्रती प्रसाद ग्रहण करेंगे। मुख्य प्रसाद ठेकुआ, टिकरी है।

     

    मंगलवार को खष्ठी को व्रती अस्तांचल सूर्य को तालाब, नदी के घाट के किनारे अर्घ्य देंगे। सप्तमी को प्रात: सूर्योदय के समय अर्घ्य देंगे और विधिवत पूजा कर प्रसाद वितरित करेंगे।

     

     

     

     

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  • भइया दूज Special: पूजा करते समय इन बातों का रखें ध्‍यान

    भइया दूज Special: पूजा करते समय इन बातों का रखें ध्‍यान

     

    नई दिल्ली: Bhaiya Dooj or Bhai Dooj: भाई-बहन के प्यार के प्रतीक का पर्व है भाई दूज. इस दिन बहनें भाइयों को अपने घर बुलाकर उन्हें तिलक (Bhai Dooj Tilak Shubh Muhurat) कर और आरती उतारकर भोजन कराती हैं. उनकी लंबी उम्र की कामना करती हैं. बदले में भाई बहन की रक्षा का वचन देते हैं और उन्हें तोहफे देते हैं. मान्यता है कि इस पर्व की शुरुआत मृत्यु के देवता यमराज और उनकी बहन यमुना से हुई.

    अगर बहन की शादी नहीं हुई है तो आज के दिन भाई को अपनी बहन के हाथ का बना भोजन खाना चाहिए. अगर अपनी कोई सगी बहन नहीं है तो चाचा, मामा आदि की पुत्री या पिता की बहन के घर जाकर भी भोजन कर सकते हैं.

    भाई दूज या यम द्वितीय 2018 के दिन तिलक का समय:

    द्वितीय तिथि का आरंभ : 8 नवंबर 2018, गुरुवार 09:07 बजे.
    द्वितीय तिथि समाप्त : 9 नवंबर 2018, शुक्रवार 09:20 बजे.
    भाई दूज के दिन टीका करने का मुहूर्त : शुक्रवार दोपहर 01:09 से 03:17 बजे तक
    मुहूर्त की अवधि : 02 घंटे 08 मिनट

    भाई दूज पूजन व तिलक लगाने की विधि:

    भाई दूज का पूजन निश्चित पद्धति और रीति-रिवाज से किया जाता है. इसलिए इसकी विधि को ध्यान पूर्वक पढ़ें.

    1. सबसे पहले सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण कर लें और इसके बाद भाई के तिलक के लिए थाल सजा लें.
    2. तिलक के लिए सजाई गई थाल में कुमकुम, सिंदूर, चंदन, फल, फूल, मिठाई, अक्षत और सुपारी आदि सामग्री रखी जाएगी.
    3. पिसे हुए चावल के आटे या घोल से चौक बनाएं और शुभ मुहूर्त में इस चौक पर भाई को बिठाएं.
    4. इसके बाद उन्हें तिलक लगा दें.
    5. तिलक करने के बाद फूल, पान, सुपारी, बताशे और काले चने भाई को दें और उनकी आरती उतारें.
    6. तिलक और आरती के बाद बहनें भाई को मिठाई खिलाती हैं और भाई उन्हें कोई उपहार देते हैं.

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  • आज भगवान श्रीकृष्‍ण को लगाया जाएगा 'अन्‍नकूट' का भोग, जानें गोवर्धन पूजा की विधि और शुभ मुहूर्त

    आज भगवान श्रीकृष्‍ण को लगाया जाएगा 'अन्‍नकूट' का भोग, जानें गोवर्धन पूजा की विधि और शुभ मुहूर्त

     

    दीपावली के अगले दिन भगवान कृष्‍ण, गोवर्धन पर्वत और गायों की पूजा का विधान होता है. मान्‍यता है कि इसी दिन भगवान कृष्‍ण ने देव राज इन्‍द्र के घमंड को चूर-चूर कर गोवर्द्धन पर्वत की पूजा की थी. इस बार गोवर्द्धन पूजा 8 नवंबर को यानी आज है. आज पूरे भारत में गोवर्धन पूजा होगी. इस शुभ दिन पर 'अन्‍नकूट' यानि 108 या 56 तरह के पकवान बनाकर श्रीकृष्‍ण को भोग लगाया जाता है.           

     

    भगवान को अन्‍नकूट का भोग लगाने के बाद पूरे कुटुंब के लोग साथ में बैठकर भोजन ग्रहण करते हैं. अन्‍नकूट का ये पावन पर्व मनाने से मनुष्‍य को लंबी उम्र और आरोग्‍य की प्राप्‍ति होती है. लंबी उम्र के अतिरिक्त मनुषिय को सुख-समृद्धि की भी प्राप्‍ति होती है.


    गोवर्धन पूजा का शुभ मुहूर्त

     

    प्रतिपदा तिथि प्रारंभ

    7 नवंबर 2018 को रात 09 बजकर 31 मिनट से

    प्रतिपदा तिथि समाप्‍त

    8 नवंबर 2018 को रात 09 बजकर 07 मिनट तक

    गोवर्धन पूजा का प्रात

    काल मुहूर्त: 08 नवंबर 2018 को सुबह 06 बजकर 39 मिनट से 08 बजकर 52 मिनट तक

    गोवर्धन पूजा का सांयकालीन मुहूर्त

    08 नवंबर 2018 को दोपहर 03 बजकर 28 मिनट से शाम 05 बजकर 41 मिनट तक

     

    गोवर्धन पूजा की विधि 


    गोवर्धन पूजा के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर शरीर पर तेल लगाने के बाद स्‍नान कर स्‍वच्‍छ वस्‍त्र धारण करें. इसके बाद अपने ईष्‍ट देवता का ध्‍यान करें और फिर घर के मुख्‍य दरवाजे के सामने गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाएं. पर्वत बनाने के बाद इसे पौधों, पेड़ की शाखाओं और फूलों से सजाएं. पर्वत तैयार करने के बाद उसमें रोली, कुमकुम, अक्षत और फूल अर्पित करें. 

     

    इसके बाद इस मंत्र का उच्चारण करें –
    गोवर्धन धराधार गोकुल त्राणकारक।
    विष्णुबाहु कृतोच्छ्राय गवां कोटिप्रभो भव: ।।


    इसी प्रकार गायों को नैवेद्य अर्पित कर इस मंत्र का उच्‍चारण करें -
    लक्ष्मीर्या लोक पालानाम् धेनुरूपेण संस्थिता।
    घृतं वहति यज्ञार्थे मम पापं व्यपोहतु।।


    इसके बाद गोवर्धन पर्वत और गायों को भोग लगाकर उनकी आरती उतारें. 
     

     

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